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फखरे आलम

फखरे आलम

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-फख़रे आलम-
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इस्लामी इतिहास में सर्वप्रथम ईद जंग-ए-बदर के विजय के उपरान्त आठ दिनों के पश्चात् एक शव्वाल दो हिजरी को अर्थात् 27 मार्च 624 ई. को ईद मनाया गया था। रमजान के एक महीने रोजा के समाप्ती पर एक श्वाल को ईद का त्योहार मनाया जाता है। ईद की नमाज से पूर्व प्रत्येक मुसलमान महिला और पुरुषों को अपने और अपने बच्चों की ओर से फ फितरा, जकात (दान) देना अनिवार्य है। क्योंकि यह ईद एक महीने की कठिन रोजा और इबादत के पश्चात् मनाया जाता है। इसलिए इसकी खुशी, उत्साह अधिक होती है। ईद की नमाज पढ़ने से पूर्व मुसलमानों में कुछ मीठा खाने की प्रथा है।

रोजा इस्लाम में इबादत का तीसरा चरण है। रोजा को अरबी भाषा में ‘सोम’ कहते हैं। और सोम का अर्थ रुकना होता है। दूसरे अर्थ में सोम चुप रहने को भी कहा जाता है। पवित्र धर्मिक ग्रन्थ में रोजा, सब्र के भाव में भी कइयों स्थान पर लिया गया है। इस्लामी व्यख्या में रोजा का अर्थ अपने शारीरिक आनन्द, सुख सुविधओं का त्याग एवं अपने व्यक्तिगत इच्छाओं पर काबू रखना और दैनिक एवं आवश्यकताओं पर सही और गलत नियंत्रण रखना है। शारीरिक और मानसिक इच्छाओं को अपने नियंत्रण में रखने का नाम रोजा है।

रोजा रखने का परम्परा मानव जीवन में कब से आरम्भ होता है। इसके समय और काल का ठीक ठीक पता नहीं! ब्रिटेन के प्रसिद्ध शिक्षावृद् हरवर्ट स्पेन्सर ने अपनी रचना प्रिन्सिपल ऑफ सोसोलॉजी में लिखा है कि कुछ जनजातियों पर आधरित शोध के आधार पर जब खाने पीने की चीजों की कमी और सूखे के कारण लोग उपवास रखते थे, जिनके मान्यताओं के अनुसार उनके भूखे रहने का पून्य उनके पूर्वजों को प्राप्त होने की मान्यता चल निकली।

इस्लाम धर्म में अल्लाह की ओर से सूचना दी गई कि मुसलमानों रोजा तुम पर इसी तरह से अनिवार्य है, जिस प्रकार से यह तुम से पूर्व के धर्म का अनिवार्य की गई। पवित्र ग्रन्थ में लिखा है कि रोजा अर्थात् व्रत इस्लाम से पूर्व भी अनिवार्य था। रोजा वातावरण, जलवायु, धर्म संस्कृति के आधर पर इनमें विभिन्नताएं तो देखी गई, मगर यह विश्व के सभी जाति और धर्म में यह किसी न किसी अवस्था में विद्यमान है। रोजा अर्थात् व्रत धर्मिक अनुष्ठान और धर्मिक भाग के रूप में मौजूद है। भारतीय धर्म और सभ्यता विश्व के प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। इसमें प्रत्येक हिन्दी महीने के ग्यारहवीं और बारहवीं प्रकावशी का व्रत अर्थात् वर्ष के 24 व्रत हुए। हिन्दू ऋषि 40 दिनों का उपवास रखते थे। अर्थात् वह अन्नों का त्याग करते थे। जैन धर्म में उपवास का कठोर प्रावधन है। इस धर्म में 40 – 40 दिनों का एक उपवास रखने की परम्परा थी। दक्षिण पूर्वी भारत में जैन सप्ताहिकी व्रत रखते थे। प्राचीन मिश्र की सभ्यता में उपवास के प्रमाण मिलते थे। रोम में महिलायें उपसास रखती थी। पारसी धर्म में व्रत का रखना अनिवार्य नहीं, मगर उनके धर्मिक ग्रामों में अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये रोजे रखने की बात कही गई है। यहूदी, मुसा की याद में चालीस दिनों का उपवास रखते हैं, जो उस पर अनिवार्य है। ईसाई धर्म में उपवास है। क्योंकि ईसा ने चालीस दिनों का उपवास रखा था। इस्लाम धर्म के आगमन से पूर्व अरब निवासी उपवास से परिचित थे और वह रोजा रखते थे। रमजान महीने के तीस रोजे से पूर्व कुछ और रोजे भी अनिवार्य थे, जो बाद के दिनों में समाप्त कर दिये गये थे।

रोजा उपवाद में नहीं रखा जा सकता, जैसे नवजात शिशु की मां, बूढ़ा और लागर एवं भिखारी की अवस्था में जिसके लिए एक गरीब का पेट भरना अनिवार्य होगा। इस्लाम से पूर्व उपवास किसी विशेष वर्ग अथवा समुदाय पर अनिवार्य हुआ करता था, जैसे हिन्दू धर्म में ब्राह्मणों, पारसियों में धर्मिक गुरुओं पर, रोम में महिलाओं पर अनिवार्य था। मगर इस्लाम में सभी स्वास्थ्य और वयस्क व्यक्ति पर रोजा अनिवार्य है। इस्लाम धर्म में रोजा अरबी महीनों पर आधरित है। जो ऋतुओं और छोटेृ-बड़े दिनों के कारण घटते और बढ़ते रहने के साथ साथ प्रत्येक ऋतुओं और अंग्रेजी के महीनों में आता है। रमजान का रोजा 2 हिजरी अर्थात् 623 ई. में अनिवार्य किया गया था। रमजान अरबी महीने का नौवां महीना और शव्वाल दसवां महीना है। जिसके प्रथम दिन ईद मनाई जाती है। रोजा छः प्रकार के होते हैं जिसके प्रथम दिन ईद मनाई जाती है। रोजा के छह प्रकारों में- फर्ज, वाजिब, सुनत, नपिफल, मकरू और हराम वर्ष भर में रमजान महीने का तीस रोजा मुसलमानों पर अनिवार्य है।

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