लेखक परिचय

ब्रह्मानंद राजपूत

ब्रह्मानंद राजपूत

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img-deendayal(पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 100 वीं जन्म जयंती 25 सितंबर 2016 पर विशेष आलेख)
भारत की पावन भूमि पर समय-समय पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है। जिन्होंने समय-समय पर भारत को दिशा दी है। भारत जैसी पावन भूमि पर 25 सितम्बर 1916 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे महापुरुष ने जन्म लिया जो कि एक महान चिंतक थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म मथुरा जिले के गाँव नंगला चन्द्रभान में हुआ था। उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय था। जो की रेलवे में नौकरी करते थे। उनकी माता का नाम रामप्यारी था जो की धार्मिक प्रवर्ति की महिला थीं। जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय तीन वर्ष के थे तब उनके सर से पिता का साया उठ गया। पति की मृत्यु के बाद माँ रामप्यारी भी बीमार रहने लगी। जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय सात वर्ष के थे उनकी माता का भी देहांत हो गया। 7 वर्ष की छोटी सी उम्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय माता-पिता के प्यार से वंचित हो गये।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक स्वयंसेवक के साथ साथ दार्शनिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, इतिहासकार, पत्रकार भी थ।े उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माण में अहम् भूमिका निभाई थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए पूरे समर्पित भाव से काम किया। सन् 1951 ई० में भारतीय जनसंघ की स्थापना डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की। पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनसंघ सह संस्थापक थे। 1951 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय को जनसंघ का संगठन मंत्री बनाया गया। दो वर्ष बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय को सन् 1953 ई० में अखिल भारतीय जनसंघ का महामन्त्री निर्वाचित किया गया और लगभग 15 वर्ष तक पूरे निस्वार्थ सेवा समर्पित भाव से पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इस पद पर रहकर जनसंघ की अमूल्य सेवा की। 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के असमय निधन से पूरे जनसंघ के संगठन की जिम्मेदारी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कन्धों पर थी। जिसे उन्होंने अपनी अद्भुत कार्यक्षमता के बल पर बखूबी निभाया। भारतीय जनसंघ का 14वां वार्षिक अधिवेशन 1967 में कालीकट पर हुआ। जिसमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय को अखिल भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने एक लेखक के रूप में अनेक पुस्तकें लिखीं। जिनमे दो योजनाएँ ,राजनीतिक डायरी, भारतीय अर्थनीति का अवमूल्यन , सम्राट चन्द्रगुप्त , जगद्गुरु शंकराचार्य, एकात्म मानववाद और राष्ट्र जीवन की दिशा प्रमुख रूप से थी। कहा जाता है कि उन्होंने चन्द्रगुप्त नाटक केवल एक ही बैठक में लिख डाला था। कहा जाए तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी नेतृत्व क्षमता भी कमाल की थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी भारत माता को राष्ट्रीयता का आधार मानते थे। वो कहते थे कि हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता हैं, केवल भारत ही नहीं. माता शब्द हटा दीजिये तो भारत केवल जमीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जायेगा। इससे उनकी राष्ट्रवादी और हिंदुत्व विचारधारा झलकती थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी व्यक्तिवाद, लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद को पश्चिमी अवधारणा मानते थे। कहा जाए तो इनको भौतिकवादी विचारधाराओं का स्वरुप मानते थे।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा के प्रणेता थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने बताया था कि एकात्म मानववाद मानव जीवन व सम्पूर्ण सृष्टि के एकमात्र सम्बन्ध का दर्शन है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय कहते थे कि यहाँ एकता, ममता, समता और बंधुता होती है वहाँ एकात्म मानववाद का दर्शन होता है। वास्तव मैं कहा जाए तो एकात्म मानववाद एक ऐसी विचारधारा है जो मनुष्य को जीना सिखाती है और एक ऐसे समाज का उदय करती है यहाँ एकता हो, समानता हो और वहाँ के लोग भाईचारे के साथ रहते हैं। एकात्म को हम अविभाज्य या एकीकरण भी कह सकते है।ं इसका मतलब होता है एक ऐसा समाज यहाँ किसी प्रकार का विभाजन न हो और एकता हो। मानववाद एक ऐसी विचारधारा है जो मानव के मूल्यों और उन से सम्बंधित मसलों पर ध्यान देती है। कहा जाए तो मानववाद एक भरोसा अथवा धारणा है जो मानवता के प्रति लोगों को आकर्षित करती है। जहाँ एकात्म मानववाद दर्शन का अनुसरण किया जाता है। ऐसे समाज में संघर्ष के लिए कोई जगह नहीं होती। वहां लोग सिर्फ प्रेम और भाईचारे के साथ इकट्ठे होकर रहते हैं। कहा जाए तो आज विश्व को एकात्म मानववाद जैसी विचारधारा कि जरुरत है। जिससे पूरे विश्व में शांति, एकता, समता और बंधुता कायम हो सकती है।
महान चिन्तक, संगठनकर्ता, सच्चे स्वयंसेवक, विलक्षण प्रतिभा के धनी, सरल व्यक्तित्व एवं सोम्य स्वभाव के स्वामी पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का निधन 11 फरवरी, 1968 को हुआ। उनका निष्प्राण शरीर 11 फरवरी, 1968 को मुगल सराय रेलवे स्टेशन पर पाया गया। उनके निधन कि खबर सुनकर पूरा देश शोकाकुल हो गया। आजतक उनकी मौत का रहस्य अनसुलझा है।
– ब्रह्मानंद राजपूत

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