लेखक परिचय

अखिल कुमार (शोधार्थी)

अखिल कुमार (शोधार्थी)

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एक राजा का लड़का था जो इतने के बावजूद राजपूत नहीं था। चूँकि उसका पिता जन्म से क्षत्रप न होकर निशाद था अतः वह राजपूत होने की न्यूनतम अर्हता पूरी करके भी वांछनीयताओं में पिछड़ जाता था। तत्कालीन पूर्ण पक्के राज पुत्रों के समान उसने भी िक्षित होने का मन बनाया। हालांकि उसके पिता ने उसे समझाया कि शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार हम लोगों का नहीं है क्योंकि हम लोग पैर से जन्मे हैं, अब पैर और दिमाग के बीच में पूरे भारीर की दूरी तुम कई योनियों में कई बार जन्म लेकर के पार कर पाओगे और जब ऐसा कर लेना तब चले जाना गुरुजी के पास।’’ लेकिन बच्चा आज के किसी एक कवि की पंक्तियों से बहुत प्रभावित था, जिसके अनुसार ‘हार नहीं मानुंगा, रार नहीं ठानुंगा।’ उसने प्रण किया कि पॄाई तो करनी ही है, चाहे जो हो जाय। उस समय तक रूसो रविन्द्रनाथ टैगोर या जे0 कृश्णमूर्ति नहीं हुए थे जो बच्चे को समझाते कि ॔बेटा प्रकृति से सीखो। गुरु लोग सामाजिक और गुरुतापूर्ण हैं। सामाजिक होने के कारण वो सामाजिक सच्चाइयों जैसे जाति व वर्ग के आलोक में अद्वैती से द्वैती हो गए हैं। वो हर मनुश्य में परमात्मा और ईवर का दार्न तो करते हैं किन्तु पूजते हैं गोरे, दूधिए, स्वर्णाभूशण जड़ित, कमल व गुलाब की गमगम के माहौल में नित्य मगन रहने वाले देवों को। उनका चेला बनोगे तो खटाएंगे तुमको और एक्सिलेंस अवार्ड (या नौकरी) दे देंगे अपने सामाजिकों को। प्रकृति बेईमान नहीं है, वह तुम्हें मुफ्त में िक्षित करेगी और गुरुदक्षिणा भी नहीं लेगी।’ लेकिन लड़का जिद्दी था, ठान लिया था कि पूँगा तो गुरुजी से ही अतः एक दिन मातापिता की सलाह का उल्लंघन करके, चनाचबैना गठरी में पैक करके भोर में भागा और कई दिनों की यात्रा के बाद गुरु के सामने उपस्थित। अपने बॉयोडाटा के पर्सनल इनफार्मोन वाली सूचनाओं का खुलासा करते ही गुरु और गुरु के चेले भड़क उठे “हिम्मत देखो साले की, ……… पॄाईे करेगा, पॄने आया है, दिमाग उड़ने लगा है, …………. केवट का बेटा बराबरी करने चला है राजपूतों की………. ।’ उस समय तक लोकतंत्र और रिजर्वोन नहीं लागू हुआ था और न ही िक्षा का मूल अधिकार बनकर आया था। हालांकि आजकल के सवर्ण विद्यालयों ने इतने के बावजूद धनहीनों के लिए दोयम दर्जे की िक्षा उपलब्ध कराने के लिए अलग कक्षांए चलाने की वकालत की किन्तु लोकतंत्र ने ज्ञान के सूर्य पर पैसे के ग्रहण को नहीं लगने दिया और शिक्षास्ति्रयों तथा मानवाधिकार के पैरोकारों के कारण सवर्ण सरकारी और सवर्ण निजी विद्यालयों की गणित फेल हो गई। किन्तु उस समय तक इस गणित को काटने का लोकतंत्री फार्मूला विकसित नहीं हुआ था। िक्षा अगड़ों की रखैल थी अतः बच्चे को राजा से एन0ओ0सी0 (नो आब्जेकन सर्टिफिकेट) लाने को कहा गया। राजा मुर्ख थोड़े न था और लड़के में भी बुद्धि का उदय धीरेधीरे होने लगा था फिर भी वह राजा के दरवाजे पर पहुँचा तो देखा एक आदमी को वृक्ष से बांधकर पीटा जा रहा था। आसपास पूछने पर पता चला कि वह भाूद्र होकर भी वेद पॄने का प्रयास कर रहा था। लड़का फिर भागा और जाकर जंगल में रूका। घर जा नहीं सकता था क्योंकि घर से तो भागकर िक्षित होने आया था और िक्षा पानी ही थी, चाहे जो हो जाय। िक्षा भी ऐसी वैसी नहीं, पूरी राजपूतों वाली, भास्त्र िक्षा, क्योंकि था तो वह राजपूत ही। भास्त्रीय अर्थ में नहीं तो भाब्दिक अर्थ में ही सही। अब प्रकृति तो उदारता की िक्षा, सहनाीलता की िक्षा देती है किन्तु उसे तो लेना था बदला। खुद को अपमानित करने वाले राजपुत्रों से। अतः गुणागणित, टेक्निककौाल और भास्त्रसंचालन कुछ भी उनसे कमतर नही जानना था। इसलिए सीखना उसी से था जो उनको सिखा रहा है अतः लड़के ने मिट्टी का ांचा खड़ा किया जो किसी भी तरह से गोरा गुरु नहीं था, किन्तु फिर भी लड़के ने अपनी श्रद्घावा इस निर्जीव ांचे को भी सजीव गुरु सा स्वीकारा। उसने कड़ी मेहनत करके इस निर्जीव गुरु के ढांचे के सामने भास्त्र संचालन में निपुणता हासिल की और एक दिन जब वो सजीव गुरु अपने राजपुत्र िश्यों के साथ इस जंगल से गुजर रहा था तो एक दुर्घटना घटी। राजपुत्रों के विश्रामस्थल से उनका कुत्ता भटकता हुआ आया और इस काले लड़के को देखकर भौंकने लगा। अब तक वह भी राजपाु हो चुका था अतः उसमें भी रियाया से ईश्र्या करने वाले द्वेशाणु पनप चुके थे। लड़के ने सोचा कुत्ता भूखा होगा अतः उसके सामने जो कुछ अपने से बचा खुचा था वह डाल दिया लेकिन कुत्ते ने नहीं खाया। भायद उसने कलयुग की खबर को आधुनिक संतों की तरह इन्ट्यून से पहले ही जान लिया था कि ॔भाुद्र के घर की रोटी खाने वाला कुत्ता भी अछूत मान लिया जाता है।’ अतः उसने रोटी नहीं खाई और लड़के की इस गुस्ताखी के दंडस्वरूप लगातार भौंकना व उसे काटने का प्रयास जारी रखा। तब लड़के ने अपनी धनुर्विद्या द्वारा गुरु के चरणों में भाीा नवाकर कई बाणों को कटोरीनुमा रूप में इस प्रकार छोड़ा कि कुत्ते के भारीर से बिना रक्त की एक बूंद गिरे, उसका मुख बंद हो गया। अब कुत्ता गूंगा कर के रिरियाने लगा और पूंछ हिलाता हुआ अपने खेमे में पहुंचा। कुत्ते को देखते ही वहां भूचाल आ गया। गुरु द्वारा दुनिया का सर्वश्रेश्ठ धनुर्धर होने का आिर्वाद पाया राजपुत्र दातों तले उंगलियां दबा लिया। आपस में राजपुत्रों की मंत्रणा हुई और गुरु के पास गुरु के झूठे होने की खबर पहुंची। गुरु राजपुत्रों के रोश से विचलित हो गए। उन्हें अपनी नौकरी जाने और भूखों मरने की चिंता सताने लगी अतः राजपुत्रों के रोश को दूर करने के लिए गुरु उस स्थान पर पहुंचे जहां लड़का अभ्यासरत था। लड़के ने गुरु के चरणों में भाीश नवाने को पांव आगे ब़ाया कि गुरु पीछे हट गए। उन्हें एक अछूत से सस्पार अभिवादन लेने में खुद के धर्मभ्रश्ट हो जाने का खतरा महसूस हुआ अतः दूर से ही पूछा ॔किसके िश्य हो तुम।’ लड़के ने बोला ॔आपके गुरुजी।’ राजपुत्र गुरु से दूर हट कर हिराकत की नजर से देखने लगे। धनुर्धारी राजपुत्र ने मन में सोचा कि ये पैसा तो लेते हैं हमसे और सर्वश्रेश्ठ िक्षा हमें न देकर दे रहे हैं दूसरे को। हालांकी गुरु आधुनिक िक्षक नहीं थे, जो सरकार का वेतन लेकर कक्षा में नहीं पॄाते और व्यक्तिगत पैसों पर ट्यून पॄाते, हालांकि यहाँ उसके लिए भी कोई स्पो नहीं था क्योंकि ट्यून पॄने का इच्छुक श्रीहीन था फिर भी, गुरु की अपनी नौकरी जाने का खतरा महसूस हुआ। अब बचाव का एक ही रास्ता था कि राजपुत्रों को संतुश्ट किया जाय जिसके लिए लड़के की बलि आवयक थी। गुरु फ्रंट पर आये ॔मेरे िश्य हो तो गुरुदक्षिणा दोगे’ लड़का चूंकि पिछड़ा था अतः अगड़ों के छलप्रपंच, कौाल व भाईभतीजावाद से अनभिज्ञ था। वह सहशर आगे आया ॔जो चाहे मांग लें गुरुदेव, जान हाजिर है’ ॔जान नहीं अंगूठा दे दो’ गुरु ने धनुर्धारी राजपुत्र की तरफ देखा। धनुर्धारी को अब विवास हुआ कि गुरुजी ईमानदार हैं। ॔जिसका खाते हैं, उसी का गाते हैं।’ लड़के ने अंगूठा काटकर गुरु को भेंट कर दिया। अपनी सारी तपस्या, सारी निश्ठा, सारा परिश्रम गुरु के चरणों में भेंट कर दिया और उफ तक नहीं किया। गुरु ने धनुर्धारी को देखा और दोनों के होंठ हंसने को फैल गए। गुरु दोणाचार्य थे, लड़का एकलव्य और धनुर्धारी राजपुत्र अर्जुन।

 

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1 Comment on "एकलव्य प्रसंग : आधुनिक पुनर्पाठ"

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Indian
Guest
बहुत ही सही बात लिखी है आपने! पिछड़े हमेशा से ही अगड़ी जातियों की महत्वाकांक्षाओ के शिकार होते आये है और आज भी भारत के कुछ समृद्धशील अगड़ी जाती के लोग उन्हें फिर से अपनी महत्वाकांक्षाओ की बलि बनाना चाहते है! प्राचीन काल में इन्हें राजगुरु और ब्रह्मण कहा जाता था, जो राजा तो नहीं होता था पर राजा से कम भी नहीं होता था, यूरोप में जो पोप की स्थिति थी वही भारत में राजगुरुओ के रूप में हो चुकी थी! चूँकि राजगुरुओ ने भी पोप की तरह काम किया था इसलिए वो इस चीज़ का क्रेडिट ले सकते… Read more »
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