लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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 सिद्धार्थ शंकर गौतम

उत्तरप्रदेश में जारी चुनावी घमासान के बीच नेताओं द्वारा जहां आचार संहिता का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है वहीं चुनाव आयोग की बेबसी और उनपर कड़े कदम न उठा पाने की सियासी मजबूरी ने नेताओं के हौसले ही बुलंद किए हैं| तभी तो हर नेता चुनाव आयोग को ठेंगा दिखाते हुए अपनी मनमानी करने में लगा हुआ है| ताज़ा मामला कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी से जुड़ा है| कानपुर में राहुल ने चुनाव आयोग की तमाम सख्तियों एवं दावों को धता बताते हुए न केवल प्रतिबंधित मार्ग पर रैली निकाली वरन तय समय सीमा को भी पार किया| चूँकि मामला राहुल गाँधी से सीधे जुड़ा हुआ था तो निर्वाचन अधिकारियों तथा पुलिस के आला अधिकारियों ने गहन विचार विमर्श कर इस बारे में शिकायत के बाद राहुल और कानपुर शहर अध्यक्ष के खिलाफ धारा १४४ के उल्लंघन और अराजकता फैलाने का मुकद्दमा दायर कर लिया| ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या राहुल गाँधी को गिरफ्तार किया जाएगा? वैसे यह कोई पहला मामला नहीं है जब किसी हाई-प्रोफाईल नेता ने चुनाव आयोग को अपनी मनमानी से सकते में डाला हो|

 

इससे पहले जब कानून मंत्री सलमान खुर्शीद को अल्पसंख्यक आरक्षण पर वादा न करने की सलाह दी गई, तो उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग फांसी पर भी चढ़ा देगा तो वह ऐसा कहते रहेंगे। उनके खिलाफ चुनाव आयोग ने सीधे कार्रवाई न करते हुए राष्ट्रपति का दरवाजा भी खटखटाया लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। इसके बाद केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने भी फर्रुखाबाद में मुस्लिम कोटा बढ़ाए जाने की घोषणा करते हुए चुनाव आयोग को चुनौती दे डाली। यहाँ तक कि उन्होंने तो बाकायदा सार्वजनिक मंच से ही चुनाव आयोग को धमकी भले लहजे में देख लेने की बात कही थी| चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा, जिसके जवाब में बेनी ने आयोग के सम्मान की बात तो कही, पर आचार संहिता उल्लंघन की गलती नहीं स्वीकारी। श्रीप्रकाश जायसवाल तो अचार संहिता की महत्ता को चुनौती देते हुए बयान दे रहे हैं कि यदि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की सरकार पूर्ण बहुमत में नहीं बनी तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा| प्रथम दृश्यता तो यह मतदाताओं को धमकाने का अपराध है| कुछ ऐसी ही टिप्पड़ी कुछ समय पूर्व कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी कर चुके हैं| आखिर क्या कारण है कि चुनाव आयोग इन बेलगाम नेताओं पर सख्त कार्रवाई करने की वजाय मूक दर्शक बन भीड़ का हिस्सा-सा बनता जा रहा है? ऐसी कौन सी मजबूरियाँ हैं जिनकी वजह से चुनाव आयोग किंकर्त्तव्यविमूढ़ सा कभी प्रधानमंत्री को देखता है तो कभी लाचारी से राष्ट्रपति के पास गुहार लगाता नज़र आता है? एक स्वतंत्र संस्था होने के वावजूद भी चुनाव आयोग क्यूँ सरकारी दबाव में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता प्रतीत होता है| चुनाव आयोग की इसी कमजोरी का फायदा प्रायः सभी दल के नेता उठाने लगे हैं|

इससे पहले भी चुनाव आयोग पूरे प्रदेश में हाथी की मूर्तियों को ढकवाने के अपने बेतुके फैसले से चर्चा का विषय बन गया था और अब आचार संहिता तोड़ते पार्टी विशेष के नेताओं पर सख्त कार्रवाई न करने से भी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और निष्पक्षता दांव पर लगी है| ऐसे कठिन समय में अब यह चुनाव आयोग को तय करना है कि स्वतंत्र संस्था के रूप में कार्यरत उसका वजूद कैसे प्रासंगिक रहे वरना तो उसे भी सरकारी संस्था का तमगा आम जनता की ओर से मिलता ही जा रहा है| हालांकि यह भी सत्य है कि चुनाव आयोग ने हाल के दिनों में जिस तरह की सख्ती राजनीतिक दलों पर दिखाई है; उससे प्रदेश में चुनाव निश्चित रूप से शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होते जा रहे हैं| काले धन का चुनाव में इस्तेमाल रोकने में भी चुनाव आयोग काफी हद तक सफल रहा है| किन्तु जब भी केंद्रीय नेतृत्व या तथाकथित चमत्कारिक नेताओं पर नकेल कसने की बात आती है; चुनाव आयोग की सख्ती हवा हो जाती है|

जहां तक सवाल राहुल गाँधी के नियम विरुद्ध आचरण का है तो यह तो सर्वविदित है कि कांग्रेसी उन्हें देश का भावी प्रधानमंत्री पेश करने से चूकते| ऐसे में यदि राहुल चुनाव संहिता का उल्लंघन करते भी हैं तो कांग्रेस को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती| यही हाल वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं का भी है| सैयां भय कोतवाल; तो डर काहे का की तर्ज़ पर वे जब-तब चुनाव आयोग की मर्यादा ताक पर रख राजनीतिक रोटियाँ सेंकने से बाज नहीं आ रहे| यहाँ तक कि उनकी ओर से चुनाव आयोग को उसके दायित्वों का भी समय-समय पर भान कराया जाता रहा है| तमाम परिस्तिथियों के मद्देनज़र अब वक़्त आ गया है कि चुनाव आयोग इन हाई-प्रोफाईल नेताओं पर कड़ी कार्रवाई करे ताकि उसपर लग रहे पक्षपात के आरोपों का माकूल जवाब दिया जा सके| यदि चुनाव आयोग ने तमाम दबावों के बीच नेताओं के आचरण पर लगाम लगा दी तो यकीन मानिये; इनके दिमाग में पैठ चुकी सामंती मानसिकता और जनता को कुछ न समझने की आदत छू-मंतर हो जाएगी और चुनाव आयोग की प्रसिद्धि में चार चाँद लग जायेंगे| पर क्या ऐसा होगा और कैसे; यह सवाल अभी भी जनता के मन-मस्तिष्क को उद्वेलित किए हुए है|

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