लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

यह सही है कि हमारे यहां आदर्श आचार संहिता नीयम-कायदों की वैधानिक इबारत में लिखी हुर्इ नहीं है। इसलिए प्रत्याशी और दलों के प्रचारक मतदाताओं को लुभाने के लिए आचार संहिता के उल्लंघन की परवाह नहीं करते। हालांकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा है। इसीलिए संविधान ने निर्वाचन आयोग को अनेक अधिकार दिए हैं। इन्हीं अधिकारों के उपयोग का जो सिलसिला पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने शुरू किया था, उसे सख्ती से अमल में लाए जाने की परंपरा आज भी कायम है। चुनावों में मतदान का जो प्रतिशत बढ़ रहा है, वह भी इसी सख्ती की देन है। लेकिन आयोग की यह ताकत केंद्र में सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के मंत्रियों को रास नहीं आ रही, इसलिए वे इसे वैधानिक दर्जा देने के बहाने चुनाव आयोग के अधिकारों में कटौती करने की निरंकुश मंशा जता रहे हैं। यदि देश की अदालतों के हवाले आचार संहिता के उल्लंघन संबंधी मामलों की सुनवार्इ के अधिकार दे दिए जाते हैं तो निराकरण में कर्इ साल लगेंगे। आरोपी के खिलाफ फैसला होने पर उसे ऊपरी अदालतों में अपील का भी अधिकार स्वभाविक रूप से मिल जाएगा। इस काल अवधि में दोषी सत्ता सुख भोगने में भागीदार रहेगा, लिहाजा वह सत्ता का दुरूपयोग भी अपने हितों के लिए करने को स्वतंत्र होगा।

आदर्श आचार संहिता के बहाने चुनाव आयोग की अधिकार संपन्नता असंदिग्ध है। इस तथ्य की प्रमाणिकता इस उदाहरण से सिद्ध होती है कि आयोग ने कुछ समय पहले ही पैसे लेकर खबर छापने के एक मामले में उत्तरप्रदेश के बिसौली विधानसभा क्षेत्र की विधायक श्रीमती उर्मिलेश यादव पर तीन साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। इसी फैसले के बूते वे इस विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं बन पार्इं। आगामी 19 अक्टूबर 2014 तक भी वे कोर्इ चुनाव नहीं लड़ पाएंगी। जाहिर है आयोग को पर्याप्त संवैधानिक अधिकार हासिल हैं। अधिकारों की इस व्यापक कार्यप्रणाली से आयोग वंचित हो जाए, इसलिए राजनेता आयोग के पर कतरने की भूमिका को अंजाम देने में लग गए हैं। कांग्रेस इस दृष्टि से ज्यादा क्रियाशील दिखार्इ दे रही है। क्योंकि कांग्रेसी नेता आचार संहिता की धजिजयां उड़ाने का सिलसिला लगातार न केवल जारी रखे हुए हैं, बलिक आयोग को अब चुनौती और मतदाताओं को धमकी साबित हो रहे हैं।

आचार संहिता के उल्लंघन की शुरूआत केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने की। उन्होंने अपनी पत्नी एवं कांग्रेस प्रत्याशी लुर्इस फर्णांडीस के निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं को लुभाने की दृष्टि से चुनावी मंच से घोषणा की कि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो मुसिलमों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ बढ़ाकर दोगुना कर दिया जाएगा। इसी घोषण को कांग्रेस के ही केन्द्र सरकार में मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा ने दोहराया। अब कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल कह रहे हैं कि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस या तो अपनी सरकार बनाएगी या राष्ट्रपति शासन लागू करेगी। इस संदेश का अर्थ है कि या तो मतदाता कांग्रेस के पक्ष में मतदान करें अथवा राष्ट्रपति शासन का दंश भोगने को तैयार रहें। इस बयान का यह अर्थ भी निकलता है कि कांग्रेस सत्ता में नहीं आर्इ तो असिथरता के हालात निर्मित होंगे और प्रदेश को दोबारा चुनाव की सिथति का सामना करना पड़ सकता है। लिहाजा सिथरता के लिए कांग्रेस को जिताएं। इस लिहाज से यह बयान आचार संहिता का उल्लंघन है, इसलिए चुनाव आयोग को खुद आगे बढ़कर इस कथन को संज्ञान में लेना चाहिए।

संविधान ने जो अधिकार राज्यपाल को दिए हैं, उन अधिकारों कोर्इ मंत्री या राजनीतिक दल कैसे हड़प सकता है ? और कैसे ऐसे बेतुके फैसले सार्वजनिक मंच से सुनाए जा सकते हैं ? श्रीप्रकाश जायसवाल को राष्ट्रपति शासन लागू करने की बात करने से पहले सोचना चाहिए था कि केन्द्र में सत्ता भले कांग्रेस गठबंधन की है, किंतु इसका यह आशय नहीं कि यदि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस बहुमत में नहीं आती है तो वे संवैधानिक अधिकारों का हनन कर राष्ट्रपति शासन लागू करने की धृष्ट निरंकुशता बरत लेंगे। राज्यपाल संवैधानिक पद है। इस नाते उनकी नैतिक दायित्व बनता है कि जो भी दल बड़े दल के रूप में उभरकर आए, उसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें और विधानसभा में बहुमत साबित करने का अवसर दें। राजनीति में समीकरण बदलने में भी देर नहीं लगती। जो दल किसी को भी समर्थन न देने की हुंकार भर रहे हैं, कल वही समर्थन देने को विवश हो सकते हैं। वैसे भी केन्द्र की संप्रग सरकार गठबंधन की बाहर और भीतर लगी नाजुक वैशाखियों पर टिकी है। वर्तमान में कांग्रेस नेतृत्व की केन्द्र सरकार को समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस का समर्थन हासिल है। ममता बनर्जी की समर्थन वापिसी की धमकियों ने गठबंधन को पहले से ही नाजुक मोड़ पर ला खड़ा किया है। ऐसे में यदि उत्तरप्रदेश में सपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर आती है तो कांग्रेस को अपना टेका सलामत रखने के लिए सपा को टेका लगाना ही होगा। मौजूदा परिप्रेक्ष्य में लोकतंत्र का यही तकाजा है और एक राज्यपाल का यही आदर्श आचरण होना चाहिए। कांग्रेस के उत्तरप्रदेश में बहुमत में नहीं आने का मतलब यह कदापि नहीं है के सरकार बनाने के विकल्पों का खात्मा हो जाए ?

आचार संहिता का उल्लंघन राहुल गांधी ने भी किया। उन पर निषेधाज्ञा तोड़ने का कानपुर में मामला भी दर्ज हो गया है। उन्हें जिला प्रशासन ने 18 किलोमीटर की दूरी तक रोड शो करने की इजाजत दी थी। किंतु उनका काफिला जब गति में आया तो उसने 35 किलोमीटर की दूरी तय की। प्रशासन ने इसे धारा 144 और आदर्श आचार संहिता की अवहेलना माना और राहुल गांधी को भारतीय दंड संहिता की धारा 283 और 290 के तहत नामजद किया। अब कांग्रेस के आला नेता कह रहे हैं कि यह कार्रवार्इ मुख्यमंत्री मायावती के इशारे पर हुर्इ। यह बात सही भी हो सकती है, लेकिन निषेधाज्ञा के उल्लंघन की आधार-भूमि तो खुद राहुल गांधी ने तैयार की। जिस व्यकित को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में उछाला जा रहा है, उसका अपना भी नैतिक दायित्व बनता है कि वह कानूनी मर्यादाओं के पालन में जागरूकता और जबावदेही का परिचय दें।

चुनाव आयोग यदि उदारता न बरते तो वह दिगिवजय सिंह, राहुल गांधी, बेनीप्रसाद वर्मा, श्रीप्रकाश जायसवाल और सलमान खुर्शीद की चुनावी सभाओं पर प्रतिबंध लगा सकता है। लुर्इस फर्णांडीस के निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव रदद कर सकता है। लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित न हो, शायद इसलिए आयोग नरमी का रूख अपना रहा है, वरना आयोग के पास इतने अधिकार हैं कि कानून की अवज्ञा करने वालों के साथ सख्ती बरतकर उन्हें पटरी पर ले आए। यदि वार्इएस कुर्रेशी के स्थान पर टीएन शेषन जैसे कोर्इ निर्वाचन आयुक्त होते तो आचार संहिता का मखौल बनाने वालों को कबका सबक सिखा चुके होते ?

आचार संहिता उल्लंघन के जो भी वाकयात सामने आ रहे हैं, वे कांग्रेस की सुनियोजित रणनीति के हिस्से हैं और इस रणनीति के योजनाकार दिगिवजय सिंह हैं। आयोग द्वारा प्रधानमंत्री को शिकायत किए जाने के बावजूद मनमोहन सिंह मौन साधे रहते हैं। सोनिया गांधी भी मर्यादा बरतने की अपने मातहतों को कोर्इ नसीहत नहीं देती। उनकी सत्ता और पुत्र मोह की लाचारी है। उत्तरप्रदेश में कांग्रेस नहीं, राहुल का आगामी राजनीतिक जीवन दांव पर लगा है। इसलिए उनकी भी अंदरूनी मंशा है, वोट हथियाने के लिए जो भी हथकंडे अपनाए जाएं, वे जारी रहने चाहिए। ये हथकंडे कालांतर में अपनाए जा सकें इसीलिए यह सोची समझी कवायद शुरू हुर्इ है कि आदर्श आचार संहिता को वैधानिक दर्जा देकर आयोग के अधिकारों में कटौती कर दी जाए। देश की अदालतों में तो पहले से ही तीन करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं। ऐसे में आचार संहिता के उल्लंघन से मामले भी अदालतों के सुपुर्द कर दिए जाएंगे तो दल और प्रत्याशियों की तो पौ बारह हो जाएगी। जो उम्मीदवार हत्या, बलात्कार, अपहरण और डकैती जैसे गंभीर मामलों में आरोपी होने के बावजूद सहज बने रहते हैं, वे आचार संहिता संबंधी मामलों की सुनवार्इ अदालतों में होने पर तो और निशिचंत एवं निरंकुश हो जाएंगे। इसलिए एक लोकतांत्रिक संवेदनशील सरकार को आचार संहिता को वैधानिक दर्जा देने के उपायों से बचना चाहिए और आयोग की स्वायतता हर हाल में बचाए रखनी चाहिए।

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