लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

गुज़रे वर्ष देश में भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर अब तक की सबसे बड़ी मुहिम छिड़ी देखी गई। अन्ना हज़ारे तथा बाबा रामदेव ने अपने-अपने तरीक़े से छेड़ी गई इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के माध्यम से बार-बार यह बात साबित करने की कोशिश की कि पूरा देश उनकी इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के साथ है तथा देश की जनता भ्रष्टाचार से निजात पाना चाहती है। इस सिलसिले में जहां बाबा रामदेव की इस मुहिम में विदेशों में जमा काला धन देश में वापस लाने तथा इस काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने जैसी लोकलुभावनी मांग सर्वोपरि थी वहीं अन्ना हज़ारे व उनकी टीम के सदस्य अपने द्वारा तैयार किए गए जनलोकपाल विधेयक को संसद में पारित कराए जाने की जि़द पर अड़े बैठे दिखाई दे रहे थे। टीम अन्ना का भी यही कहना है कि यदि देश को भ्रष्टाचार मुक्त करना है तथा भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाना है तो उनके द्वारा प्रस्तावित जनलोकपाल विधेयक ही इस का एकमात्र उपाय है।

हालांकि बाबा रामदेव व अन्ना हज़ारे द्वारा छेड़े गए इन आंदोलनों की अब हवा भी निकल चुकी है। परंतु देश में इन आंदोलनो के माध्यम से जिस प्रकार तथा जिस पैमाने पर जनता ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी आवाज़ पिछले दिनों संगठित होकर बुलंद की है उस वास्तविकता से इंकार क़तई नहीं किया जा सकता। जनक्रांति जैसे दिखाई देने वाले गत् वर्ष के इन आंदोलनों से निश्चित रूप से यह साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि देश की जनता बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार से दु:खी है तथा इसके विरुद्ध है व इस पर नियंत्रण चाहती है। इन आंदोलनों के बाद यह पहला मौक़ा है कि देश के पांच राज्य उत्तरप्रदेश,पंजाब, उत्तराखंड,गोवा तथा मणिपुर अपने-अपने राज्यों के आम विधानसभा चुनावों से रूबरू होने जा रहे हैं। यह सभी वे राज्य हैं जहां भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में आंदोलनकारी सक्रिय देखे गए थे। इनमें इत्तेफ़ाक से जहां उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है तथा वहां की वर्तमान तथा पिछली सरकारों पर भी कई बार भ्रष्टाचार के तरह-तरह के आरोप लगे हैं वहीं देश का सबसे समृद्ध व कृषि आधारित राज्य पंजाब भी शामिल है। पंजाब भी प्राय: भ्रष्टाचार के किसी न किसी बड़े मामले में सुर्ख़ियों में रहा है। जहां तक उत्तराखंड राज्य का प्रश्र है तो वहां के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे होने के चलते ही भाजपा द्वारा महज़ अपनी छवि बचाने हेतु ही चुनाव पूर्व हटाया गया था तथा उनकी जगह पर एक सैनिक की छवि रखने वाले भुवनसिंह खंडूरी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया है। अन्यथा सोचने का विषय है कि जब येदिउरप्पा को भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने हटाने के लिए सैकड़ों बहाने तलाशे व टालमटोल की फिर आख़िर वही भाजपा निशंक को इतनी आसानी से कैसे हटा सकती थी? परंतु यह क़दम महज़ चुनाव पूर्व की जाने वाली क़वायद अर्थात् ‘छवि सुधार मुहिम’ के तहत ही उठाया गया।

प्रश्र यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में जनसैलाब के रूप में दिखाई देने वाली वह जनता भ्रष्टाचार का स$फाया करने के इस चुनाव के अवसर को क्या देख नहीं रही है? देश में जहां-जहां भी प्रत्याशी चुनाव लड़ते हैं उनके विषय में क्षेत्र की जनता से बेहतर आख़िर कौन जानता है? क्या यह एक ऐसा अवसर नहीं है जबकि भ्रष्टाचार की समाप्ति की आकांक्षा रखने वाले देश के सदाचारी एवं जागरुक मतदाता प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र स्तर पर संगठित होकर, चुनाव लडऩे वाले सभी प्रत्याशियों को दलीय दृष्टिकोण अथवा जातीय नज़रिए से देखने के बजाए उनकी चारित्रिक पृष्ठभूमि को देखें? यह एक ऐसा अवसर है जबकि किसी भी प्रत्याशी के बाहुबल या उसके धनबल से प्रभावित हुए बिना इन राज्यों के मतदाता एक स्वच्छ छवि के ईमानदार,सज्जन,योग्य एवं कर्मठ प्रत्याशी को चुनाव जिता सकते हैं। भले ही वह किसी भी पार्टी का क्यों न हो, भले ही उसका धर्म व जाति कुछ भी हो अथवा भले ही वह व्यक्ति निर्धन ही क्यों न हो। निश्चित रूप से यदि इन चुनावों में दिल्ली की सडक़ों पर सक्रिय दिखाई दे रहे भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के सदस्यों ने अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभा दी तो देश की वर्तमान पारंंपरिक राजनीति के चेहरे का रंग बदल सकता है।

हालांकि यह काम इतना आसान नहीं है। क्योंकि यहां भी वही समस्या खड़ी होने वाली है जोकि अन्ना हज़ारे के आंदोलन के विफल होने के समय मौजूद थी। यानी कि ईमानदार व सदाचारी लोगों के नेटवर्क का अभाव व उनका राष्ट्रीय स्तर पर असंगठित होना। वार्ड,पंचायत, मोहल्ला स्तर पर कारगर नेटवर्क का न होना। जबकि ठीक इसके विपरीत भ्रष्टाचार से आकंठ डूबे इन राजनैतिक दलों के पास चुनाव जीतने हेतु तथा मतदाताओं को अपने पक्ष में करने व इन्हें प्रभावित करने हेतु सभी प्रकार के हथकंडे उपलब्ध हैं। और यही वजह है कि यह पारंपरिक राजनैतिक दल व इनके विजयी प्रत्याशी चुनाव जीतने के बाद पांच वर्षों तक छाती पीट-पीट कर यह कहते दिखाई देते हैं कि देश के वास्तविक प्रतिनिधि हम हैं व हमारा राजनैतिक दल है। इसकी आड़ में पांच वर्षों तक वे आंख मूंदकर जो चाहे वह करते रहते हैं जबकि टीम अन्ना के लोग इन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के भ्रष्ट आचरण पर उंगली उठाते हुए वे यह कहते ही रह जाते हैं कि जनता ने इन्हें निर्वाचित तो ज़रूर किया है परंतु इन्हें लूटने-खसोटने का लाईसेंस क़तई नहीं दिया गया है।

कहने का तात्पर्य यह कि विधानसभा के पांच राज्यों के यह चुनाव एक ऐसा अवसर हैं जबकि भ्रष्टाचार विरोधी व वास्तविक राष्ट्रहितैषी मतदाता केवल इसी एक मुद्दे को लेकर स्थानीय स्तर पर संगठित हों व किसी भी प्रकार के आपसी पूर्वाग्रहों को किनारे रखकर राष्ट्रहित में चिंतन करते हुए किसी ऐसे प्रत्याशी को निर्वाचित होने का प्रमाणपत्र प्रदान करें जोकि सदाचारी हो और जनाकांक्षाओं पर खरा उतर सके। अब इसी सिलसिले में यहां एक बात का जि़क्र करना भी प्रासंगिक है। पिछले दिनों पंजाब के अमृतसर में कई पार्टियों के नेताओं द्वारा अपने-अपने तरीक़े से नामांकन पत्र दाख़िल किए गए। लगभग सभी प्रमुख दलों के प्रत्याशियों ने भारी भीड़, रैली, शोर-शराबेे व शक्ति प्रदर्शन के साथ अपने नामांकन दाख़िल किए। इन्हीं प्रत्याशियों में एक ऐसा प्रत्याशी भी था जोकि स्वयं को अन्ना समर्थक प्रत्याशी बता रहा था। निश्चित रूप से देखने-सुनने में भी वह ईमानदार,शरीफ़ व देशभक्त सा प्रतीत हो रहा था। परंतु वह कथित अन्ना समर्थक उम्मीदवार अपनी साईकल चलाता हुआ अकेला अमृतसर की सडक़ों पर नामांकन करने हेतु जाता हुआ नज़र आया। अब यह देखकर यहां उसके चुनाव प्रचार, उसकी गति, उसके चुनाव परिणाम के हश्र के विषय में बताने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।

भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में देश के सदाचारी अवाम को स्वयं को अकेला या कमज़ोर भी नहीं समझना चाहिए। देश का चुनाव आयोग भी दिन-प्रतिदिन राजनीति में चुनाव के माध्यम से होने वाले भ्रष्टाचार तथा भ्रष्ट व अपराधी लोगों की चुनाव के माध्यम से देश की संसदीय व्यवस्था में की जाने वाली घुसपैठ पर दिन-प्रतिदिन अपना शिकंजा और अधिक कसता जा रहा है। उदाहरण के तौर पर यह पहला अवसर है जबकि चुनाव आयोग ने सभी राज्यों के चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों से चुनाव $खर्च हेतु अपना नया बैंक अकाऊंट खोले जाने का निर्देश दिया है। इन प्रत्याशियों से यह भी कहा गया है कि चुनाव संबंधी सभी लेनदेन इसी विशेष खाते के माध्यम से ही करें। ऐसा करने से चुनाव पर होने वाले असीमित काले धन के $खर्च को नियंत्रित किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त इस बार चुनाव आयोग ने समस्त प्रत्याशियों से चुनाव पूर्व एक हल$फनामा भी जमा कराने को कहा है जिसमें उन्हें अपनी चारित्रिक पृष्ठभूमि का संपूर्ण ब्यौरा जमा करना होगा। इसके अतिरिक्त उन्हें अपनी चल-अचल संपत्ति तथा धन आदि का विवरण देना होगा। प्रत्येक प्रत्याशी यह भी बताएगा कि उसके ऊपर किसी प्रकार का क़र्ज़ है अथवा नहीं। इसके साथ-साथ प्रत्येक प्रत्याशी अपनी शैक्षिक योग्यता भी निर्वाचन आयोग को बताएगा। ज़ाहिर है इतनी शुरुआती जानकारी मिलने के साथ ही उस प्रत्याशी के विषय में चुनाव आयोग व उसके माध्यम से देश के मतदाता उसके विषय में काफ़ी कुछ जानकारी हासिल कर सकते हैं।

लिहाज़ा देश के विशेषकर उपरोक्त पांच राज्यों के मतदाताओं को चुनाव आयोग के इन प्रयासों से तालमेल बिठाते हुए सार्वजनिक स्तर पर इस प्रकार की कारगर मुहिम छेडऩी चाहिए जिससे कि आम मतदाताओं की किसी प्रत्याशी से बेवजह प्रभावित होने की प्रवृति को रोका जा सके तथा देश को भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण की ओर ले जाया जा सके। सदाचारी जनता को आज नहीं तो कल यह ज़रूर सोचना होगा कि व्यवस्था को बदलने का आंदोलन व किसी प्रकार की जनक्रांति से भी आसान रास्ता केवल और केवल देश में होने वाले इस प्रकार के चुनाव ही हैं और निश्चित रूप से देशवासियों के लिए यह एक सुनहरा मौक़ा है।

 

निर्मल रानी

 

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2 Comments on "चुनाव: सदाचारियों के लिए शक्ति प्रदर्शन का सुनहरा मौक़ा"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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वोट सिर्फ प्रतियाशी के आधार पर नही दिया जाता पार्टी भी देखनी होती है, अलबत्ता आप यह समझ लो जो भी जीतेगा उसे कालेधन और भ्रष्टाचार की समस्या हल ज़रूर करनी होगी.

आर. सिंह
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निर्मल रानी जी आपने अपने लेख में ऐसे तो बहुत कुछ लिखने का प्रयत्न किया है,पर मेरे विचारानुसार ये चार बातें विशेष महत्त्व रखती है. १.हालांकि बाबा रामदेव व अन्ना हज़ारे द्वारा छेड़े गए इन आंदोलनों की अब हवा भी निकल चुकी है। २.यह एक ऐसा अवसर है जबकि किसी भी प्रत्याशी के बाहुबल या उसके धनबल से प्रभावित हुए बिना इन राज्यों के मतदाता एक स्वच्छ छवि के ईमानदार,सज्जन,योग्य एवं कर्मठ प्रत्याशी को चुनाव जिता सकते हैं। ३.यहां भी वही समस्या खड़ी होने वाली है जोकि अन्ना हज़ारे के आंदोलन के विफल होने के समय मौजूद थी। यानी कि… Read more »
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