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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-नजमून नवी खान- election1

प्रकति के बनाये हूये तीन मौसम हमें मिले जिन्हें हम सर्दी, गर्मी और बरसात के नाम से जानते हैं, इनके अलावा हम इंसानों ने भी एक मौसम बनाया है जिसे हम सभी चुनावी मौसम के नाम से जानते हैं। ये सबसे सुहाना मौसम होता है जिसमें ना कोई छोटा है ना कोई बड़ा। देश के नागरिकों की इस मौसम में ना कोई जाति होती है, ना कोई धर्म, ना कोई अमीर होता है, ना कोई गरीब। सारे के सारे होते हैं तो बस वोटर। चारों ओर वादों की फसल लहरा रही होती है। हमारे देश के माननीय भी इस मौसम की आबो-हवा से उर्जा से लबरेज हो जाते हैं और एक दल से दूसरे दल में कूद-फांद करने लगते हैं। पांच साल तक रीढ़ की हड्डी सीधी रखने वाले नेताओं की हड्डी झुकती है और परिणामस्वरूप जनता के पैरों तक उनके हाथ पहुंचने लगते हैं हमारे देश में हर योग्य व्यकित के सेवानिवृत्त होने की एक उम्र निर्धारित होती है, लेकिन हमारे नेताओं के लिए ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होता है। हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों के लिए योजनाएं अंगूठा टेक बनाते हैं। हमारे देश में जिसके पास कोई काम नहीं होता है, वो नेता बन जाता है और कमाई के मामले में बड़ों-बड़ों को पीछे छोड़ देता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जो जितना बड़ा अपराधी है, उसको उतना ही बड़ा पद मिलता है। नेता बनने के लिए अपराधी होना क्वालिफाइंग योग्यता बनती जा रही है। लोकतंत्र अब नेतातंत्र में बदलता जा रहा है। वोटबैंक के लिए देश के टुकड़े किए जा रहे हैं। चुनावी मौसम नियमत: तो पांच साल बाद आता है, लेकिन कभी-कभी ये उससे पहले भी आ जाता है। राजनीति निजी स्वार्थों को पूरा करने का ही नाम है- पांच साल पहले आने वाली स्थिति तभी बनती है, जब स्वार्थों की सिद्दी में बाधा उत्पन्न होने लगती है। हमारे देश के नेता कभी भी वृद्धावस्था को प्राप्त नहीं होते हैं। 70-80 साल के नेता भी युवा दल का प्रतिनिधित्व करते प्राय: नजर आ जाते हैं। कुछ नेता जो जनता की बद्दुआओं का असर, या हो सकता है ईश्वरीय प्रकोप हो और वो चलने फ़िरने में सक्षम ना हो, वो भी सूचना प्राद्योगिकी का इस्तेमाल करके राजनैतिक अखाड़े में हट्टे-कट्टे को भी पटखनी देते हैं। एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच तक एक दूसरे को फूटी आंख ना सुहाने वाले और शब्दों के कटीले तीर छोड़ने वाले मौके की नजाकत (दूसरे की जनता में बढ़ती प्रतिष्ठा) देखकर ऐसे दिखते हैं, जैसे गुड़ में चिपका चीटा नेता के लिए जनता अपने आपसी संबंधों में खटास घोल लेती है। नेता आपस में मिलकर सत्ता का सुख भोगते हैं, एक बार फिर से चुनावी मौसम हम सब के सामने है। हमको दलगत भावना से उठ कर अपराधियों को संसद जाने से रोकना होगा, तभी हमारा लोकतंत्र मजबूत बनेगा और जनता का क्ल्याण होगा, निर्वाचन आयोग काफ़ी जागरुकता और सतर्कता बरतता है, फिर भी अपराधी निर्वाचित होकर संसद पहुंचते हैं। आयोग को सारे प्रत्याशियों का आपराधिक रिकॉर्ड क्षेत्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित करना चाहिए, जिससे मतदाता सही चयन करके प्रत्याशियों को मत प्रदान कर सके।

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