लेखक परिचय

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी

लेखक एन.डी. सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष हैं।

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इन दिनों भारत में चुनाव सुधार और चुनावी तौर-तरीकों में बदलाव की बयार तेज है |ऐसा कृत्रिम वातावरण निर्मित किया जा रहा ,कि लगता है की भारत के सब राज नेता और राजनितिक दल चुनाव सुधार करके ही दम लेंगे |भारत में लोकतंत्र का ये यज्ञ पहली बार सन १९५२ में हुआ था | इन प्रथम आम चुनावों में प्रत्याशी के नाम का बक्सा होता था जिसमें आपको मत डालना होता था ,फिर मतपत्र और अब वोटिंग मशीन यानि बदला है तो सिर्फ मत व्यक्त करने का तरीका |मत व्यक्त करने के इस तरीके में बदलाव भर से लोकतंत्र को हो रही इस सतत क्षति पर विराम लगता नहीं दिख रहा |

 

बड़ी आवशकता इस सम्पूरण निर्वाचन प्रक्रिया में शीर्ष से लेकर नीचे तक बदलाव करने की है|दुर्भाग्य से यह सब हुक्मरानों की प्राथमिकताओं में शुमार नहीं है |देश में समय-समय पर चुनाव सुधार की बातें तो बहुत हुई है ,लोकतंत्र के मठाधीशों ने इस बारें में जबानी जमा खर्च भी खूब किया है ,और अब भी कर रहें है लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं हुआ है|अब तो विख्यात संत महात्मा भी कह रहें है ,कि छोटे अपराधी जेलों में और बड़े अपराधी लोकतंत्र के मंदिरों में बैठे हुए है |सिर्फ टी.एन,शेषन के अतिरिक्त कोई भी भारत निर्वाचन आयोग को एक स्वायत संस्था के रूप में बहुत मजबूत से नहीं खड़ा रख पाया |निशचय ही पहले से तो स्तिथियाँ बहुत ठीक है ,लेकिन अमूल-चूल परिवर्तन की जगह अभी शेष है |

 

आज सबसे बड़ा संवाद इस पर है कि कैसे अपराधिक प्रवृती के लोग लोक सभा और विधान सभाओं से दूर रह सकें|कुछ ऐसा हो जाये ,कि ये अपराधी निर्वाचन प्रक्रिया की के पहले कदम यानी निर्वाचन नामांकन के स्तर पर ही इस प्रक्रिया से बाहर हो जायें |देश के कानून की विसंगातियों का पूरा लाभ लेकर ऐसे लोग आज निर्लाज्त्ता के साथ हमारे सांसद और विधायक भी है|दुखद यह है कि नियमनुसार ये सब उस कानून के निर्माता और संशोधानकर्ता है ,जो कथित रूप से इनकी जेब में है या ये उस कानून को तोडने के आदी है|

 

देश में आम चुनावों को लोकतंत्र की गंगा माना जाता है |वास्तविक गंगा के समान ये चुनावी गंगा भी दूषित और प्रदूषित हो चुकी है |इस को निर्मल और स्वचछ करने के प्रयास गंभीरता पूर्वक होंने जरूरी है| देश के कानून और न्याय मंत्रालय ने इसका खाका लगभग तैयार कर लिया है | इस वर्ष स्वतंत्र दिवस तक वे सुझाव सामने आ जायेंगे जो देश की चुनावी प्रक्रिया को अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की गंदगी से दूर रख सकेंगे|

 

वर्तमान समय में अपराधी लोक सदन में इस बात की आड़ लेकर पहुच जातें है कि महज एफ आई आर से कुछ नहीं होता ,जब तक की न्यायालय हमें दोषी करार न करें |इस के बाद भी उच्च न्यायलयों में अपील कर काम चलाया जाता है और लोक तंत्र के लोक यह सब जानने समझाने के बाद भी असहाय है|वर्त्तमान लोकसभा में भी एक सौ पचास से ज्यादा सांसद ऐसे है ,जो गंभीर किस्म के मामलों में आरोपी है ,लेकिन अंतिम फैसला ना होने के कारण हमारे और आपके कर से मिले पैसे से खूब वेतन भत्ते और सुविधाएँ ले रहें है और मजे में है |

 

अपराधीकरण के साथ खर्चीली हो रही ,चुनाव प्रक्रिया से सब हैरान है .राज नेताओं के भ्रष्ट आचरण का एक बड़ा कारण यह भी है |चुनाव में वोट कबाड़ने के लिए इतना पैसा लगता है कि बिना काले धन के चुनाव लड़ा ही नहीं जाता जीतना तो दूर की बात है |यह चुनाव से जुड़े नेता अधिकार भी जानते है, पर व्यस्वस्था को बदलने का साहस किसी में नहीं है |सरकार ने विधान सभा के लिए दस लाख और लोकसभा के लिए पच्चीस लाख की सीमा रखी है |जिसे अब बढ़ाकर क्रमशःसोलह और चालीसा लाख करने का प्रस्ताव है| फिर प्रत्याशी भी इसका दुगना –तिगुना काला धन इस हवन में स्वहा करेंगे जो मुख्यता शराब ,पैसा ,सायकिल से लेकर अब तो दुपहिया वाहन तक बांटने में लगता है| इस सबके हिसाब किताब का दिखावा भी होता है और सब ठीक मान लिया जाता है |नियम –कायदे बताने और बनान वाले हमारे नेता और अफसर जब नैतिकता की बात करते है तो वो बात खोखली और ढकोसला प्रतीत होती है ,क्योकी अब विचार और भाषण कुछ और एवं आचरण कुछ और ही होता है |

चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाने का सरकारी प्रस्ताव तो इसे और भ्रष्ट कर देगा |जरुरत तो पूरी प्रक्रिया को नए सिरे से परिभाषित करने की है |नामांकन की विशाल रैलियों से लेकर प्रचार के शोर-शराबे और झूठे चुनावी घोषण पत्रों और वादों पर रोक लगनी चाहिए एवं जो दल अपने चुनावी वादे समय सीमा में पूर्ण ना करें उसका हिसाब लगाकर उस दल और उसके प्रताय्शी के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाही होनी चहिये नहीं नेता ऐसे झूठे वादे से हमें बहलाते रहेंगे |

ऐसे ही प्रचार प्रसार के लिए झंडे –डंडे और मोटर गाडियों के स्थान पर समाचार पत्रों में कुछ अतिरिक पृष्ठ देकर उसकी मध्यम से प्रचार हो ,वैसा ही कुछ टी.वी.चैंनल करें जो दिन में चार या छह घंटे सिर्फ चुनाव प्रचार के लिए दें| प्रचार के लिए बड़ी स्क्रीन के वाहन हो जिस से प्रत्याशी अपनी बात रख सके और ये वाहन पूरे चुनाव क्षेत्र में घूम कर प्रचार करें | इनका पैसा सीधे पार्टी के खातों से प्रचार करने वाले को जाये |

 

जनता से सीधे मिलने के स्थान पर ऐसा कुछ हो तो चुनावी भ्रष्टाचार स्वत ही समाप्त हो जायेगा क्योकी सार्वजनिक रूप से जो आप किसी को वोट के लिए नोट नहीं दे सकते और आम जनता भी चुनाव शोर शाराबे से मुक्त रहेगी वही पूरा प्रचार रिकोर्ड में दर्ज रहेगा जिसकी समीक्षा कभी कि जा सकेगी ताकि असत्य वादों का हिसाब लिया जा सकें |

लेकिन यह सब इतनी आसनी से बदलने वाला नहीं है क्योकि जिन्हें इस बदलवा को हरी झंडी देनी है वे हमारे भ्रष्ट राज नेता ही है |जो इतनी आसानी से अपना काम नहीं खराब करेंगे |

लेकिन इन सब के लिए चेतावनी है ,कि मिस्त्र भारत से ज्यादा दूर नहीं है व्यवस्था परिवर्तन की हवा देश में कभी भी चल सकती है बस वातावरण निर्मित होने की देर है |

 

लेखक – एन .डी.सेंटर फॉर सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष है |

 

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2 Comments on "आसान नहीं है भारत में चुनाव सुधार"

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sunil patel
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श्री चतुर्वेदी जी ने बिलकुल सही कहा है. सही कह रहे है की “लेकिन यह सब इतनी आसनी से बदलने वाला नहीं है क्योकि जिन्हें इस बदलवा को हरी झंडी देनी है वे हमारे भ्रष्ट राज नेता ही है |जो इतनी आसानी से अपना काम नहीं खराब करेंगे”
फिर भी आशा नहीं छोड़ी है की “मिस्त्र भारत से ज्यादा दूर नहीं है”
बस इतजार है की कब देश की जनता स्वप्न जाल से उठेगी. कब हम अपनी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी और कर्तव्यों के प्रति इमानदार बनेंगे.

डॉ. महेश सिन्‍हा
Guest

यह वोट की व्यवस्था फेल हो चुकी है। जरूरत है भौगोलिक प्रतिनिधियों की जिनहे जनता स्वयं चुने और ये प्रतिनिधि अपने ऊपर के प्रतिनिधि चुने। जनता केवल एक बार 5 वर्ष में अपना प्रतिनिधि चुने और देश का नेता भी चुने। कहीं यह सुझाव भी आया है की प्रतिभागी एक परीक्षा में भाग लें और विजयी को चुना जाये ।

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