लेखक परिचय

विनोद बंसल

विनोद बंसल

लेखक इंद्रप्रस्‍थ विश्‍व हिंदू परिषद् के प्रांत मीडिया प्रमुख हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन।

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विनोद बंसल

श्री अन्ना हज़ारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ़ छेड़ी गई जंग ने चुनाव सुधारों के विषय में भी एक नई बहस को भी जन्म दिया है। आज लोकतंत्र में वोटर बड़ा है या जन प्रतिनिधि, जनता बड़ी है या संसद, जनता के लोकतांत्रिक अधिकार बड़े हैं या सांसद के विशेषाधिकार, चुने हुए प्रतिनिधि के अधिकार बड़े हैं या उसको चलाने वाली पार्टी के मुखिया के अधिकार आदि अनेक प्रश्न हमें झकझोर रहे हैं। न जनता को अपने अधिकारों का पूरा बोध है और न ही जन प्रतिनिधि को अपने कर्तव्यों की चिन्ता। हमारी शासन प्रणाली भी वोट केंद्रित राजनीति की दलदल में फंस गयी है। जनता को अपनी बेहद जरूरी मांग व अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी लम्बे संघर्ष करने पड़ते हैं। अभी हाल ही में बारह दिन तक चला अनशन पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल तो बन गया किन्तु देश की व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन और जनता के संवैधानिक अधिकारों संबन्धी अनगिनत सवाल हम सबके सामने छोड़ गया। एक स्वस्थ शासन प्रणाली विकसित करने के लिये देश के शीर्ष संस्थानों एवं राजनैतिक व्यवस्था में शीघ्र परिवर्तन करने होंगे। एक ओर जहां देश के कर्णधारों(जन प्रतिनिधियों) को जगाना होगा वहीं दूसरी ओर जनता को भी खडा कर उसकी राजनैतिक जिम्मेवारी सुनिश्चित करनी होगी।

निम्नांकित बिंदु इस दिशा में बड़े प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं:-

1. वोट डालने के अधिकार के साथ कर्तव्य-बोध।

2. वोट न डालने पर दण्ड का प्रावधान।

3. यदि चुनाव में खड़े सभी प्रत्याशी अयोग्य हों तो किसी को भी न चुनने का अधिकार।

4. चुनाव में खड़े होने के लिये न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता हो।

5. राजनैतिज्ञों के रिटायरमेंट की भी कोई अवधि हो।

6. जाति, मत, पंथ, संप्रदाय, भाषा, राज्य के आधार पर वोट मांगने वालों के खिलाफ कार्यवाही।

7. सांसदों व विधायकों के द्वारा किये कार्यों का वार्षिक अंकेक्षण (ऑडिट) कर उसे सार्वजनिक करना अनिवार्य हो।

8. सदन व जनता से दूर रहने वाले नेताओं पर कार्रवाई हो।

9. देश के राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र हो तथा सदन का नेता हाईकमान के थोपने से नहीं बल्कि चुनाव से तय हो।

10. देश के अन्दर कानून बनाने या उसमें संशोधन करते समय जनता की राय ली जाए तथा सांसदों को उस संबन्ध में स्वतंत्र मत व्यक्त करने का अधिकार हो।

हालांकि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के आने से वोट डालना कुछ आसान एवं प्रमाणिक तो हुआ है किंतु अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। आज कम्प्यूटर का युग है, हमें ऐसी प्रणालियां विकसित करनी होंगी जिससे देश का प्रत्येक मतदाता, विशेषतया तथाकथित उच्च वर्ग, जिसमें उधोगपति, प्रशासनिक अधिकारी, बुद्दिजीवी व बड़े व्यवसायी इत्यादि आते हैं, अपनी सुविधानुसार मताधिकार का प्रयोग कर सकें। यह वर्ग ही सही मायने में देश को चलाता है, किंतु देखा गया है कि ये अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। घर बैठे ई-वोटिंग जैसे प्रावधानों पर भी विचार करना होगा। जीवनभर देश से हम कुछ न कुछ लेते ही रहते हैं। आखिर एक वोट भी अपने राष्ट्र के लिये समर्पित नहीं किया तो हमारी नागरिकता किस काम की, ऐसा भाव प्रत्येक नागरिक में जगाना होगा। वोट न डालने पर यदि आवश्यक हो तो दंड की व्यवस्था भी की जा सकती है।

किसी भी मतदाता पर यह दबाव न हो कि चुनाव में खड़े हुए किसी न किसी एक प्रत्याशी को तो उसे चुनना ही है, लेकिन यह दबाव ज़रूर हो कि उसे वोट डालना ही है। इसके लिए ईवीएम में प्रत्याशियों की सूची के अंत में एक बटन – ‘‘उपरोक्त में से कोई नहीं’’ भी हो जिससे कि मतदाता यह बता सके कि सभी के सभी प्रत्याशी मेरे हिसाब से चुनने योग्य नहीं हैं। यदि मतदान का एक निश्चित प्रतिशत ‘‘उपरोक्त में से कोई नहीं’’ को चुनता है तो उस चुनाव में खड़े हुए सभी प्रत्याशियों को अगले कुछ वर्षों के लिये चुनावों से अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। ऐसा होने से देश के कानून निर्माताओं (सांसद/विधायक) की सूची में से असामाजिक तत्वों व चरित्रहीन व्यक्तियों को अलग रखा जा सकता है। साथ ही मतदाताओं की इस मजबूरी का फायदा राजनेता नहीं उठा पायेंगे कि उन्हें किसी न किसी को तो चुनना ही है। वर्तमान में भी मतदान केन्द्र पर फ़ार्म 49(O) भर कर मतदाता अपने “नो वोट” के इस अधिकार का प्रयोग तो कर सकता है किन्तु उसका यह वोट न तो गिना ही जाता है और न ही गुप्त मतदान के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा ही कर पाता है क्यों कि यह फ़ार्म सभी पोलिंग एजेन्टों के सामने भरा जाता है।

हमें यदि नौकरी की तलाश करनी है या अपना कोई व्यवसाय चलाना है तो विद्यावान होना बहुत जरूरी है। एक अच्छा पढ़ा लिखा व्यक्ति ही एक अच्छी नौकरी पा सकता है। साथ ही उसके काम करने की एक अधिकतम आयु भी निश्चित होती है। बीच-बीच में उसके कार्यों का वार्षिक मूल्यांकन भी होता है। जिसके आधार पर उसके आगे के प्रमोशन निश्चित किये जाते हैं। आखिर ये सब मापदण्ड हमारे राजनेताओं के क्यों नहीं हो सकते? चुनाव में खड़े होने से पूर्व उनकी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता, आयु, शारीरिक सामर्थ्य की न सिर्फ जांच हो बल्कि सेवा निवृत्ति की भी आयु सीमा निश्चित हो।

कहीं जाति पर, कहीं भाषा पर तो कहीं किसी विशेष सम्प्रदाय को लेकर लोग आपस में भिड़ जाते हैं। जो आम तौर पर कहीं न कहीं, किसी न किसी राजनेता के दिमागी सोच का परिणाम होता है क्योंकि उन्हें तो किसी एक समुदाय की सहानुभूति वाले वोट चाहिये। ऐसी स्थिति में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी राजनेता किसी भी हालत में जनता को इन आधारों पर न बांट सके। चुनावों के दौरान प्रकाशित ऐसे आकड़ों या समाचारों को हमें रोकना होगा जिनमें किसी जाति, भाषा, राज्य, मत, पंथ या सम्प्रदाय का ज़िक्र हो।

जन प्रतिनिधियों की जनता के प्रति एक जबाबदेही होनी चाहिए। जिससे यह तय हो सके कि आखिर जनता के खून-पसीने की कमाई के पैसों का कहीं दुरुपयोग तो नहीं हो रहा। प्रत्येक जन-प्रतिनिधि को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कितने घंटे वह जनता के बीच तथा कितने सदन में बितायेगा। उपस्थिति एक न्यूनतम मापदंड से कम रहने पर, आवंटित धन व योजनाओं का समुचित प्रयोग क्षेत्र के विकास में न करने पर या किसी भी प्रकार के दुराचरण में लिप्त पाये जाने पर कुछ न कुछ दण्ड का प्रावधान भी हो।

जन प्रतिनिधियों के कार्य का वार्षिक अंकेक्षण (ऑडिट) व उसका प्रकाशन अनिवार्य होना चाहिए। इसमें न सिर्फ आर्थिक वही-खातों की जांच हो बल्कि वर्ष भर उसके द्वारा किये गये कार्यों की समालोचना भी शामिल हो। क्षेत्र की जनता को यह पता लगना चाहिए कि उसके जनप्रतिनिधि ने उनके विकास के लिये क्या-क्या योजनायें लागू करवाईं, किन समस्याओं को लोकतंत्र के मंदिर में उठाया, कितने कानून बनाने में या उनके संशोधनों में अपनी भूमिका सुनिश्चित की तथा क्या उन विधायी कार्यों के निस्पादन के समय अपने क्षेत्र की समस्याओं का भी ध्यान रखा। जिस प्रकार नौकरी या स्कूल से एक निश्चित अवधि से अधिक अनुपस्थित रहने पर विद्यार्थी/कर्मचारी को निकाल दिया जाता है। उसी प्रकार संसद या विधान-सभाओं में भी कुछ इसी तरह के प्रावधान हों।

कभी कभी हमारे प्रतिनिधि भी अपनी पार्टी या सरकार के तानाशाही रवैए के कारण अपने आपको असहाय पाते हैं। देश की राजनैतिक पार्टियों के शिखर पर बैठे राजनेता भी वंशवाद व जातिवाद के स्थान पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चयनित होने चाहिए। सदन का नेता भी सिर्फ़ पार्टी हाई कमान के निर्देश पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक पद्धति से चुना जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त विधायी कार्यों के निष्पादन के समय जन प्रतिनिधि को अपनी बात रखने की पूरी आज़ादी हो, न कि पार्टी हाई कमान का डंडा हमेशा उसके सर पर लटका रहे। आम तौर देखा गया है कि अपने पार्टी हाई कमान की अनुमति से ही कुछ चुनिंदा जन प्रतिनिधि ही मीडिया के सम्मुख अपनी बात रख सकते हैं जबकि सभी जन प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का अधिकार होना चाहिए जिससे वे अपनी क्षेत्रिय समस्याओं को इन माध्यमों से भी उठा सकें। इसके अलावा किसी भी नये कानून को सदन में पारित करने से पूर्व जनता की राय ली जाए।

इस प्रकार जब देश का प्रत्येक नागरिक स्वच्छंद रूप से राष्ट्रीय जिम्मेदारी समझते हुए एक योग्य व्यक्ति को अनिवार्य रूप से मतदान कर सदन में भेजेगा तथा जन-प्रतिनिधि बिना किसी भय या वोट के लालच के जनहित में रुचि लेगा तथा विधायी कार्यों का निष्पादन निष्पक्षता पूर्वक करेगा तभी होगा सही मायने में भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण।

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3 Comments on "चुनाव सुधारों से होगा भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण"

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Satyarthi
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अधिकतर विचारक इस बात पर सहमत हैं की देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का एक प्रमुख स्रोत हमारी निर्वाचन प्रणाली है. ऐसा माना जाता है की एक लोक सभा चुनाव लड़ने के लिए कई करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं कुछ पार्टियाँ तो उन्ही प्रत्याशियों को टिकट देती हैं जो पार्टी को एक करोड़ अर्पित करें. चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा दस लाख रूपए निर्धारित है पर यह नियम केवल कागजों पर ही रहता है ऐसे में कोई निस्वार्थ जनसेवक कैसे चुनाव लड़ सकता है. और जो जीत कर आते हैं वह पहले खर्च की भरपाई,अगले चुनाव के लिए तैयारी और… Read more »
Anil Gupta,Meerut,India
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Anil Gupta,Meerut,India
श्री विनोद जी का लेख कुछ बुनियादी सवाल कहदे करता है लेकिन उनके उत्तर सतही प्रतीत होते हैं. मेरे विचार में केवल चुनाव सुधारों से ही देश का भला नहीं हो सकता, हमारी बहुत सी समस्याएं उधर ली गयी शाशन पद्धति के कारन हैं. जो कुछ अंग्रेजों ने १९३५ के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट, १९३५ में कहा, कमोबेश वही हमने लगभग ढाई साल की मशक्कत और बहस के बाद भारत के संविधान के रूप में अपना लिया. जो कुछ अपना हो सकता था उसे मजबूरी मान कर डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पालिसी के अध्याय में दाल दिया. जिसे सर्वोच्च न्यायालय… Read more »
Shailendra Saxena
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हम होंगे कामयाब एक दिन ………… आजकल राजनीति मैं सुधार की बातें चल रही हैं . अनेक प्रकार के विचारक अपने -अपने विचार दे रहें हैं . परन्तु ऐसा लगता है कि राजनेतिक दलों को इससे कोई सरोकार नहीं है भारत के सारे दल जो संसद मैं भ्रस्टाचार समाप्त करने के लिए अन्ना जी या राम देव जी या फिर किसी अन्य विचारक का समर्थन करते हैं वे सारे अन्दर ही अन्दर डरें हुए हैं उन्हें लगता है कि यदि अन्ना जी का जन लोकपाल बिल पास हो गया तो उनकी चलती हुई दूकान बंद हो जायेगी अभी तो अन्ना… Read more »
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