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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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सलमान अब्दुस समद 

बिजली की किल्लत से जुझ रहे बिहार को राज्य में स्थापित एनटीपीसी से पचास प्रतिशत बिजली देने के केंद्र का आश्वासन राज्य के लोगों के लिए राहत देने वाली खबर है। इसे राजनीतिक हित से उपर उठकर राज्य के लिए राजनीतिक दलों के प्रयास का परिणाम ही कहा जाएगा। इस वक्त राज्य में मुख्यतः तीन कहलगांव (भागलपुर), बरौनी और कांटी (मुज़फ्फरपुर) में थर्मल पावर स्टेशन कार्यरत हैं इनमें कहलगांव एनटीपीसी के अंतर्गत है जबकि बाकि दो राज्य की ईकाईयां हैं। जो जर्जर हो चुके हैं। इनमें उत्पादन लगभग ठप्प हो गया है। राज्य सरकार की ओर से थर्मल पावर के पुनर्निर्माण के लिए विशेष प्रयास किए जाने की कोशिश की जा रही है। इसके अतिरिक्त अन्य जिलों में भी थर्मल पावर के निर्माण की योजना को मूर्त रूप देने के प्रयास किए जा रहे हैं। जिनके चालू होने के बाद बिहार को बिजली की किल्लत से छुटकारा मिल सकता है। बिजली की उपयोगिता से किसी को इंकार नहीं हो सकता है। षहरीकरण को बढ़ावा देने में बिजली का प्रमुख स्थान है। शिक्षा के क्षेत्र में भी अप्रत्यक्ष रूप से बिजली का विशेष योगदान होता है। अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और विकास की रफ्तार को बढ़ाने में भी बिजली का प्रमुख स्थान रहा है। ऐसे में यह साफ है कि इसके बगैर विकास की कल्पना अधूरी है। बिहार की अधिकांश निगमें और उद्योग इसकी कमी के कारण या तो बंद हो चुके हैं अथवा बंद होने के कगार पर हैं।

बिजली की कमी और उससे होने वाले नुकसान का मैं एक छोटा सा उदाहरण देना चाहुंगा। बिहार का दरभंगा जिला राज्य के अन्य जिलों की अपेक्षा शिक्षा और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से काफी अहम मायने रखता है। आजादी के पूर्व से ही राजा महाराजओं के साथ साथ यह जिला शिक्षा का भी केंद्र बिंदु रहा है। इसमें करीब 18 ब्लॉक हैं। जिनमें कुशेश्‍वरस्थान भी प्रमुख है। जो शहर से करीब 62 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में स्थित है। इसके अंतर्गत 14 पंचायतें और 69 गांव शामिल हैं। जिनमें कुल मिलाकर 35 हजार 590 घर हैं। पश्चिमी कुशेश्‍वरस्थान ब्लॉक की कुल आबादी एक लाख 31 हजार 75 है। यहां साक्षरता की दर महज 34 प्रतिशत है। जिनमें 49 प्रतिषत पुरूश और 17 प्रतिशत महिला साक्षरता की दर है। जो औसत से काफी कम है। हालांकि संतोषजनक बात यह है कि इस क्षेत्र में महिला और पुरूष की आबादी समान है। यह क्षेत्र भी बिजली की किल्लत के कारण विकास की रफ्तार में कोसों दूर है। इस क्षेत्र का मैं विशेष उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि क्योंकि यह जिले का सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र रहा है। कोई दो चार वर्ष पूर्व इस ब्लॉक में आननफानन में खंभे लगाए गए थे और ट्रांसफर्मर तथा तारें बिछा दी गईं थीं। यहां तक कि बीपीएल कार्ड वाले परिवारों के घर बिजली के मीटर भी लगा दिए गए थे। घोषणा की गई कि उन्हें 40 यूनिट बिजली फ्री दी जाएगी। लोगों को यह उम्मीद जगी कि शायद अब उनका गांव भी जगमग हो उठेगा। परंतु धीरे-धीरे यह केवल ख्याली पुलाव ही साबित हुआ। ट्रांसफर्मर में जंग लग गए, तार को चोरों ने काट डाला लेकिन बिजली पहुंचाने का कोई इंतजाम नहीं किया गया। आज भी जहां तहां पड़े खंभे बिजली विभाग की बेख्याली की दास्तां सुना रहे हैं। इलाके में अबतक बिजली नहीं आने का बाढ़ को भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।

ऐसे में कई सवाल उभरकर सामने आते हैं जैसे कि यदि बाढ़ इस क्षेत्र में बिजली के विकास में बाधा है तो उसे रोकने का उपाय किए बगैर खंभे, ट्रांसफर्मर, तार और मीटर क्यूं लगाए गए? इसे लगाकर सरकारी सामानों का दुरूपयोग क्यूं किया गया? बाढ़ रोकने के उपायों पर गंभीरता से अमल करने की बजाए आननफानन में तारें क्यूं बिछा दी गईं? इस योजना को किस दृष्टिकोण के तहत पूरा करने की कोशिश की जा रही थी? हालांकि देश भर में राजीव गांधी विद्युतीकरण अभियान को बिहार में भी लागू किया गया है। इसकी शुरूआत 2005 में हुई थी। जिसके तहत 2012 तक सभी सौ से अधिक की आबादी वाले गांव में बिजली पहुंचाई जाएगी। तकरीबन 1.71 करोड़ बीपीएल परिवार को मुफ्त बिजली कनेक्शंन, 99 हजार से अधिक बिजली से महरूम गांवों में बिजली पहुंचाने का काम पूरा, 2.14 लाख से अधिक विद्युतीकरण का काम जोरों पर। इस काम को पूरा करने के लिए सरकार की ओर से पैसों की कोई कमी नहीं की जा रही है। इसके बावजूद इन क्षेत्रों में बिजली का काम न होना इस परियोजना के अधूरे होने का अहसास दिलाता है।

इस संबंध में विशेषज्ञ डॉक्टर एमजे वारसी का कहना है कि बिजली की समस्या को हल कर कई अन्य कठिनाईयां भी दूर की जा सकती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में जहां सुधार होगा वहीं कई वर्षों से बंद पड़े उद्योग धंधे में भी जान डाली जा सकती है। क्योंकि इसकी कमी से अबतक कई योजनाओं को आज तक शुरू नहीं किया जा सका है जिससे न सिर्फ क्षेत्र को फायदा होता बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक पहल नजर आता।

बिजली की किल्लत का प्रभाव धीरे धीरे गांव से निकलकर शहरों में भी नजर आ रहा है। कई कई घंटे शहरों में भी बिजली कटी रहती है। विशेष बात यह है कि बिजली सुधार के भले ही अबतक कोई ठोस उपाय नहीं किए गए हैं परंतु राज्य के उपभोक्ताओं पर बिल का एक बड़ा बोझ लादने की कोशिश जरूर की है। राज्य बिजली बोर्ड ने बिजली की कीमत में पचास प्रतिशत की बढ़ोतरी का एलान किया था। लेकिन राज्य बिजली रेगुलेटरी कमीशन ने उसके सभी तर्क को खारिज करते हुए उपभोक्ताओं को भारी राहत दी और केवल 12.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी की ही इजाजत दी। बढ़ी कीमत के बाद अब उपभोक्ताओं को 100 यूनिट तक के लिए पहले के 2.50 रूपए की जगह 2.60 रूपए देने होंगे जबकि 100 से 200 यूनिट तक 3.10 की जगह 3.20, 200 से 300 यूनिट के लिए 3.75 के बदले 3.85 रूपए खर्च करने होंगे। बढ़ी हुई कीमत एक अप्रैल से लागू हो चुकी है।

प्रश्‍न यह उठता है कि यदि 2012 तक सभी गांवों में विद्युतीकरण का काम पूरा किया जाना है तो कुशेश्‍वरस्थान जैसे गांवों में अबतक इसकी शुरूआत क्यूं नहीं हुई है? इसे योजना से दूर रखने का क्या कारण है? यदि गांव में बिजली पहुंचाने का काम किया जाना है तो जिन गांवों में इसे अबतक पूरा नहीं किया जा सका है उसके लिए त्वरित कार्य के तहत क्या योजनाएं बनाई जा रही हैं? यदि कोई क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित है तो वहां इस संबंध में कोई ठोस नीति अबतक क्यूं नहीं तैयार की जा रही है? जहां तक पश्चिमी कुशेश्वरस्थान का संबंध है तो केवल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने के कारण यहां विद्युतीकरण का कार्य ठप्प करना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि बाढ़ के बावजूद इसके आसपास के क्षेत्रों में बिजली आ रही है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह केवल बाढ़ के नाम पर इस क्षेत्र के ग्रामीणों को बिजली की रोशनी से महरूम करने की बजाए उन्हें जल्द से जल्द इसकी सुविधा उपलब्ध कराए। क्योंकि वक्त गुजरने के साथ ही विकास के पथ पर यह क्षेत्र राज्य के अन्य हिस्सों से पिछड़ता जाएगा। (चरखा फीचर्स)

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