लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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-डॉ कुलदीप चंद अग्निहोत्री

पिछले कुछ सौ सालों से मतांतरण के कारण कश्मीरी हिंदुओं की संख्या लगातार घटती जा रही है। अनेकानेक कारणों से अधिकांश कश्मीरी हिंदू इस्लाम मजहब में दीक्षित हो गए। लेकिन फिर भी कश्मीर घाटी में लगभग 4 लाख हिंदू बचे रहे जिन्होंने तमाम प्रलोभनों को ठुकराते हुए और शासकीय अत्याचारों को सहते हुए भी अपने पंथ अथवा मजहब का त्याग नहीं किया। ये कश्मीरी हिंदू इस्लामी कट्टरवारी ताकतों की किरकिरी बने हुए थे क्योंकि इस्लामी शासन तभी तक सहिष्णु है जब तक राज्य में इस्लाम पंथी अल्पमत में हैं। लेकिन जैसे ही किसी क्षेत्र में इस्लाम पंथी निर्णायक बहुमत में आ जाते हैं वहां वे अन्य मतावलंबियों को या तो दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखते हैं या फिर उन्हें इस्लाम में दीक्षित करने का प्रयास करते हैं। इन दोनों प्रयासों में यदि वे असफल हो जाते है तो वे उनको डराकर वहां से भगाने का प्रयास करते हैं। कश्मीर घाटी में पिछले तीन -चार दशकों से लगभग यही हो रहा है।

इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर छोडने का फतवा जारी कर दिया और उस पर अमल करवाने के लिए स्थान -स्थान पर उनकी निरीह हत्याएं भी करनी शुरु कर दी। अब इन कश्मीरी हिंदुओं के पास दो ही रास्‍ते बचे थे। या तो वे अपने परंपरागत पंथ को छोडकर मुसलमान बन जाए या फिर कश्मीर घाटी छोड दें। कश्मीर के हिंदू और सिक्खों ने इस दूसरे रास्ते को ही चुना। दुर्भाग्य से कश्मीर घाटी में से हिंदुओं के इस सफाया ऑपरेशन में राज्य की सरकार ने भी अपनी लज्जाजनक हिस्सेदारी निभायी। वह उन्हें सुरक्षा देने में तो असफल सिद्ध हुई ही। साथ ही, उनके मकानों और सम्पत्ति पर मुसलमानों द्वारा बलपूर्वक कब्जा किए जाने पर सरकारी प्रशासन षडयंत्रपूर्ण ढंग से आंखे ूमंदे रहा। इस सब का नतीजा यह हुआ कि कश्मीर घाटी में से इक्का -दुक्का हिंदू परिवारों को छोडकर शेष सभी परिवार पलायन कर गए। इतिहास के सबसे भयानक इस पलायन पर न तो तथाकथित मानवाधिकारवादी बोले और न ही केन्द्र सरकार केन्द्र सरकार के कानों पर जूं रेंगी। सोरहाबुद्दीन और इसरतजहां जैसे खूंखार आतंकवादियों की मौत पर दिन रात आंसू बहाने वाली तीस्ता सीतलवाड और अरुंधति रॉय जैसी तथाकथित पराक्रमी जीवों के मुंह पर भी ताला लग गया। जिस प्रकार कभी भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने लिखा था वैदिक हिंसा हिंसा न भवति शायद उसी प्रकार ये मानवाधिकार वादी भी सोचते हैं कि कश्मीर हिंदुओं पर किया गया अत्याचार अत्याचार नहीं होता। और शायद उनके कोई मानवाधिकार हैं भी नहीं जिनकी रक्षा के लिए आवाज उठायी जाए। मनमोहन सिंह ने भी कभी कहा था कि इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का ही है। शायद, सरकार इसी सूत्र की व्याख्या करते हुए यह भी स्वीकार करती हो कि कश्मीरी हिंदुओं का कश्मीर में कोई अधिकार नहीं है। वहां अधिकार केवल इस्लामपंथियों का ही है। यही कारण है कि सरकार ने बिना चेहरे पर शिकन लाए अत्यंत गौरव से संसद को सूचित किया कि अभी तक आतंकवादियों द्वारा कश्मीर में केवल 107 हिंदू मंदिर तोडे गए हैं। यह अलग बात है कि तटस्थ पर्यवेक्षक इसकी संख्या कहीं ज्यादा बताते हैं। कश्मीर घाटी से हिंदुओं के चले जाने से लगता था कि इस्लामी ताकतों ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया है और कश्मीर अब निजामे -मुस्तफा बन गया है।

परन्तु लगता है यह सोच केवल धोखा थी। इस्लामी ताकतें जानती है कि जब तक ये कश्मीर हिंदू जीवित रहेंगे तब तक देश के विभिन्न हिस्सों में अपने अधिकारों के लिए हो -हल्ला करते रहेंगे। लोकतंत्र का युग है। हो हल्ले का कभी कभार असर भी हो सकता है। इसलिए , यदि कश्मीरी हिंदुओं का समाप्त ही कर दिया जाय या फिर किसी तरह उनकी युवा पीढी को समाप्त कर दिया जाए तो यह समस्या सदा के लिए खत्म हो सकती है। फिर कश्मीर सचमुच इस्लामी राज्य बन सकता है। लेकिन प्रश्न है कि इन कश्मीर हिंदुओं को घेर -घारकर कैसे वापस लाया जाए ताकि इनका आसानी से शिकार हो सके। जिन दिनों फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे वे कश्मीरी हिंदुओं को अनेक प्रकार के प्रलोभन देते रहे कि वापस कश्मीर घाटी में आ जाएं। लेकिन जब सुरक्षा की बात होती थी तो वे कन्नी काट लेते थे। एक बार तो उन्होंने व्यग्य से यह भी कहा था कि अब मैं हर कश्मीरी हिंदू के साथ पुलिस तो बैठा नहीं सकता। कश्मीरी हिंदू भी समझते थे कि फारुख अब्दुल्ला उन्हें घेरकर कश्मीर ले जाना चाहते हैं और उन आतंकवादियों के आगे फेंक देना चाहते हैं जो ख्ुाले तौर पर कश्मीरी हिंदुओं की हत्या की बात कर रहे हैं। इसलिए वे फारुख के इस प्रलोभन में नहीं फंसे।

लेकिन लगता है अब राज्य सरकार ने आतंकवादियों की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए ऑपरेशन नम्बर दो प्रारम्भ किया है। केन्द्र सरकार ने कश्मीरी हिंदुओं को दोबारा घाटी में बसाने के लिए एक विशेष पैकेज दिया था। इसके तहत राज्य में कश्मीरी विस्थापितों के लिए नौकरियांे की घोषणा कि थी। इन नौकरियों के लिए केवल कश्मीरी विस्थापित ही आवेदन दे सकते हैं। राज्य सरकार ने इस पैकेज की आड में ही कश्मीरी हिंदुओं की आड में ही ऑपरेशन नम्बर दो प्रारम्भ कर दिया है। 4 मई को कश्मीर सरकार के सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड ने कश्मीरी विस्थापितों के लिए आरक्षित इन नौकरियों के लिए प्रत्याशियों से आवेदन पत्र मांगे हैं। सरकार को आशा रही होगी कि नौकरियों के लालच में कश्मीरी हिंदुओं की युवा पीढी बढचढ कर आवेदन पत्र देगी ही। लेकिन इसके आगे राज्य सरकार की षडयंत्रकारी भूमिका प्रारंभ हो जाती है जो अप्रत्यक्ष रुप से इस्लामी आतंकियों के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। राज्य सरकार ने इस विज्ञापन में कश्मीरी विस्थापितों के लिए एक शर्त लगा दी है कि नौकरी में चुने जाने की स्थिति में उन्हें केवल कश्मीर घाटी में ही नौकरी करनी पडेगी वे किसी भी हालात में कश्मीर घाटी से बाहर जाने के लिए स्थानांतरण कि मांग नहीं कर सकते। यदि चुना गया प्रत्याशी किसी भी समय और किसी भी कारण से कश्मीर घाटी छोडता है तो वह स्वतः ही नौकरी से बर्खास्त माना जाएगा और वह राज्य सरकार से फिर कभी भी कोई नौकरी नहीं मांग सकेगा।

5 मई की अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाईम्स ने इस बात का जिक्र अपनी एक खबर मे प्रमुखता से किया है। व्यवहारिक रुप से राज्य सरकार की इस नीति का तात्पर्य क्या है? राज्य सरकार कश्मीरी हिंदू युवकों को घेरकर कश्मीर घाटी में ले आना चाहती है और उन्हें आतंकवादियों के सामने फेंक देना चाहती है। अभी तक इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीर में हिंदुओं के प्रति अपनी नीति में कोई परिवर्तन किया है। आश्चर्य होता है कि उमर अब्दुल्ला की सरकार अप्रत्यक्ष रुप से इस क्षेत्र में आतंकवादियों की सहायता के लिए इतनी आतुर क्यों हैं ? जम्मू कश्मीर राज्य में तीन खंड हैं। जम्मू संभाग, लद्दाख संभाग और कश्मीर संभाग। सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण आम तौर पर सारे राज्य में होते रहते हैं। परंतु इस विज्ञापन के अंतर्गत सरकारी पदों पर नियुक्त हुए इन कश्मीरी हिंदू युवकों के लिए राज्य सरकार यह अधिकार देने के लिए भी तैयार नहीं है। न ये युवक स्थानांतरित होकर जम्मू जा सकेंगे और न ही लद्दाख। माल लीजिए आतंकवादी इन युवकों को मारते हैं और वे जान बचाने के लिए कश्मीर घाटी छोड देते है तो उमर अब्दुल्ला की सरकार उन्हें फिर कभी भविष्य में सरकारी नौकरी में नहीं रखेगी। सरकार की कश्मीरी हिंदू युवकों के लिए नीति स्पष्ट हो गयी लगती है। ‘हम कश्मीर घाटी में तुम्हारी रक्षा तो नहीं कर सकते। तुम्हारे लिए वहां आतंकवादियों के हाथों मरने का विकल्प खुला है परन्तु हम तुम्हें किसी भी हालत में कश्मीर घाटी नहीं छोडकर जाने देंगे।’ लगता है राज्य सरकार ने कश्मीरी हिदुंओं के सफाए का ऑपरेशन नम्बर 2 शुरु कर दिया है और उसे पूरा करने के लिए घृणित षडयंत्र रचे जा रहे हैं। उमर अब्दुल्ला की सरकार की अभी तक उपलब्धियों में शायद यही सबसे अच्छी उपलब्धि मानी जाएगी क्योंकि इस उपलब्धि पर आतंकवादी भी घाटी में लड्डू बांट रहे हैं।

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3 Comments on "कश्मीरी हिंदुओं का सफाया – ऑपरेशन नम्बर दो"

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RAJESH KUMAR
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इस्लामो ने अपने धर्म का प्रचार करने के लिए अन्य धर्मो की तरह प्यार और सत्यनिष्ठा के सिधान्तो पर नहीं बल्कि तलवार के बल किया था / स्वयं मुहम्मद साहेब ने अपने ननिहाल (मदीना) पर हमला करके वहां के लोगो को जबरन इस्लाम में परिवर्तित कर दिया / इस धर्म का जन्म ही एक आतंकवादी मानसिकता से हुआ है, इसका प्रमाण मुहम्मद साहेब से लेकर आजतक हो रहा है / कोई पैगम्बर कैसे ये कह सकता है की गैर इस्लाम काफिर है और उसे जलाकर मर देना चाहिए – कुरान: 9 अध्याय, छंद 5: “तब जब पवित्र महीने बीत चुके… Read more »
jay prakash singh
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gambhir vishleshan, manvadhikarvadiyon ko ye sach kyun nahi dikhta, tista sitlwad ko bhi

sunil patel
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विश्व के मानचित्र में आधा कश्मीर पाकिस्तान में दिखाया जा रहा है और हमारी सरकार कुछ नहीं कर रही है. फिर कश्मीर हिन्दू मुद्दे पर सरकार से क्या उम्मीद की जा सकती है.

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