लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम

हफ्ते भर की कथित शांति के बाद अचानक असम में दोबारा हिंसा भड़क गई है| हिंसा कोकराझार से सटे बक्सा व कामरूप जिलों में हुई| ताज़ा हिंसा की जो मूल वजह सामने आ रही है उसमें देश के विभिन्न शहरों में रह रहे उत्तर-पूर्व भारतीय लोगों पर हमले की धमकी के पत्र, मोबाईल संदेश, ट्विट्स, फेसबुक टिप्पड़ियां इत्यादि वजह बन रहे हैं| खासकर कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु, आंध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद और उससे सटा साहिबाबाद, महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई और पुणे, तमिलनाडु की राजधानी चेनै में उत्तर-पूर्व भारतीयों पर हमले की धमकी देने और सद्भाव बिगाड़ने की नीयत से भड़काऊ संदेश फैलाने की बात सामने आ रही है| इस हालात ने संबंधित राज्य सरकारों को भी असहज कर दिया है| सबसे विकट स्थिति तो कर्नाटक की नव-निर्वाचित सरकार के समक्ष उत्पन्न हुई है| चूँकि कर्नाटक से बहुतायत की संख्या में एकमुश्त उत्तर-पूर्व भारतीय डरकर पलायन कर चुके हैं और सरकारी अपील के बावजूद पलायन की संख्या में अपेक्षाकृत तेजी ही आई है लिहाजा सरकार भी सकते में है| सरकारी आंकड़े के अनुसार अब तक लगभग १८ हजार उत्तरपूर्वी छात्र व निवासी दक्षिण-पश्चिम भारत से पलायन कर चुके हैं वहीं हिंसा में अब तक ८० से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका है| केंद्र सरकार ने सार्वजनिक अपील जारी करते हुए अनुरोध किया है कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के भारतीय इन अफवाहों पर ध्यान न दें किन्तु विश्वास कि कमी के चलते सरकार की अपील बेअसर साबित हो रही है| यहाँ तक कि शासन-प्रशासन का इनके पास जाना भी बेअसर साबित हो रहा है| लोकसभा की कार्रवाई में भी असम हिंसा और उसके बाद शुरू हुए पलायन की गूँज सुनाई दे रही है| सांसदों ने तो सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर प्रतिबंध तक की मांग कर डाली है| कुल मिलाकर असम के कुछ जिलों से शुरू हुई हिंसा ने साम्प्रादायिक रंग लेकर बृहदतर रूप ले लिया है और मुंबई जलाने के बाद अब दक्षिण के राज्य इसकी जद में हैं और यही हाल रहा तो पूरा भारत इसकी आग में झुलसेगा और जो स्थिति बनेगी वह इससे भी अधिक विस्फोटक होगी जिसे काबू कर पाना अधिक दुष्कर होगा|

 

हिंसा के बाद पलायन और धमकी की स्थिति किसी भी नजरिये से देश की एकता और अखंडता के अनुकूल नहीं है| अव्वल तो काफी समय से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र शेष भारत से खुद को अलग-थलग महसूस करता था और कमोबेश यही सोच शेष भारत की भी थी किन्तु समय के बदलाव ने वहां के निवासियों को भारत-भारतीयता को जानने-समझने का मौका दिया, जिससे वे सीमाओं को लांघ शेष भारत को अपनाने निकल पड़े किन्तु समाज की संकुचित व संकीर्ण सोच ने उन्हें भेदभाव के ऐसे कडवे सच से सामना करवाया जहां वे खुद को उपेक्षित ही मानते रहे| हाल ही में अदालत ने एक आदेश जारी कर उत्तरपूर्वी भारतीय छात्र-छात्राओं पर नस्ली टोंटबाजी को प्रतिबंधित करते हुए कड़ी सज़ा का प्रावधान रखा है ताकि उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित न होना पड़े किन्तु उनके साथ नस्लीय भेदभाव की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है| फिर भी उनकी सहनशीलता की दाद देनी होगी कि उन्होंने सामाजिक तानेबाने के मध्य पनप रहे जिस भेदभाव व क्षेत्रवाद को मौन होकर सहा उसकी मिसाल अन्यत्र नहीं मिल सकती| हालिया घटनाक्रम ने समाज को दो पाटों में बांटने का कार्य किया है वहीं सरकारें भी उत्तर-पूर्व भारतीयों का विश्वास जीत पाने में नाकामयाब रही है|

 

सरकार कि सबसे बड़ी विफलता तो यही है कि वह अब तक अफवाहों का बाजार गर्म करने वाले असामाजिक तत्वों की पहचान उजागर करने में सक्षम नहीं हो पाई है| वरिष्ठ भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज ने केंद्र पर हमला बोलते हुए कहा है कि सरकार उत्तरपूर्वी भारतीयों की सुरक्षा व्यवस्था को हलके में ले रही है और यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह उनमें विश्वास कायम करने का प्रयत्न करे| सुषमा स्वराज का बयान तो यही दर्शाता है कि विपक्ष मात्र हमलावर की भूमिका का निर्वहन करने के लिए ही अस्तित्व में है, बाकी की जिम्मीदारियाँ सरकार के सर माथे हैं| होना यह चाहिए था कि सभी राजनीतिक दल एक मंच पर आते और राष्ट्रीय एकता को खंडित करने के प्रयासों को विफल करने हेतु योजनाबद्ध तरीके से क्रियान्वयन करते किन्तु मामले को राजनीतिक रंग देकर शह और मात का खेल जारी है| जबकि हिंसा के बाद पलायन की समस्या को राजनीतिक रंग देने से बचना चाहिए था| वैसे भी राजनीति की कीमत पर देश की आतंरिक शान्ति को दांव पर नहीं लगाया जा सकता किन्तु जो रहा है उसे तत्काल रोका जाना चाहिए| लिहाजा पक्ष-विपक्ष से अपेक्षा है कि वे इस राष्ट्रीय शर्म से देश को मुक्ति दिलाने हेतु एकजुट हों और भारत की अखंडता को अक्षुण बनाए रखने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें| देश के दुश्मनों से सख्ती से निपटना ही इस समस्या का हल है वरना कहीं ऐसा न हो कि देश के बाकी हिस्से से कटा उत्तरपूर्वी भूभाग हमेशा से लिए हमसे कट जाए|

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