लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पेरिस में हुआ आतंकी हमला सारे पश्चिमी जगत के लिए बहुत बड़ा सबक है। 11 माह पहले हुआ चार्ल्स एब्दो पर हमला इस हमले के आगे बहुत मामूली दिखाई पड़ता है। इस हमले ने फ्रांस ही नहीं, पूरे यूरोप की हडि्डयों में कंपकंपी दौड़ा दी है। फ्रांस में आपात्काल की घोषणा हो गई है और पेरिस में कर्फ्यू लागू हो गया है। 150 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। लगभग सभी आतंकियों ने आत्महत्या कर ली है। दुनिया के सारे देशों के बड़े−बड़े नेता इस हमले की निंदा कर रहे हैं।

इसके पहले भी भयंकर आतंकी हमले हो चुके हैं लेकिन पश्चिमी राष्ट्र, खासतौर से अमेरिका ने कोई सबक नहीं सीखा। अमेरिका ने अपनी सुरक्षा का तो पूरा इंतजाम कर लिया लेकिन अन्य देशों को आतंकियों के हवाले होने दिया। यदि पेरिस का हमला सीरिया के इस्लामी आतंकियों ने किया है तो मैं पूछता हूं कि इन आतंकियों को सिर पर किसने चढ़ाया था? सीरिया की सरकार को उलटाने के लिए सउदी अरब जैसे देशों ने आईएसआईएस के आतंकवादियों की जमकर मदद की और सउदी अरब की पीठ पर किसका हाथ है? अमेरिका का! अमेरिका ने ही अफगानिस्तान के आतंकवादियों को बढ़ावा दिया था, जिन्होंने अब पाकिस्तान का हाल भी बेहाल कर दिया है। अमेरिका भूल गया कि हिंसक लोग उसी हाथ को काट खाते हैं, जो उन्हें खिलाता है। जनरल जियाउल हक और राजीव गांधी की हत्या इसके ठोस प्रमाण हैं। पश्चिमी राष्ट्र आतंकवादियों में फर्क करना बंद करें, यह पहला काम है। आतंकवादी अच्छे और बुरे, अपने और पराए नहीं होते। ये किसी के सगे नहीं होते। ये अपने आप को लाख इस्लामी कहें, ये इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

अफगानिस्तान, पाकिस्तान और कश्मीर में आतंक से मरनेवाले मुसलमान नहीं हैं तो कौन हैं? यूरोप के मुसलमानों की जिंदगी क्या अब सांसत में नहीं पड़ जाएगी? उनका जीना हराम हो जाएगा। यूरोपीय देश भारत की तरह सहनशील नहीं हैं। ज़रा स्पेन के इतिहास को याद करें। ईसाइयों ने सैकड़ों साल पहले एक−एक मस्जिद और एक−एक मुसलमान से पूरा बदला निकाला था। अब भी यह मांग जोर पकड़ेगी कि यूरोप को मुसलमानों से खाली किया जाए लेकिन मेरी राय है कि इस अतिवादी राह से कोई समाधान निकलना मुश्किल है। जवाबी आतंकवाद भी कोई हल नहीं है। गोली का जवाब गोली से जरुर दिया जाए लेकिन बोली के हथियार से बड़ा कोई हथियार नहीं है। आतंकवादियों से सीधा संवाद कायम करना भी उतना ही जरुरी है, जितना कि उन पर बंदूक ताने रखना।

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