लेखक परिचय

विश्‍वमोहन तिवारी

विश्‍वमोहन तिवारी

१९३५ जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। १९५६ में टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि के बाद भारतीय वायुसेना में प्रवेश और १९६८ में कैनफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी यू.के. से एवियेशन इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातकोत्तर अध्ययन। संप्रतिः १९९१ में एअर वाइस मार्शल के पद से सेवा निवृत्त के बाद लिखने का शौक। युद्ध तथा युद्ध विज्ञान, वैदिक गणित, किरणों, पंछी, उपग्रह, स्वीडी साहित्य, यात्रा वृत्त आदि विविध विषयों पर ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित जिसमें एक कविता संग्रह भी। १६ देशों का भ्रमण। मानव संसाधन मंत्रालय में १९९६ से १९९८ तक सीनियर फैलो। रूसी और फ्रांसीसी भाषाओं की जानकारी। दर्शन और स्क्वाश में गहरी रुचि।

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एयर वाइस मार्शल विश्वमोहन तिवारी

जब भी भारत में अंग्रेजी भाषा की भूमिका पर चर्चा होती है विद्वान लोग अक्सर प्रश्न करते हैं कि यह कैसे कहा जा सकता है कि ‘अंग्रेजी भाषा ने पारिवारिक प्रेम के स्थान पर प्रत्येक सदस्य को मात्र अपने स्वार्थों के लिये ही उत्तरदायी बना दिया है? नारी स्वातंत्र्य के नाम पर उसे भोग की वस्तु बना दिया है?’ साथ ही और प्रश्न भी किये जाते हैं, ‘यह कहना कहां तक सत्य होगा कि जो अंग्रेजी पढा लिखा वर्ग है, वह न तो भारतीय संस्कारों से सम्पन्न है और वास्तव में न पाश्चात्य संस्कारों से?’ अपने प्रश्नों को सशक्त जमीन देने के लिये वे कहते हैं कि राजा राममोहन राय, तिलक, गोखले और गांधी आदि सभी तो अंग्रेजी जानते थे, बोलते थे और इस भाषा में लिखते थे.

इस विषय पर थोडा गहराई से और विस्तार से विचार की आवश्यकता है. इसमें तो किसी को सन्देह नहीं कि हमारे समाज के महत्त्वपूर्ण भाग का नैतिक पतन हो रहा है, मानवीय प्रेम, तथा त्याग जैसी संवेदनाओं के स्थान पर स्वार्थ तथा लोभ छा गया है. इसके क्या कारण हो सकते हैं? मानव के निर्माण में प्रकृति (‘नेचर’ या ‘जीन्स’) तथा पालन पोषण (‘नर्चर’) या संस्कार दोनों का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है. पिछले 50-60 वर्षों में हमारे ‘जीन्स’ में तो नगण्य अथवा अल्प मात्रा में ही परिवर्तन हुआ होगा, किन्तु संस्कार देने वाले वातावरण में अवश्य बहुत अन्तर आया है. संस्कार के लिये संस्कृति जिम्मेदार है. हमारी संस्कृति हमें स्वयं अपने साथ, समाज के साथ, प्रकृति के साथ, ब्रह्माण्ड के साथ ‘सम्यक रहना’ सिखलाती है, या सामान्य शब्दों में कहें तो, सुखपूर्वक, शांति पूर्वक, तथा प्रेमपूर्वक रहना सिखलाती है. संस्कृति यह सब हमें कैसे सिखलाती है?

संस्कृति प्रसार का सबसे पहला तथा महत्त्वपूर्ण साधन मानव का समाज में व्यवहार है.कोई भी बालक, यहां तक कि वयस्क भी परिवार तथा समाज में जो भी व्यवहार देखता है, वह उसे सामान्य समझकर बिना सोचे समझे सीख लेता है. यथा, चोर जनजाति के बच्चों के लिये चोरी, यदि आदर्श नहीं तो, सामान्य व्यवहार हो ही जाता है. भारत की राजधानी में भी ट्रैफिक नियमों के विरूध्द लाल बत्ती पर भी न रुकना, गलत चलाकर सारे ट्रैफिक को अस्त व्यस्त तथा खतरनाक बनाना, केवल अपढ ऑटो रिक्शा चालक ही नहीं, वरन खासे पढे लिखे तथा समृध्द कार चालक भी करते हैं. गांधी जी ने अपनी मा/ की धर्म में पूरी निष्ठा के व्यवहार को देखकर स्वयं भी ‘निष्ठा’ सीखी, तथा सत्यवादी हरिश्चन्द्र नाटक देखकर सत्य को जीवन का सबसे बडा मूल्य माना और जिया. एक तरफ गांधी ने सारे भारत में सूर्य के तेज की तरह फैल रहे अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन को एक छोटी सी जगह कुछ हिंसात्मक घटनाएं होने पर रोक दिया था. तो दूसरी तरफ अर्ध हिन्दू (अंग्रेज गवर्नैस चालित) वातावरण में पले तथा अधिकांश शिक्षा इंग्लैन्ड में पाने वाले नेहरू ने प्रताप सिंह कैरों के प्रभावी प्रशासन से प्रभावित होकर उसके भ्रष्ट आचरण को ‘जन स्वीकृति’ दी और इस तरह भारत की राजनीति में भ्रष्टाचार का तेजी से पनपना प्रारम्भ हुआ.

संस्कृति के प्रसार के दूसरे माध्यम में धर्म या धार्मिक कृत्य हैं, तीसरे माध्यम में भाषा और साहित्य हैं, चौथा माध्यम कलाएं, पांचवें में भोजन तथा पोशाक इत्यादि हैं. हमारे यहां पहले ललित कलाएं तथा लोक कलाएं ही थीं. पूंजीवाद और अब तो बाजारवाद ने सभी जगह किन्तु महानगरों में विशेषकर, कला के नाम पर, ‘पॉप कला’ या ‘पॉप कल्चर’ को बढावा दिया है. पॉप संगीत या नृत्य का ‘लक्ष्य’ अधिकांशतया शरीर तथा उत्तेजक-भावनाएं होती हैं. भारतीय नृत्य, संगीत तथा कलाएं एक उदात्त प्रकार की अन्तर्यात्राएं कराती हैं, एन्द्रिय उत्तेजना के स्थान पर उत्प्रेरणा देती हैं, शरीर के स्थान पर मन-बुध्दि को प्राथमिकता देती हैं. भारतीय भोजन के शाकाहार की तथा मसालों की पौष्टिकता की अब विज्ञान भी अनुशंसा करने लगा है. भारतीय पारम्परिक पोशाकें भी अपना कार्य करने के साथ पाश्चात्य फैशन के बरअक्स शरीर की मांसलता पर जोर नहीं देतीं.

धर्म, विशेषकर सनातन धर्म ही है जो धृति, क्षमा, दम (मन पर नियंत्रण) चोरी न करना, शुचिता, इंद्रियों पर नियंत्रण, बुध्दि, ज्ञान, सत्य, क्रोध न करना के साथ साथ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, ‘एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति’ की विराट उदारता आदि को जीवन के मूल्यों के रूप में सिखलाता है. यही सारे मूल्य तो संस्कृति को आधार देते हैं. अतएव उपरोक्त सांस्कृतिक मूल्यों की तथा उन्हें प्रदान करने वाले धर्म की रक्षा करना हमारा महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य बन जाता है. यद्यपि हमारे धर्म पर 1300 वर्षों तक तीव्र आक्रमण होते रहे, किन्तु हम उनसे फिर भी यथा -संभव जूझते रहे और अपने धर्म की रक्षा करते रहे. यह तो पिछले लगभग पचास वर्षों में हमारे ही राज्य में समाज में धर्म की पकड ढ़ीली हुई. इसका भी एक बडा कारण नेहरू तथा उनके समान साम्यवादी विचार धारा से प्रभावित नेताओं तथा वामपंथ के तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ का धर्म के प्रति विरोध रहा, यद्यपि उन्होंने उस विरोध को ‘सैक्युलर’ या ‘धर्मनिरपेक्ष’ की संज्ञा दी. कहना चाहिये, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर व्यवहार में धर्म की शिक्षा शालाओं से हटा दी गई, यद्यपि अल्प संख्यक अपनी शालाओं में अपने धर्म की शिक्षा दे सकते हैं. शासन ने केवल हिन्दू मंदिरों की व्यवस्था को अपने हाथों में लेना प्रारंभ कर दिया. और विडम्बना यह कि शासन ने इस ‘हथियाने’ के लिये तर्क दिया कि मंदिरों का प्रबन्ध बहुत भ्रष्ट है. भारतीय शासन की भ्रष्टता तो विश्व विख्यात है. यह ‘हथियाना’ भी न केवल शासन के भ्रष्ट आचरण का द्योतक है, वरन उसकी ‘धर्म निरपेक्षता’ की गलत समझ को भी स्पष्ट दर्शाता है. केरल सरकार ने तो साम्यवादी (जो धर्म को मानते ही नहीं) व्यक्तियों को मंदिरों की व्यवस्था सौंप दी. यह शासन की कैसी धर्म निरपेक्षता है, विशेषकर तब कि जब वह न केवल मुस्लिम तथा ईसाइयों के धर्मस्थलों तथा शालाओं को अपने कार्य के लिये पूरी छूट तो देता है, अनुदान भी देता है, वरन मंदिरों से प्राप्त आय द्वारा चर्च ताा मस्जिदों को आर्थिक अनुदान भी देता है..

विज्ञान को धर्म के विरोध में खडा किया गया. यह पाश्चात्य शिक्षा का ही प्रभाव था, क्योंकि ईसाई धर्म ने सोलहवीं शती तक विज्ञान का कट्टर विरोध किया था. तथा विज्ञान ने इस विरोध से अपनी रक्षा हेतु ‘शासन’ को ‘सैक्युलर’ बनाया – इसका अर्थ था कि एक तो धर्म (यथा पोप) शासन के साथ जुडक़र विज्ञान का विरोध न करे, तथा, दूसरा, शासन धर्म के कार्यो में हस्तक्षेप न करे. भारतीय परम्परा का इस ‘सैक्युलरिजम’ से कोई विरोध नहीं है. आज व्यवहार में निश्चित रूप से भारतीय सैक्युलरिजम या धर्म निरपेक्षता की यह परिभाषा तो नहीं है.

सनातन धर्म ने विज्ञान का विरोध तो किया ही नहीं, वरन उसे हमेशा बढावा दिया है. आयुर्विज्ञान के साथ प्राणिविज्ञान की मूलभूत वैज्ञानिक अवधारणाएं सात शती ईसा पूर्व चरक संहिता में मिलती हैं जो ई पू तीसरी शती की अरस्तू की अवधारणाओं से अधिक विज्ञान संगत हैं. और आयुर्विज्ञान को आगे शल्य चिकित्सा तक बढाने वाला ज्ञान ईस्वी पूर्व प्रथम शती की सुश्रुत संहिता में मिलता है. ”सूर्य सौरमंडल का केन्द्र है” अवधारणा (कोपर्निकस की पंद्रहवीं ईस्वी शती के बरअक्स) ईसा की पांचवी शती के आर्यभट्ट ने प्रतिपादित की थी, इत्यादि इत्यादि. तात्पर्य यह कि सनातन धर्म तथा विज्ञान साथ साथ चले हैं. यह तो विश्व के विद्वान निर्विवाद मानते हैं कि ईसा की बारहवीं शती तक भारत (धर्म में निष्ठा रखने वाला) विश्व में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में अग्रणी था.

व्यवहार और धर्म के बाद भाषा तथा साहित्य संस्कृति के सशक्त वाहन हैं. भाषा मुख्यतया तीन कार्य करती है : 1 विचारों तथा भावनाओं आदि की अभिव्यक्ति, 2 संस्कृति का प्रसार, 3 समाज में संसाधनों का वितरण. आज भारतीय भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी भाषा जानने वाला व्यक्ति देश के सर्वाधिक संसाधन पर कब्जा करता है. विचारों तथा भावनाओं की अभिव्यक्ति शब्द भंडार, तथा शब्दों के भावनाओं के साथ सम्बन्धों पर निर्भर करती है. शब्दों के भावनाओं से सर्वाधिक सम्बन्ध मातृभाषा में शैशव एवं किशोर वय में स्थापित होते हैं. ‘मदर’, ‘डॉटर’, ‘वाइफ’, ‘ड़ैथ’ इत्यादि शब्दों में वह भावनात्मक शक्ति नहीं है जो मा/ (या माता), पुत्री (या बिटिया), पत्नी, मृत्यु (या मौत) में (हिन्दी मातृभाषाई के लिये) है.

हम किस तरह ज्ञान ग्रहण करते हैं, हमारा भाषा तथा साहित्य का ज्ञान कितना है इस पर भी हमारा सांस्कृतिक विकास महत्त्वपूर्ण रूप से निर्भर करता है. पा/चवे तथा छठवें दशक में हम उच्च विद्यालय तक हिन्दी माध्यम में पढने वालों ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आदि, प्रेमचन्द, सुदर्शन, गुलेरी, रविन्द्रनाथ, शरच्चन्द्र, बंकिमचन्द्र आदि आदि अनेक साहित्यिकों की कृतियों को, तथा रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, हितोपदेश, वैताल पचीसी, कथा सरित्सागर इत्यादि पढ ड़ाला था – शाला में कम, घर में अधिक. हमारे लिये ‘अंग्रेजी’ मात्र एक विषय था. शायद इसलिये भी कि उस समय तक पर्वों तथा उत्सवों का स्थान लेने वाला भोगवादी टी वी भी नहीं था. इस तरह के सारे पाठन ने हमें और हमसे पूर्व पीढियों को सांस्कृतिक शिक्षा दी. 15-16 वर्ष तक की आयु में संस्कार पड ग़ये. बाद में कालेज में अंग्रेजी माध्यम में पढना पडा, किन्तु तब तक भारतीय आदर्शों – मूल्यों की नींव पड चुकने के कारण हम विदेशी संस्कृति में से बुरी को छोडक़र अच्छी अच्छी बातें सीख सकते थे. किन्तु तब भी जब नेहरू की ‘भारत की खोज’ में मैने वेदों की प्रशंसा में पढा कि ‘वेद तो जीवन्त गडरियों के जीवन्त गान हैं’ तब मैने भी उसे सहर्ष मान लिया था. वह तो बाद में जब मैंने पृथिवी सूक्त, सृष्टि सूक्त, पुरुष सूक्त, यहां तक कि मान्डूक सूक्त पढा तो समझ में आया कि वे जीवन्त गडरियों के गान नहीं, वरन उच्चतम कोटि के विचारकों, मनीषियों तथा दृष्टाओं के मंत्र हैं. सृष्टि सूक्त में ब्रह्माण्ड उत्पत्ति की ‘महान विस्फोट’ (बि बैंग) की अवधारणा मौजूद है और उसके साथ ही स्वयं अपने ज्ञान की सीमा का आभास, उसके पूर्ण सत्य होने पर संदेह इतनी निराली काव्यात्मक शैली में अभिव्यक्त है कि सहसा सुखद आश्चर्य होता है. माण्डूक सूक्त में मेंढकों की स्तुति की गई है, इस तरह के मंत्रों को गडरियों के गान तो उनकी गहराई को न समझ सकने वाला ही कह सकता है. माण्डूक सूक्त वास्तव में मेंढकों द्वारा कीटों पर नियंत्रण कर पर्यावरण के संरक्षण का मंत्र है. यह तो पर्यावरण के प्रदूषण के प्रति जागरूकता भोगवादी पश्चिम को बीसवीं शती के उत्तरार्ध में ही हुई है. इसके पूर्व व्यक्तिवादी तथा प्रकृति का शोषण करने वाले पाश्चात्यों की समझ में वेदों तथा उपनिषदों के प्रकृति संरक्षण तथा अखिल विश्व में ‘एकत्व’ दर्शन करने वाले मंत्र कैसे समझ में आ सकते थे!

भारतीयों में पाश्चात्य भोगवादी मूल्य तथा धर्मविरोधी साम्यवादी विचारधाराओं को सम्मान अंग्रेजी में शिक्षित तथा भारतीय भाषाओं के प्रति उदासीन व्यक्तियों द्वारा ही दिलवाया गया है. राजा राममोहन राय, तिलक, गोखले और गा/धी सनातन धर्म के आदर्शों तथा मूल्यों में रचे-पगे व्यक्ति थे जिन्होंने अपने अच्छे गुणों पर विश्वास करते हुए, पाश्चात्य संसार से भी अच्छे गुण स्वीकार किये. सनातन धर्म सारे विश्व से भद्र विचारों का स्वागत करता है. किन्तु इस ‘भद्रता’ की पहचान हमारी भारतीय सांस्कृतिक कसौटी होना चाहिये. यह केवल इसलिये नहीं कि भारतीय संस्कृति भोगवादी संस्कृतियों के बरअक्स उदात्त मानवतावादी है, वरन इसलिये भी कि किसी भी देश की संस्कृति उस देश के भूगोल तथा इतिहास से गुंथी रहती है. यह संस्कृति ही है जो मानवीय मूल्य तथा विराट अर्थ में नैतिकता जाने अनजाने सिखा देती है. यह हमारा सांस्कृतिक पतन ही है जो हमारे नैतिक पतन का प्रमुख कारण है. और सांस्कृतिक पतन का कारण सांस्कृतिक प्रसार के माध्यमों का असफल होना है. इस प्रकार के माध्यमों में भाषा और धर्म अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं. तथाकथित सैक्युलर लोगों तथा वामपंथियों के धर्म विरोधी प्रचार के कारण धर्म का महत्त्व कम हुआ है. अंग्रेजी के रोटी तथा सत्ता की भाषा बनने के कारण भारतीय भाषाओं का ह्रास हुआ है. आबादी का विस्फोट और पाश्चात्य औद्योगिकीकरण की अंधी नकल भी इसके कारण हैं. वैसे भूल भारतीय संस्कृति में इन कारणों से रक्षा करने वाले उपकरण तथा मूल्य भी हैं. भारतीय संस्कृति का ज्ञान जितनी सहजता, सरलता, संवेदना और परिशुध्दता से तथा अनेकानेक विधियों से भारतीय भाषाएं और कलाएं दे सकती हैं विदेशी भाषाएं नहीं दे सकतीं.

समाज विज्ञान के स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को पढाया जाता है और आम आदमी भी कहीं मान बैठा है कि ‘पश्चिम का अनुसरण ही आधुनिक बना सकता है’, यही तो उपनिवेशिता है.’ इस मान्यता से दो निष्कर्ष निकलते हैं – 1 पाश्चात्य की सोच विचार और यहां तक कि रहन सहन का अनुकरण आधुनिक बनने के लिये वांछनीय है. 2 यदि अंग्रेजों का – पाश्चात्य प्रतिनिधि के रूप में, या अमेरिका का अनुकरण करना है तो वह अनुकरण उनकी ही भाषा के द्वारा सर्वोत्तम होगा, अतएव भारत में अंग्रेजी का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिये. यह दोनों मान्यताएं खतरनाक हैं. यह तो भारतीय मानस को हमेशा के लिये उपनिवेश बना देंगी. इस शिक्षा से अभिषिक्त विद्यार्थी विद्वान बनने के बाद भी पश्चिम को ही तो श्रेष्ठ मानेंगे. यदि इस कथन को विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र तक सीमित रखते तब भी यह एक सीमा तक अनुकरणीय बनता. एक सीमा तक ही, पूरा नहीं क्योंकि पश्चिम की प्रौद्योगिकी पश्चिमी समाज की ही समस्याओं का हल खोजती है, यथा वह धनी बूढोंं की बीमरियों के अनुसन्धान पर ज्यादा जोर देती है, गरीबों के रोगों पर नहीं. वह कार पर अनुसन्धान करती है, बैलगाडी पर नहीं, जब कि हमें इन दोनों पर, वरन बैलगाडी पर ज्यादा, अनुसंधान करना आवश्यक है. किन्तु इससे कहीं अधिक पाश्चात्य विज्ञान प्रकृति के शोषण का अनुसंधान करता है और जब उस शोषण से प्रकृति ही खतरे में पड ग़ई है तब वह उन समस्याओं के हल खोजना चाहता है, और जो हल अन्ततः एक नई समस्या पैदा करते रहते हैं. यह ठीक है कि पश्चिम में मूलभूत अनुसन्धान भी हो रहा है किन्तु उसका अनुपात बाजार प्रेरित एवं युध्द प्रेरित अनुसन्धानों की तुलना में कम होता जा रहा है. यह पश्चिम के विज्ञान की मानवीय मूल्यहीनता के कारण भी है. यह ठीक है कि विज्ञान के कुछ अपने मूल्य हैं जैसे सत्य, सहयोग, ज्ञान-वितरण, प्रयोग, अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य आदि, किन्तु इनमें मानवीय मूल्य जैसे वसुधैव कुटुम्बकं, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, सर्वे सन्तु निरामयाः, मानव के शोषण का विरोध, पशु-प्रकृति प्रेम, तथा भोग पर बुद्धि का नियंत्रण इत्यादि नहीं हैं – जो हमारी संस्कृति में हैं. और आधुनिक प्रौद्योगिकी के आने से उद्योगपतियों ने भोगवाद को सर्वसुलभ तथा सस्ता बना दिया है, सस्ता इसलिये भी कि वर्तमान भविष्य का भोग कर रहा है. भोगवाद की अति के दुष्परिणाम भविष्य अधिक भोगेगा.

अंग्रेजी एक प्रकार से आज अन्तर्राष्ट्रीय भाषा मानी जाती है यद्यपि अधिकांश यूरोपीय देशों चीन, जापान, इजरायल, लातिन अमेरिकी देशों, इरान, इराक, मिस्र आदि अरब देशों में अंग्रेजी भाषा के द्वारा उस तरह भी काम नहीं चल सकता जिस तरह भारत में चल सकता है. और हमें अंग्रेजी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा की ही तरह सीखना चाहिए न कि इस भाषा-समृध्द देश की राजभाषा के रूप में. इस आबादी-बहुल तथा काम-अपर्याप्त देश में रोटी का महत्त्व स्वाभाविक ही सर्वाधिक हो गया है. अंग्रेजी के महत्त्व के वास्तव में, दो प्रमुख कारण हैं एक तो यह सत्ता की भाषा है और दूसरे रोटी की भाषा है. जब अंग्रेजी राज भाषा तथा रोटी की भाषा के रूप में हमारी शिक्षा का माध्यम बन जाती है तब एक तो वह हमारे मन को अपना उपनिवेश भी बना लेती है.और दूसरे वह राजभाषा के बजाय जीवन की भाषा बनने का ढोंग करने लगती है. हम अंग्रेजी को अपनी भाषाओं की तुलना में न केवल अधिक महत्त्व तथा सम्मान देते हैं वरन अपनी भाषाओं से उसे प्रत्येक क्षेत्र में श्रेष्ठतर मानते हैं, उसके बोलने वालों को श्रेष्ठतर मानते हैं, उनके कथनों को प्रामाणिक मानते हैं और बिना सोचे विचारे, बिना परखे उनका, उनकी भाषा, भूषा, भोजन तथा पॉप संस्कृति की नकल करने लगते हैं.

पश्चिम का अनुसरण विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में तो एक सीमा तक, या कुछ संशोधन के साथ, अनुकरणीय है. किन्तु दर्शन, सामाजिक संगठन, परिवारिक-सम्बन्ध, साहित्य, भाषा विज्ञान, अर्थशास्त्र इत्यादि में तो अनुकरण न केवल अनावश्यक है वरन हानिकारक है. उदाहरणार्थ, भारतीय साहित्य को पिछले साठ-सत्तर वर्षों से पाश्चात्य साहित्यिक कसौटियों पर परखा जाता रहा है. साहित्य समाज से उपजता है. हमारा, यदि पूरा नहीं तो अधिकांश, समाज पाश्चात्य समाज से छठवें सातवें दशक तक तो नितान्त भिन्न था, उसके बाद नकल करते करते कुछ समता आई है. अतएव उनकी साहित्यिक कसौटियां हमारे लिये कैसे उपयुक्त हो सकती हैं! हमारे पास इन विषयों में इतना ज्ञान तो है कि जिसके आधार पर हम आगे बढक़र समाज को सच्चे सुख की दिशा में आगे बढा सकते हैं. इन विषयों में हमें पाश्चात्य-ज्ञान को अपनी कसौटियों पर परख कर ही स्वीकार करना चाहिये. किन्तु अपनी कसौटियां तो अपनी संस्कृति तथा अपनी भाषा द्वारा ही विकसित होंगी, वह भी तब कि जब हमारा मन-मस्तिष्क उपनिवेशित न होकर स्वतंत्र हो.

भाषा संस्कृति की सरल, सहज तथा संवेदनशील वाहिनी है. तभी तो गांधी जी ने कहा था कि स्वतंत्रता मिलने पर चाहे अंग्रेज न जाएं, किन्तु अंग्रेजी तथा अंग्रेजियत जाना ही चाहिये. किन्तु नेहरू ने पूरी शक्ति लगाकर न केवल अंग्रेजी रखी, वरन उसे अभय दान दे दिया. निस्संदेह नेहरू बहुत बडे नेता थे, किन्तु मेरी दृष्टि में गांधी उनसे बहुत बडे थे. क्या यह विडम्बना नहीं कि गांधी के प्रिय शिष्य नेहरू ने ही गांधीवाद को हाशिये में डाल दिया, और साम्यवादी विचारधारा का समर्थन किया! यह काफी हद तक सच है कि नेहरू जी की सोच पर अंग्रेजी का तथा पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, भारतीय भाषाओं तथा संस्कृति की तुलना में कहीं अधिक था. गांधी पूर्णतः भारतीय सोच तथा संस्कृतिशील व्यक्ति थे, और साथ ही एकदम आधुनिक और ‘दृष्टा’, नेहरू जी से ज्यादा आधुनिक और सच्चे दृष्टा. सच्चा आधुनिक वह व्यक्ति होता है जो न केवल परम्परा की रूढियों को तोडता है वरन विश्व में चल रही आधुनिकतम विचारधाराओं में से अपने देश-काल के लिये उपयुक्त विचारधारा को चुनता है, और वह जब भविष्य में भी झा/क कर सच्चाई को चुन सकता है, सही अर्थों में वही ‘दृष्टा’ होता है, और इसलिये सच्चे दृष्टा की परख समय ही करता है. समय ने साम्यवाद पर आधारित सोच को गलत सिद्ध कर दिया है. वह अंग्रेजी की गुलामी भी गलत सिध्द कर रहा है.

डेढ-दो सौ वर्षों से अंग्रेजी पढ रहे इस विशालतम समाज में, जिसमें पिछले दो दशकों से विश्व के तीस प्रतिशत से अधिक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी शिक्षित व्यक्ति हैं, पिछले सौ वर्षों में मात्र एक भारतीय तथा दो भारतीय मूल के वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार मिला है और मात्र एक साहित्य में तथा एक अर्थशास्त्र में. हम से दशमांश से भी भी कम आबादी वाले देशों को हम से दस गुने नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं. क्या भारतीय लोग बुध्दि में कम हैं? नहीं, किन्तु अनुसंधान, आविष्कार, खोजें तथा नवीन सोच-विचार के लिये मातृभाषाएं जो संवेदनात्मक भाषाएं होती हैं, अधिक उपयुक्त होती हैं, आवश्यक होती हैं. ऐसे कार्यों के लिये बौध्दिक शक्ति के साथ कल्पना शक्ति तथा संवेदनशीलता आवश्यक होती है. कल्पनाशक्ति तथा संवेदनशीलता का महत्त्वपूर्ण विकास शिशु से लेकर किशोर अवस्था तक अधिक होता है. हमारी सच्ची प्रतिभा – सारे भारत की सच्ची प्रतिभा तभी चमकेगी जब हम भारतीय भाषाओं में काम करेंगे.

एक तरह से, हम अंग्रेजी ज्ञान द्वारा पाश्चात्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (विप्रौद्योगिकी) का लाभ उठा सकते हैं. किन्तु नहीं उठा पा रहे हैं, विश्व में हमारे विप्रौद्योगिकी के शोध पत्रों का स्थान नगण्य है. (देखिये, ‘भारत में विज्ञान का स्थान’ – पी बालाराम; ‘विज्ञान’ – फरवरी, 2003). यदि ‘सॉफ्टवेअर’ में कुछ स्थान है तो वह हमारे अंग्रेजी ज्ञान के कारण कम, वरन कम्प्यूटरी – भाषा के ज्ञान के कारण अधिक है. वास्तव में मौलिक (विप्रौद्योगिकी में) शोध पत्रों का हमारा स्तर गिरता ही जा रहा है. वास्तव में यह अंग्रेजी हमारी रोटी में धीमे विष का काम कर रही है. जो लाभ हम सोच रहे हैं कि हमें अंग्रेजी से मिल रहा है, वह वास्तब में नहीं मिल रहा है. उससे हानि ही अधिक हो रही है. अतएव अंग्रेजी को पहले तो रोटी की भाषा से अलग करना होगा और फिर राजभाषा से. उसे एक उपयोगी विदेशी भाषा का ही स्थान मिलना चाहिये. अंग्रेजी से मुक्ति पाश्चात्य संस्कृति की दासता से मुक्ति है, हमारे मन-बुध्दि की मुक्ति है.

भारत में जब तक नेता भारतीय संस्कृतिशील थे उनमें प्रेम, त्याग, ईमानदारी, उदारता इत्यादि अधिक थी, यद्यपि भ्रष्टाचार तो भारत में द्वितीय विश्वयुध्द से बढने लगा था, किन्तु समाज में भ्रष्ट-धनी लोगों का सम्मान नहीं था, भ्रष्टाचार की भर्त्सना होती थी. ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के सिद्वान्त का सम्मान था. किन्तु जैसे ही अंग्रेजी शिक्षा बढी तथा, अधिकांशतया, अंग्रेजी शिक्षित व्यक्ति शीर्ष पदों पर-राजनैतिक, शासनिक तथा प्रशासनिक सेवाओं में आए भोगवाद का बढना, भ्रष्टचार का तेजी से बढना प्रारम्भ हो गया, जो आज शर्मनाक स्थिति तक पहुंच गया है. जिन जिन अंग्रेजी शिक्षित व्यक्तियों ने अपनी भाषा से सम्पर्क रखा, अर्थात अपनी संस्कृति से सम्बन्ध रखा, वे अभी भी अधिकांशतया भारतीय आदर्शों के अनुसार कार्य कर रहे हैं. सबसे अधिक नैतिक पतन आज के युवा एवं नवयुवा वर्ग में है, और टीवी प्रभावित गरीब वर्ग में भी है. टीवी भोगवाद तथा वर्गद्वेष आदि के प्रचार का आज सर्वशक्तिशाली साधन बन गया है.

भोगवाद केवल वस्तुओं के भोग तक सीमित नहीं रहता, उसमें तो मनुष्य मनुष्य का भी भोग करता है – अधिक शक्तिशाली कम शक्तिशाली का भोग करता है, चाहे वह पुरुष हो या नारी. भोगवाद में जिसके पास अधिक सत्ता है, अधिक धन है, अधिक बल है वह अन्य का भोग कर रहा है. ‘सामी संस्कृति’ में मूलतः नारी का स्थान पुरुष से न केवल नीचा रहा है वरन वह पुरुष के मनोरंजनार्थ निर्मित की गई थी, ऐसी मान्यता है. इसीलिये उस समाज में नारी को पुरुष के साथ बराबरी करने अथवा पुरुष-शासन से स्वतंत्रता पाने के लिये आन्दोलन करना पडा. और अपने सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर पाश्चात्य समाज ने कहा कि यह बराबरी या नारी-स्वातंत्र्य तभी होगा जब न केवल उसे कानून में बराबरी मिलेगी वरन जब नारी भी अर्थार्जन कर सकेगी. प्रिवार में जहां कि व्यवहार का आधार प्रेम का होना चाहिये, उसे ‘अर्थ’ का आधार दिया गया और पाश्चात्य संसार में नारी अर्थार्जन कर रही है. किन्तु अधिकांशतया उसी सूत्र – ‘(इस प्रकरण में आर्थिक रूप से) अधिक शक्तिशाली कम शक्ति वाले या वाली का भोग करता है’ – के अनुसार वह या तो पुरुष का भोग कर रही है या (अधिकांशतया) पुरुष उसका भोग कर रहा है. ऐसा अमेरिका में स्वयं नारियों ने स्वीकार किया है, और ‘एनरान’ घोटाले के समय बहुत चर्चित भी रहा है.

पुरुष और नारी में बराबरी होना चाहिये, उसी तरह जिस तरह पुरुष-पुरुष में, वरन उससे भी अधिक क्योंकि नारी कोमलांगी है तथा मा/ भी बनती है. हमारी मूल संस्कृति में नारी न केवल सहचरी, सहयात्री है वरन पूज्या भी है. यह ‘बराबरी’ उसे अर्थार्जन-शक्ति के आधार पर नहीं वरन प्रथमतः उसके मात्र मानव होने के कारण मिलती है. जब हमारे दृष्टा ॠषि सारे विश्व में ‘एक’ ही देखते हैं, कहते हैं, ‘नेह नानास्ति किंचन’ यहां विभिन्नता है ही नहीं! तब पुरुष और नारी में समता अवश्य सम्मानित की जाएगी, जो भेद होगा वह गुण-कर्म के आधार पर होगा. और इसीलिये अपने मातृत्व के गुण-कर्म के आधार पर वह पूज्या मानी गई, ‘शक्ति’ मानी गई. पिछले 1300 वर्षों में हमारा ‘जबरन’ पतन हुआ, हम व्यवहार में अपने सांस्कृतिक-सभ्यताई शिखर से नीचे गिरते आ रहे हैं. मुसलमानों ने तलवार के बल पर न केवल धर्म परिवर्तन कराये, वरन हमारे धार्मिक संस्थानों को, ज्ञान केन्द्रों को नष्ट किया. इन सबके परिणामस्वरूप समाज में अज्ञान बढा, आदर्श गिरे, रूढियां बढीं. क़िन्तु मूल संस्कृति अभी भी शेष ग्रन्थों में, कतिपय विद्वानों में शेष है. अभी भी सुसंस्कृत हिन्दू के घर में गुणकर्मों के अनुसार नारी सम्मानित है.

आज अधिकांश हिन्दू समाज के असंस्कृत या कुसंस्कृत परिवारों में व्यवहार में नारी का स्थान वह हिन्दू संस्कृति के आदर्श वाला स्थान नहीं है. चिंता का विषय है. लगभग 40 वर्षों से अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों की लोकप्रियता बढती ही जा रही है. पिछले लगभग पन्द्रह वर्षों से टीवी कार्यक्रमों में ‘नारी’ को मुख्यतया लुभावना शरीर बनाकर अधिक प्रस्तुत किया जा रहा है. पिछले दस-पन्द्रह वर्षों से अंग्रेजी माध्यम में प्रशिक्षित तथा टीवी द्वारा प्रभावित नव युवा वर्ग में जो स्थान नारी का है वह एक भोग की वस्तु का अधिक है, मानवता का कम है – वैसे उस वर्ग में नारी-पुरुष एक दूसरे को भोग की, अपनी आवश्यकता कीर् पूत्ति के साधन ही अधिक समझते हैं. यह वह वर्ग है (नारी तथा पुरुष दोनों का) जो पढा लिखा है – अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में – जो अच्छा कमा लेता है या संपत्तिशाली है और भारतीय संस्कृति से कट गया है – क्योंकि उसे जीवन का आनन्द ‘पिज्ज़ा हट’ के पिज्ज़ा में, मैकडानल्ड के बर्गर में, सिगरेट, शराब में, फैशन परेडों में, डिस्को में, सिनेमा में, फैशनेबल वस्त्रों और जूतों में, पॉप संगीत में, तथा कार, मोटरसाइकिल, सैलफोन, आदि में अधिक मिलता है. यह सब ‘आधुनिक’ बनने तथा दिखने के लिये अर्थात पश्चिम का अनुकरण करने के लिये आवश्यक माना जाता है. साफ सुन्दर कपडों, कार, मोटर साइकिल, सैल फोन इत्यादि के उपयोग पर तो किसी को भी आपत्ति नहीं होना चाहिये, किन्तु यह वस्तुएं किसी के जीवन में कितना ऊंचा स्थान पाती हैं, और उन्हें प्राप्त करने के लिये वह किन अन्य आवश्यकताओं का त्याग करता है, विश्लेषणीय है. विशेषकर कि जब उसकी पसन्दें टीवी तथा अंग्रेजी अखबारों के विज्ञापन निर्धारित करते हैं. अंग्रेजी की तुलना में जिन हिन्दी के अखबारों या पत्रिकाओं का वितरण अधिक व्याप्त है, तब भी विज्ञापन की दरें अंग्रेजी पत्र पत्रिकाओं की तुलना में उन्हें कहीं कम मिलती हैं. ऐसा इसलिये कि अंग्रेजी का पाठक, विशेषकर युवा अथवा नव-धनाढय, ऐसी वस्तुओं पर अधिक पैसा खर्च करता है. टीवी के विज्ञापनों में ‘नारी’ का भोग्या रूप ही अधिक दिखता है, लुभावनी कामुकता उनका विशेष गुण होता है. अधिकांशतया, सारा माध्यम नारी को मात्र शरीर मानकर प्रस्तुत कर रहा है वह भी नारी-स्वातंत्र्य के नाम पर. लडक़ियों, लडक़ों पर उनके माता-पिता का नियंत्रण कम होता जा रहा है क्योंकि वे माता पिता को ‘आउट आव डेट’ की संज्ञा देकर स्वयं आधुनिक बनने की दिशा में अग्रसर हैं. और जो पश्चिम में हो रहा है वही आधुनिक है. लडक़ियां स्वयं मॉडल बनकर नारी को भोग्या – के रूप में प्रस्तुत करती हैं. अब समाचार पत्रों के मालिकों का मुख्य ध्येय अखबारों के द्वारा धनार्जन है – खबर, लेख आदि, अधिकांशतया, इसी आधार पर चुने जाते हैं. भोगवाद में हमारे मीडिया, पत्र, पत्रिकाएं, पॉप आर्ट, पॉप कल्चर की तरह ‘सर्वनिष्ठ निम्न घटक किन्तु धनी व्यक्ति’ की रूचि को बनाते हैं और पुष्ट करते हैं. साम्यवादी सोच ने धर्म को अफीम कह दिया. धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा लगभग धर्म_शून्यता की गई. धर्म जो नैतिक मूल्यों की स्थापना कर रहा था, असहाय होने लगा, नैतिक पतन प्रारंभ हो गया. अंग्रेजी शिक्षा तथा विज्ञान की शिक्षा नैतिक मूल्य नहीं ला पा रही है.

इस तरह हम देखते हैं कि अंग्रेजी भाषा की शिक्षा अपने साथ पाश्चात्य संस्कृति का भोगवाद, उनका न्यूक्लियर सामाजिक संगठन लाई है, और व्यक्ति-वाद लाई है. इसके अपवाद मिल सकते हैं क्योंकि शैशव तथा किशोर अवस्था में पडे संस्कार यदि समुचित दृढ हों तो वे अंग्रेजी शिक्षा के संस्कारों का प्रतिरोध कर सकते हैं. कठिनाई यह आ गई है कि अब प्रौढ व्यक्ति भी अर्धसंस्कारित है जो युवा प्रश्नों के समुचित उत्तर नहीं के सकता. और भी दुखद तथ्य यह है कि अंग्रेजी शिक्षा पाश्चात्य नागरिकों सरीखी कर्मनिष्ठा, ईमानदारी तथा न्याय-व्यवस्था का सम्मान नहीं ला पाई है. यदि ऐसा होता तो क्यों हमारी सडक़ें गढ्ढों से भरी रहतीं, क्यों जरा सी तेज हवा चलने पर बिजली गुल हो जाती, पीने के पानी की शुध्दता क्यों संदेहास्पद रहती, जरा सी बारिश आने पर टेलिफोन क्यों ‘मर’ जाते हैं! हमारे न्यायालयों में न्याय मिलने में क्यों दशक लग जाते हैं? और आज तो न्यायालयों में भी भ्रष्टाचार की अति देखी जा सकती है. इन संस्थाओं में भी, जहां कार्मिकों का मूल्य या आदर्श मानवता होना चाहिये, ‘पैसा’ हो गया है, भोगवाद हो गया है. यह सारे क्षेत्र आधुनिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र हैं जिनके कर्मियों को उच्च शिक्षा अंग्रेजी में ही मिलती है. इसका एक कारण तो संस्कृति-हीनता (भ्रष्टाचार) है, किन्तु उसके अतिरिक्त महत्त्वपूर्ण कारण है आधुनिक-प्रौद्योगिकी की संस्कृति को हमारे द्वारा न सीख पाना – जो कार्मिकों को अपने कृत्यों पर, कृत्यों की कुशलता तथा उत्कृष्टता पर अभिमान करना सिखाती है. थोडा बहुत भ्रष्टाचार पाश्चात्य जगत में भी है किन्तु सभी कार्मिकों को अपने कृत्यों की उत्कृष्टता पर अभिमान होता है. अमेरिका, या इंग्लैंड में सालों में भी कभी बिजली एक आध बार गडबड करती है. मेरे 6 साल के इंग्लैंड की रिहाइश में एक भी बार बिजली न केवल नहीं गई वरन उसकी वोल्टता भी निर्धारित मान पर दृढ बनी रही. पानी इतना शुद्ध कि सीधा नल से निकले पानी को पिया जाता है. उन धनी देशों में घर घर न तो इन्वर्टर या जनरेटर का, और न जल-फिल्टरों का फिजूल खर्च करना पडता है. ऐसा क्यों? भारतीय जो अंग्रेजी पढते हैं, एक तो, अधिकांशतया उनका मुख्य ध्येय ‘रोटी’ कमाना होता है, ज्ञान अर्जन नहीं. दूसरे, वह ‘अंग्रेजी’ टुकडों में पढी ज़ाती है और समाज में उसका वह ‘रोल’ नहीं है जो किसी समाज की मातृभाषा का होता है. यद्यपि भारतीय भाषाओं से रोटी कमाना अपेक्षया कठिन है, तब भी वे जीवंत हैं और जीने के लिये संघर्ष कर रही है. अंग्रेजी को रोटी से काट दीजिये और देखिये अंग्रेजी कितने जल्दी हाशिये की भाषा या विदेशी भाषा की तरह संकुचित हो जायेगी. तीसरे, एक विदेशी भाषा को सीखना, वह भी अंग्रेजी जैसी कठिन भाषा को, अतिरिक्त श्रम तथा समय की मांग करता है. अतएव विद्यार्थीगण जो भारतीय ग्रन्थ अपनी भाषा में पढते थे, अब वे अधिकांशतया अंग्रेजी के सस्ते उपन्यास (पल्प लिटरेचर) पढते हैं क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य अंग्रेजी भाषा को जल्द सीखना है उससे ज्ञान प्राप्त करना बाद में. एक तरफ तो भाषा से जिस तरह संस्कृति का संस्कार आता है, वह उपरोक्त कारणों से अंग्रेजी भाषा द्वारा समुचित रूप से नहीं आ पाता. दूसरी तरफ, संस्कृति का संस्कार जो व्यवहार से आता है, अंग्रेजी संस्कृति का वह संस्कार भी नहीं आ सकता क्योंकि वह व्यवहार तो ब्रिटेन में उपलब्ध है भारत में नहीं. इस तरह वे अधिकांशतया दोनों संस्कृतियों के अच्छे गुणों से कमोबेश वंचित रह जाते हैं.

पाश्चात्य संस्कृति भोगवादी है और उसे भोगवाद के साथ रहते रहते दो-तीन शतियां हो गई हैं. इस लम्बी अवधि में पाश्चात्य लोगों ने भोगवाद के साथ रहना सीख लिया है. इसमें उनमें से अधिकांश सुख के भौतिक साधनों से सम्पन्न रहते हैं – किन्तु ऐसे लोगों की सख्या भी कम नहीं है जो भौतिक सुखों के खोखलेपन को पहचान लेते हैं और तब भारत की तरफ देखते हैं. ऐसे ही एक विद्वान इतिहासज्ञ टायनबी ने कहा था, कहना चाहिये एक ‘स्वप्न’ देखा था, कि ‘भारत विश्व का अध्यात्म गुरू बन कर पाश्चात्य सभ्यता के तले रौंदी जा रही ‘मानवता’ को बचाएगा’.

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18 Comments on "अंग्रेजी की रोटी में जहर"

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dr dhanakar thakur
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भाषा का एक होना राष्ट्र की पहचान नहीं है
चार कोष पर बदले बोली पांच कोष पर पानी
हमारी राष्ट्रीयता के एपहचन हमारे जीवन मूल्य हैं – वैसे संस्कृत सामूहिक विरासत है संस्कृति का वाहक है .
हिन्दी यह तभी कर सकती है जबकि वह संस्कृतमय हो जाये – उर्दू का मिश्रण राजनीतिक है जिसे हमारी राष्ट्रीयता से मतलब नहीं है . भारत आजादी के १०० वर्ष पहले गुलाम नहीं हुआ था ..गुलामी का प्रभाव करीब १००० ईस्वी से आने लगा था .. ऐसा क्यों हुआ यह सोचना चहिये. डॉ हेडगेवार ने यही सोचा था .

dr dhanakar thakur
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कुछ हद तक सत्य है कि ‘अंग्रेजी भाषा ने प्रेम के स्थान पर अपने स्वार्थों के लिये ही उत्तरदायी बना दिया है? नारी स्वातंत्र्य के नाम पर उसे भोग की वस्तु बना दिया है?’ ‘अंग्रेजी पढा लिखा वर्ग है, वह न तो भारतीय संस्कारों से सम्पन्न है और वास्तव में न पाश्चात्य संस्कारों से?’ अपने प्रश्नों को सशक्त जमीन देने के लिये वे कहते हैं कि राजा राममोहन राय, तिलक, गोखले और गांधी आदि सभी तो अंग्रेजी जानते थे, बोलते थे और इस भाषा में लिखते थे पर कम से कम गाँधी ने अंग्रेजी की वकालत नहीं की है. सत्य… Read more »
dr dhanakar thakur
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बहुत देर से किन्तु आज देखे मधुसूदंजी की टिप्पणी के लिए- काफी अछा लगा भारत की रास्त्रभाषा का नाम भारती..
विष्णु पुराण में हमारी राष्ट्रीयता का यही नाम है जो भौगोलिक होने के कर्ण सबोकों(अहिंदुओं को भी स्वीकार्य होनी चाहिए- उत्तरं यत समुद्रस्य, हिमाद्रैस चैव दक्षिणं , वर्षं तत भारतं नाम भारती यस्य संततिः

आपके प्रस्ताव (१) -८ बिलकुल सही हैं.

डॉ. मधुसूदन
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डॉ. ठाकुर — धन्यवाद।
इन्हीं ८ सुझावों के विस्तार से एक आलेख बनाने का प्रयास करता हूँ। आप खुलकर टिप्पणी करते रहें। जिससे त्रुटियाँ भी पता चलें। विचार सही दिशा में आगे बढ सकें।
मुझे बार बार अनुभव होता है, यहां परदेश में भी,कि राष्ट्र भाषा का होना भारत के लिए अनिवार्य है। जिससे हमारी संगठित शक्ति बढेगी। दूरियां कम होंगी। भेदभाव घटेगा, द्वेष घटेगा।

विश्व मोहन तिवारी
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विश्व मोहन तिवारी

राजीव जी
आपकी कविता मैने आज सुनी।
कविता का दर्द् बहुत् प्रभावी है.बधाई

Vishwa Mohan Tiwari
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दुबे जी,
आपको यह स्वर्ण अवसर मिला है एक हमसे कहीं अग्रगामी देश जाकर तकनीकी शिक्षा पर अवलोकन करने का।
अनेक अंग्रेज़ी‌भक्त लोग यह कह रहे हैं कि चीन भी अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा दे रहा है।
आप देखकर बतलाएं कि कितना महत्व दे रहा है?
शोध पत्र मंगवाने की सूचना मुझे भी दें, यदि उस योग्य हुआ तो एक शोध पत्र लिखने का प्रयास करूंगा.
बहुत धन्यवाद तथा शुभास्तु ते पंथा:

Rajeev Dubey
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विश्वमोहन जी,
हिंदी पर संगोष्ठी के स्थान पर एक शोध पत्र का सुझाव ज्यादा जोर पकड़ रहा है . अगले कुछ महीनों में निर्णय हो जाएगा . मेरी चीन यात्रा सफल रही . देखने को मिला के कैसे वह देश सभी कुछ खुद के हित में करता जा रहा है ! यदि हमें उनके साथ काम करना है या फिर उनके विरुद्ध लड़ना है , दोनों ही परिस्थितियों में हमें उनका तरीका समझ कर आगे बढ़ना होगा .

कश्मीर पर चिंतित और कार्यरत भी हूँ . अवसर मिले तो देखिएगा और सुनियेगा:
On YouTube:

http://www.youtube.com/watch?v=Uc_6uAfW8Uw
http://www.youtube.com/watch?v=ckd0_म्बक्क्द्क

ब्लॉग पर :
http://blogthesong.blogspot.com/

सादर ,
राजीव दुबे

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