लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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डॉ. दीपक आचार्य

मजा तो तब है जब अच्छे काम करें बुरे काम करने वाले तो खूब हैं

दुनिया में अपने स्वार्थ और ऎषणाओं की पूत्रि्त के लिए लोग इतने जतन करते रहते हैं जितने वे सच्चे इंसान बनने के लिए ये पूरी जिन्दगी भर भी नहीं कर पाते।

आज हालात यह हो गए हैं कि जिसे देखो वो भाग रहा है। पूछो तो कहेगा कि काम से फुर्सत ही नहीं। कई लोग तो ऎसे हैं जो कोई सी बात पूछो कह देते हैं कि मरने तक की फुर्सत नहीं है। ऎसे ही कई लोग जमाने से विदा हो गए जिनके पास भी औरों के लिए मरने तक की फुर्सत कभी नहीं थी और पूरी जिन्दगी बहानों के हवाले करते हुए आकस्मिक महाप्रयाण कर गए।

लोगों की पूरी जिन्दगी का खाका खींचे तो दूध का दूध और पानी का पानी अपने आप हो जाएगा। मगर आजकल आत्म मूल्यांकन और चिन्तन करता कौन है। शायद ही कुछ बिरले जीव बचे होंगे जो अपने कर्मों का मूल्यांकन करते होंगे।

जो रोजाना अपने बारे में चिंतन करते हैं वे अपने में सुधार की पूरी गुंजाइश रखते हैं और बदलाव लाते हुए व्यक्तित्व मेें निखार को नया स्वरूप प्रदान करते रहते हैं। वरना बहुसंख्य लोग सिर्फ अपने हिसाब से कर्म ही करते रहते हैं, उन्हें इस बारे में कुछ पता नहीं होता कि वे जो कर रहे हैं वह कहाँ तक जायज है? जायज और नाजायज का फर्क होता तो ये लोग ऎसे उलटे-सुलटे धंधे करते ही क्यों?

इन लोगों को अपनी कही बात या किए गए कर्मों से कहीं ज्यादा प्रतिफल और प्रतिक्रियाओें का इंतजार रहता है और जैसे-जैसे इनके पास परिणाम आने लगता है, इस किस्म के लोग फूल कर कुप्पा हुए जाते हैं।

कई तो ऎसे हैं जो ऎसी हरकतों की रजत और स्वर्ण जयंतियां मनाकर इतने फूल गए हैं कि बेल्ट तक चरमराने लगे हैं। अपने इलाकों में भी ऎसे महान-महान लोगों की कोई कमी नहीं है जो हमेशा कुछ न कुछ करने के आदी हो गए हैंं।

इन लोगों को अपने कत्र्तव्य कर्म और मर्यादाओं का भान हो न हो, ये दूसरों की मर्यादाओं के हनन को जीवन भर प्राथमिकता पर रखते हैं। जैसे ये लोग हैं, वैसी ही उनकी बॉड़ी लैंग्वेज है और वैसे ही इनके करम और करतूतें।

ये लोग जितना करते हैं उससे कहीं ज्यादा बकवास और पब्लिसिटी के आदी होते हैं और इन्हें हमेशा यह भरम बना रहता है कि वे ही हैं जिनके बूते उनका शहर या गाँव अथवा इलाका चल रहा है। वे न होते तो शायद यह सृष्टि ही नहीं होती। इनकी सोच ही ऎसी है जैसे बैलगाड़ी के नीचे चल रहा कोई श्वान हो। ‘‘सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं’’ के मूल मर्म को आत्मसात करने वाले ये लोग हमेशा हर क्षण किसी न किसी परायी बात का बोझ उठाते फिरते हैं।

इनके लिए अपना कहने को कोई काम होता ही नहीं अथवा न ये अपने आपको इस लायक समझते हैं, न इनके घर वाले कि ये कुछ काम करने लायक भी हैं। ऎसे लोग दूसरों की चिन्ता में ही डूबे रहते हैं।

परायी चिन्ताओं और पराये लोगों की बातें बनाने, काम बनाने और बिगाड़ने से लेकर चाहे जहाँ आग लगा देने में माहिर ऎसे लोग दुनिया में सभी जगह मिल जाते हैं और इनके भी अलग-अलग समूह बन जाते हैं जो हवाओं को दूषित करते हुए शौहरत के बिगड़ैल घोड़ों पर सवारी करते हुए उन सारे मैदानों को भी लांघ जाते हैं जो उनके लिए नहीं बने होते।

सारे जहाँ को अपने डण्डे से हाँक लेने का भ्रम पाले ये बिगड़ैल लोग कभी किसी के बारे में कुछ कहते हैं, कभी कुछ करते हैं। इनकी बातें कयासों और भ्रमों के अनुसार रंग और ढंग बदलती रहती हैं। कभी इनकी बातें ‘लगे तो तीर, नहीं तो तुक्का’ की तर्ज पर कभी इनके भाग्य से सच हो जाती है, कभी नहीं। हो जाएं तो वाहवाही लूटने में सबसे आगे, न हों तो इन्हें झूठा कौन कहे। ऎसा कहकर आफत मोल लेने से तो अच्छा है इनसे दूरी बनाए रखी जाए।

इन विषबेलों ने न किसी वटवृक्ष को छोड़ा है, न पीपल या बरगद को। इनके श्वेत-श्याम इतिहास से वाकिफ लोगों को अच्छी तरह पता है कि इन लोग की पूरी जिन्दगी बुरे काम करने और बुरी बातें कहने में ही गुजरती है।

समझदार लोगों के लिए तो ये मसखरों और डोंडीवालों से ज्यादा महत्त्व नहीं रखते लेकिन इनकी नापाक हरकतों से नावाकिफ लोग इनके झाँसे में आए बिना नहीं रह सकते क्योंकि इनके करम और इनकी खालों का इनकी असली जिन्दगी से कहीं कोई वास्ता नहीं हुआ करता और ऎसे में इनका दोहरा चरित्र जब तक लोगों को ज्ञात होने लगता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

ऎसे खूब लोग हमारे इर्द-गिर्द भी विचरण करने लगे हैं जो कभी किसी का अच्छा नहीं सोचते, न अ्रच्छा कर पाते हैं। पूरी जिन्दगी ये लोग बुरी सोच के साथ रहते हैं और बुरे करम करते रहते हैं। लोकप्रियता का झण्डा लिए चलने वाले इन लोगों के लिए बुरे काम करना बाँये हाथ का खेल रहा है। फिर भी डींगे हाँकते हैं अच्छे काम की।

हकीकत तो यह है कि ऎसे लोग कोई ऎसा काम नहीं कर पाते हैं जिनके बारे में ये दिल से कह सकें कि अच्छा है। यह उनका और समाज दोनों का दुर्भाग्य है कि ऎसे खोटे लोगों की चवन्नियाँ चल निकलती हैं और स्वर्ण मुद्राओं को लोग पहचान तक नहीं पाते।

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