लेखक परिचय

डा. अरविन्द कुमार सिंह

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज, वाराणसी में , 1991 से भूगोल प्रवक्ता के पद पर अद्यतन कार्यरत। 1995 में नेशनल कैडेट कोर में कमीशन। मेजर रैंक से 2012 में अवकाशप्राप्त। 2002 एवं 2003 में एनसीसी के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। 2006 में उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ एनसीसी अधिकारी के रूप में पुरस्कृत। विभिन्न प्रत्रपत्रिकाओं में समसामयिक लेखन। आकाशवाणी वाराणसी में रेडियोवार्ताकार।

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envडा. अरविन्द कुमार सिंह

हमारा देश विश्व के सर्वाधिक जनसंख्या रखने वाले देशो के बीच दूसरा स्थान रखता है। इसकी विशाल जनसंख्या जहाॅ इसको कई समस्याओं से निजात दिलाती है, वही कुछ बिन्दुओ पर समस्याओं का रूप भी धारण करती हैं। एक तरफ इस जनसंख्या के लिये जल संकट तो दूसरी तरफ खाद्यान्न समस्या। श्वास हेतु आक्सीजन का आभाव आज नही तो कल समस्या का रूप धारण करेगा ही। उपजाउ भूमि का संकुचन इस जनसंख्या की सबसे महत्वपूर्ण समस्या के रूप में उभार ले रहा है।
दूसरी तरफ सम्पूर्ण विश्व पर हम दृष्टीपात करे तो आज हालात यहाॅ तक पहुॅच गये है कि विश्व के औसत तापमान में वृद्धि के कारण द्विपो एवं समुद्र तटिय क्षेत्रो के डूब जाने का खतरा पैदा हो गया है। इसके पीछे मात्र एक ही कारण कार्यरत है और वह है पर्यावरण का असंतुलन। इस लिये आवश्यक है बच्चों ! हम पर्यावरण से अच्छी तरह से परिचित ही न हो वरन उसके असंतुलन को दूर करने में भी सहायक हो। हम सबसे पहले यह समझे कि पर्यावरण क्या है –
पर्यावरण दो शब्दों परि और आवरण से मिलकर बना है। परि का अर्थ है चारो ओर से तथा आवरण का अर्थ है घेरना। स्पष्ट है कि जो कुछ भी हमारे चारो ओर व्याप्त है – पर्यावरण कहलाता है। हमारे चारो ओर का पर्यावरण भौतिक एवं जैविक तत्वों से मिलकर बना है। भौतिक तत्वो में क्षेत्रो की भौगोलिक स्थिति, मिटटी, ख्निज, चटटानें सौर्य प्रकाश, तापमान,वायुमण्डलीय गैसे, जल आदि शामिल है। इसे भौतिक पर्यावरण भी कहते है। प्रत्येक जीव अपने प्रकाश, तापमान,जल और आवास जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भौतिक प्र्यावरण पर ही निर्भर रहता है। पर्यावरण के जैविक तत्वो में वनस्पति, जीव-जन्तु, सूक्ष्म जीव एवं मानव सम्मिलित है। पृथ्वी के जिस भाग में जैविक प्र्यावरण पाया जाता है, उसे जैव मण्डल कहते है।जैव मण्डल की उपस्थिति के कारण ही सौर्य मण्डल में पृथ्वी को विलक्षण या अनोखा ग्रह कहा जाता है।

पृथ्वी पर जैव मण्डल की उपस्थिति के कुछ विशिष्ट कारण हैं

• सर्य और पृथ्वी एक ऐसी अनुकूल दूरी पर स्थित है। जिसकी वजह से पृथ्वी न तो अधिक गर्म होती है और न ठण्डी।

• पृथ्वी के चारो ओर वायु मण्डल विद्यमान है। जिसके कारण पृथ्वी पर पन्द्रह डिग्री सेन्टीग्रेड का औसत तापमान बना रहता है।

• वायु मण्डल में मानव के लिये आक्सीजन तथा पेड पौधे के लिये कार्बन डाई आक्साइड और नाइटोजन जैसी जीवनदायिनी गैसे पायी जाती है। इन गैसो की वजह से ही जैव मण्डल में प्रकाश संश्लेषण और श्वसन प्रक्रियाए होती है।

हमारे लिये जैव मण्डल रूपी पर्यावरण का सर्वाधिक महत्व है, क्योकि प्रत्येक जीव इसी पर्यावरण में विविध प्रकार की प्राकृतिक और मानवीय घटनाओ एवं उनके प्रभावो के बीच जीवन यापन करता है। आओ बच्चो हम थोडा पर्यावरण के महत्व को जाने –

• पर्यावरण की आधारभूत इकाई जैवमण्डल है, जिसमें जीवन के विविध रूप पाए जाते है।

• पर्यावरण में विद्यमान समस्त जैविक एवं भौतिक तत्वों के स्वभावतः अपने अपने कार्य होते है। अपने अपने कार्यो को वे प्राकृतिक नियमों के अन्र्तगत स्वतः ही करते रहते है। यही कार्यप्रणाली पर्यावरणीय संतुलन को बनाकर रखती है।

• पर्यावरण भौतिक संसाधनो का भण्डार है। मिटटी, खनिज, जल, वनस्पति, जीव – जन्तु आदि पर्यावरण के प्राकृतिक संसाधन है। मानव के कल्याण एवं समृद्धि का आधार ये प्राकृतिक संसाधन नही है।

पर्यावरण एक भौतिक एवं जैविक संकल्पना है, जिसमें वायुमण्डल, स्थलमण्डल, जलमण्डल और जैवमण्डल सम्मिलित हैं। अब हम इनके बारे में सक्ष्पित रूप से जानने का प्रयास करेगे। सबसे पहले वायुमण्डल –
पृथ्वी को चारो ओर से आवरण की तरह घेरे हुए हवा के विस्तृत भण्डार को ही वायुमण्डल कहते है। गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण यह पृथ्वी सतह पर लटका रहता है। वायुमण्डल के संघटन में सबसे अधिक मात्रा में विद्यमान नाइटोजन गैस का उपयोग जीवों द्वारा प्रोटीनों, न्यूक्लीक अम्लों और दूसरे नाइटोजनीय योगिको के संश्लेषण हेतु किया जाता है। गर्मी को रोककर रखने में वायुमण्डल एक विशाल काॅच घर का कार्य करता है। वायुमण्डल सूर्य के पराबैगनी विकरण से पृथ्वी की रक्षा करता है। वायुमण्डल जलवाष्प का भण्डार है जिससे धरातल पर वृष्टी होती है और स्थलमण्डल तथा जलमण्डल पर वृष्टी के वितरण को भी यह नियन्त्रित करता है। बच्चों! पर्यावरण में उर्जा का एकमात्र प्रधान श्रोत सूर्य है। पृथ्वी का बाह्य वायुमण्डल इस उर्जा को एक दशमलव नौ चार गा्रम कैलोरी प्रति मिनट प्रति वर्ग सेमी की दर से प्राप्त करता है। सूर्यातप वितरण का वार्षिक प्रारूप वायुमण्डलीय संचार प्रणाली में परिवर्तन लाता है। इसके कारण वायुदाब,वायुगति,वर्षा, वाष्पीकरण और नमी की मात्रा तथा जलचक्र में परिवर्तन होते है। और अब स्थलमण्डल –
यह पृथ्वी का सबसे उपरी भाग है। स्थलमण्डल का जो भाग जलमण्डल से उपर दिखाई पडता है, स्थल या थल कहलाता है। स्थलमण्डल ही मिटटी का मुख्य घटक है जिसकी आवश्यकता स्थलीय वनस्पति को पडती है। पृथ्वी सतह पर पर्वत, पठार और मैदान प्रमुख स्थल रूप है। इन स्थल रूपो पर अपक्षय, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण की क्रियायें होती हैं। बहते हुये जल, हिमानी, सागरीय लहरे, पवन द्वारा अपरदन, परिवहन, और निक्षेपण क्रियाओं से स्थलरूपों का निर्माण होता है। इसी के अनुरूप क्षेत्र विशेष की परिस्थितिकी का निर्माण होता है।
पृथ्वी की उपरी सतह का र्निमाण विविध संघटन और संरचना वाली चटटानों से हुयी है। ये चटटाने विविध प्रकार के खनिजों का भण्डार भी है। इनकी रचना आक्सीजन,सिलिकान, एल्युमिनियम, लोहा, मैग्नीशियम, कैल्सियम, पोटैशियम और सोडियम जैसे तत्वों से हुयी है। मिटटी में कई ठोस और तरल गैसीय पर्दोथों का मिश्रण हैं। मिटअी में आक्सीजन, सिलिकान, एलुमिनियम, लोहा आदि प्रधान तत्व है। पोषक तत्वों में नाइटोजन, कैल्सियम, फासफोरस, पोटैसियम, सल्फर, मैंगनीज, आयोडीन, ताॅबा मुख्य है। मिटटी ही वर्षा क ेजल को अपने अन्दर संचित करके भूमिगत जल का भण्डारण करती है। मानव की भोजन, वस्त्र और मकान सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कच्चा माल भी मिटटी ही उपलब्द्ध कराती है। अतः मिटटी एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। और अब हम बच्चो! जानकारी लेगें जलमण्डल के बारे में –
जीव का सत्तर से नब्बे प्रतिशत भाग जल ही होता है। सम्पूर्ण पृथ्वी के एकहत्तर प्रतिशत भाग पर जल विद्यमान है। उपलब्द्ध कुल जल का अन्ठानबे प्रतिशत भाग समुद्रो, नदियों एवं झीलो के रूप में हंै। शेष दो प्रतिशत जल अधिकाशतः ध्रुवीय प्रदेशो में बर्फ के रूप में जमा है। वायुमण्डल में जल, वाष्प के रूप मे रहता है और स्थलमण्डल पर वृष्टि के रूप में प्राप्त होता है। जल के संचरण में आशिंक परिर्वतन आने से स्थल और मिटटी की परतो में उपलब्द्ध जल की मात्रा में परिर्वतन आ जाता है। ऐसा होने पर सूखा या बाढ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पैाधे अपना भेाजन मिटटी से घोल रूप में ही प्राप्त करते है।
सागरो में जिस गहराई तक सूर्य का प्रकाश पहुचता है उसे रोशनी वाला भाग कहते है। इस भाग की गहराई सौ से दो सौ मीटर होती है। सागरिय जल की कई विशेषतायें है – जैसे तापमान, घनत्व, लवणता तथा सागरिय तंरग, धारायें, ज्वारभाटा। मानव अब अपनी खाद्य एवं खनिज तथा ईधन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये महासागरिय संसाधनों का दोहन करने लगा है।

जैवमण्डल के कारण ही पृथ्वी को विलक्षण ग्रह कहा जाता है। तो क्यो ना हम थोडी जानकारी जैवमण्डल के बारे में प्राप्त करे। याद रखो, जैवमण्डल में ही प्रकाश – संश्लेषण एवं श्वसन जैसी जीवनदायिनी प्रक्रियायें सम्पन्न होती हैं। भूमि पर अनेक पेड पौधे और जीव जन्तु पाए जाते है। ये वही पर मिलते है, जहाॅ स्थलमण्डल और वायुमण्डल का सम्पर्क होता है। उसी प्रकार समुद्र और स्थल के सम्र्पक में आने वाला क्षेत्र भी जीवो से भरा पडा है। ये जीव अधिकतर समुद्रीतट और तट के समीपवर्ती उथले सागर के जल में निवास करते है। तट से दूर महासागरों के मध्य में अनेक जीव जन्तु रहते है, इसमें से अधिकतर जीव महासागरीय जल के उपरी भाग में रहते है। जैवमण्डल की यह विविधता ही पृथ्वी को अनोखा ग्रह बनाती है।
पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण

जिस पर्यावरण में हम रहते है, वह बडी तेजी से दूषित हो रहा है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने पर्यावरण की देखरेख और संरक्षण सही तरीके से करें। हमारे देश में तो पर्यावरण संरक्षण की परम्परा प्राचीन काल से ही रही है। हमारे पूर्वजों ने विभिन्न वन्य जीवों को देवी देवताओं की सवारी मानकर और विभिन्न वृक्षो में देवी देवताओं का निवास मानकर उनका संरक्षण किया है।
पर्यावरण संरक्षण मानव और पर्यावरण के बीच सम्बन्धों को सुधारने की एक प्रक्रिया है। जिसके दो उददेश्य है। पहला, उन मानवीय क्रिया कलापो का प्रबन्धन जिनकी वजह से पर्यावरण को क्षति पहुॅचती है। दूसरा मानव की जीवन शैली को पर्यावरण की प्राकृतिक व्यवस्था के अनुरूप आचरणपरक बनाना, जिससे पर्यावरण की गुणवत्ता बनी रहे। इसके लिये बच्चो! हम कुछ उपाय व्यवहार में ला सकते है –

• कारखानो से हवा में मिलने वाले, जल में और भूमि के अन्दर फेके जाने वाले अपशिष्ट पदार्थो का उचित निस्तारण कर के।

• विषैले और खतरनाक अपशिष्ट पदार्थो के निपटान के लिये कडे कानूनो का प्रावधान कर के।

• संसाधनो का सर्वोतम उपयोग हेतु जनजागरण कर के।

• कृषि में रसायनिक कीटनाशको के उपयोग को कम कर के।

• वन प्रबन्धन के द्वारा वनो के क्षेत्र में वृद्धि कर कर के।

• विकास योजनाओं को शुरू करने से पहले पर्यावरण पर उनके प्रभाव का आंकलन कर कर के।
इसके पहले कि हम अपनी बात समाप्त करे, एक बात आप से अवश्य कहना चाहूगा याद रखिये, आप सम्पूर्ण दुनिया को तो नही बदल सकते है पर हाॅ आप अपने व्यवहार में परिवर्तन करना चाहते है तो आप को कोई नही रोक सकता है और दुनिया के बदलाव की कहानी यही से शुरू होती है। आज हर व्यक्ति एक संकल्प ले कि वो जहाॅ है उसी स्थान पर एक पौधा अवश्य लगायेगा। यही आपकी तरफ से इस अनोखे ग्रह को दिया गया सबसे खूबसूरत तोहफा होगा।

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