लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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दल-दल तो दल-दल ही होती है, वह सबके लिए जानलेवा हो सकती है, पर ‘कमल’ के लिए नही। ‘कमल’ के लिए तो जितनी कीचड़ बढ़ाओगे उतना ही अच्छी रहेगी। बात यूपी के 2017 के विधानसभा चुनावों की करें तो यूपी में राजनीति की दल-दल चाहे जितनी भयानक क्यों न हो, यह ‘साइकिल’ को रोक सकती है और हाथी को ठोक सकती है, जबकि ‘कमल’ को खिला सकती है।

बात कु. मायावती बसपा की करें तो लोगों को बहन मायावती का हठीला और घमंडी स्वभाव अभी तक याद है। उनके गृहजनपद के लोगों की बात करें या फिर सुदूर पूर्वांचल की बात करें, लोगों को वे कटु अनुभव अभी तक याद हैं जब किसी समस्या को लेकर उनसे मिलने लोग जाते हैं तो बहनजी बिना मिले ही अपनी कोठी से निकल जाती थी, या लोगों को वापिस लौट जाने के लिए मजबूर कर देती थीं। ऐसा कोई भी विधायक नही था जो अपने क्षेत्र के लोगों के प्रतिनिधिमंडल का नायक बनकर लोगों को बहनजी से मिला सकने की क्षमता रखता हो। यहां तक उनके गृहजनपद का भी कोई सांसद या विधायक उनसे लोगों को मिला नही पाता था। क्योंकि वे बेचारे स्वयं भी कई-कई दिन बहनजी से मिलने के लिए लखनऊ पड़े रहते थे। ऐसे में लोगों का सीधा सवाल है कि जब बहनजी से उनकी पार्टी के सांसद या विधायक तक नही मिल सकते, तो उनकी पार्टी को वोट देने का लाभ क्या?

पूर्वांचल के लोगों के लिए हर मुख्यमंत्री सहज उपलब्ध होता है। कारण कि वह उनके मतों का सम्मान करता है। जबकि बहनजी अपने क्षेत्र के लोगों के मतों का भी सम्मान करना नही चाहतीं। उनके गृहजनपद में स्थित उनके अपने गांव और अड़ोसी-पड़ासी गांव के लोगों में भी इस बार बहन जी के विषय में कोई उत्साहजनक विचार नही है। लोगों में क्षोभ है और उनकी जमीन का मुआवजा जिस प्रकार बहनजी के समय में दिया गया था और उसमें कुछ क्षेत्रीय दलाल पार्टी के नाम पर खड़े हुए थे, उनके नाम से भी लोगों को नफरत है। लोगों को अच्छी तरह याद है कि बसपा के लोगों ने उस समय कैसी लूट मचाई थी?

पूर्वांचल के सभी जिलों में मायावती की जातिवादी छवि को लेकर लोगों में रोष है। वह नही चाहते कि जातीयकटुता को बहन मायावती सपा के मुलायमसिंह यादव की कार्बन कॉपी बनकर फैलाती रहें। लोगों का मानना है कि प्रदेश में समतामूलक समाज की संरचना के लिए जातिवादी सोच का समूल विनाश किया जाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। पर कुमारी मायावती खुल्लमखुल्ला ‘तिलक तराजू और तलवार-इनको मारो जूते चार’ की राजनीति करके देश के समाज में घृणा का बीजारोपण करती रही हैं। जिससे प्रदेश की राजनीति की जातिवादी पेचीदगियां और भी ज्यादा जटिल हो गयी हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए बहन मायावती का इससे बड़ा कोई योगदान नही हो सकता कि उन्होंने इसे और भी जातिवादी बना दिया है। लोगों को पिछले चुनावों में कुमारी मायावती का यह नारा भी केवल छलावा ही दिखाई पड़ा था कि ‘हाथी नही गणेश है-ब्रह्मा, विष्णु, महेश है।’ यद्यपि कुमारी मायावती ने अपनी छवि को बदलने के लिए और सर्वसमाज को साथ लेने के लिए यह नारा लगाया था परंतु प्रदेश के मतदाताओं ने उस समय उन्हें सत्ता सौंपने से मना कर दिया था। लोगों के अपने-अपने तर्क होते हैं, कईयों का कहना है कि बहन मायावती तुष्टिकरण की राजनीति में कांग्रेस को मात देती जान पड़ती हैं, तो देश की सांस्कृतिक एकता को साम्यवादियों की भांति समय-समय पर क्षतिग्रस्त करने का भी प्रयास करती रहती हैं।

यह भी सर्वविदित है कि जब मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तो चारों ओर भ्रष्टाचार अपने चरम पर था, उनकी सरकार ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए दिखाने को तो भरपूर चेष्टा की, परंतु सच ये ही था कि यह सब दिखावा था। उन्होंने वास्तव में कुछ नही किया था सिवाय इसके कि कुछ अधिकारियों को भ्रष्टाचारी कहकर नाप दिया जाता था। वास्तव में यह खेल मायावती अपनी खाल को बचाने के लिए खेल रही थीं जिससे लोगों को लगे कि भ्रष्टाचारी मैं नही ये अधिकारी हैं, पर लोगों ने भ्रष्टाचारियों की मुखिया बहन मायावती को मानकर उन्हीं को सजा दे दी। नापे गये अधिकारियों में से कई अधिकारी ऐसे होते थे जो किन्हीं कारणों से बहनजी के दरबार में चढ़ावा चढ़ाने में कुछ विलंब कर देते थे या उसे चढ़ाने में आना-कानी करते थे। बहनजी को जैसे ही ऐसे अधिकारियों की जानकारी होती थी, वैसे भी वे उनकी सार्वजनिक मंचों से क्लास लेती थीं और कईयों को तो सार्वजनिक रूप से अपमानित कर चलता कर देती थीं। इसके पीछे कारण ये ही होता था कि लोगों पर यह प्रभाव डाला जाए कि बहनजी एक कठोर प्रशासिका हैं। पर जनता है कि ये सब जानती समझती है। पिछले चुनाव में बहनजी को सत्ता से हटाकर जनता ने बता दिया था कि-‘बहनजी! अब सारी नौटंकी बंद करो।’

लोगों को पता है कि बहनजी ने पिछले विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश को चार भागों में विभाजित करने की बात कही थी। परंतु उनकी यह घोषणा भी केवल चुनावी सफलता प्राप्त करने के लिए एक घोषणा मात्र ही थी। यदि यह वास्तविकता होती तो चुनावों के बाद के बीते चार वर्षों में कुमारी मायावती प्रदेश को चार भागों में बांटने की अपनी योजना को क्रियात्मक स्वरूप देने के लिए कोई न कोई संघर्ष करतीं, या प्रदेश के विभाजन के लिए संघर्ष कर रहे कुछ संगठनों या राजनीतिक दलों को अपना नैतिक या सक्रिय सहयोग प्रदान करतीं, परंतु उन्होंने कहीं भी कुछ ऐसा नही किया जिससे उनकी प्रदेश के विभाजन संबंधी घोषणा को एक वास्तविकता माना जा सके। इस प्रकार ऐसी विषम परिस्थितियों की दल-दल में बसपा का हाथी उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में फंस सकता है। लोगों को इस बात से घोर आपत्ति है कि कुमारी मायावती चुनाव जीतने के पश्चात लखनऊ छोडक़र दिल्ली भाग जाती हैं। वह मैदानी लड़ाई लडऩे से बचती हैं और लखनऊ से दूर रहकर ही राजनीति करने में विश्वास करती हैं, जबकि एक जुझारू नेता को केवल बयानवीर न होकर कर्मवीर होना चाहिए।

इधर भाजपा ने एक युवा नेता को प्रदेश की कमान सौंपी है और उससे उम्मीद की है कि वह पार्टी को सत्ता में लाएगा। यह अच्छी बात है कि भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने कुछ-कुछ अमितशाही अंदाज में अपनी पारी की शुरूआत की है। उन्होंने पूर्व प्रदेशाध्यक्ष से हटकर पार्टी की कमान संभालते ही मैदान में उतरकर लडऩा आरंभ कर दिया है, वह जहां भी जा रहे हैं लोगों पर अपना प्रभाव छोड़ रहे हैं और लोग उनकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। इससे भाजपा की प्रदेश इकाई में उत्साह का माहौल है। जो पार्टी पिछले दिनों निष्क्रिय सी दिखाई दे रही थी, वही अब चेतन हो गयी है, और लगता है कि उसने अपनी कैंचुली छोड़ दी है। यदि पार्टी वरूण गांधी को प्रदेश की कमान देने के लिए अपना भावी मुख्यमंत्री घोषित कर देती है तो भाजपा प्रदेश की राजनीति में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। तब सपा की साईकिल रूक जाएगी और हाथी दल-दल में फंस जाएगा। फिलहाल भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष श्री मौर्य ने अच्छे संकेत दिये हैं, देखते हैं बसपा इस परिस्थिति में अपने आपको कैसे आगे बढ़ा सकती है? फिलहाल तो हाथी दल-दल में फंसा दिखाई दे रहा है।

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