लेखक परिचय

इक़बाल हिंदुस्तानी

इक़बाल हिंदुस्तानी

लेखक 13 वर्षों से हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। दैनिक बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल संपादन कर चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक 1000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक से अधिक अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं। रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिंदी ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत त्यागी एवार्ड से सम्मानित किये जा चुके हैं। स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन कर रहे हैं। मोबाइल न. 09412117990

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इक़बाल हिंदुस्तानी

दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुए आतंकवादी हमले में सरकार के हाथ अभी तक कोई सबूत न लगना इतना चिंता का विषय नही है जितना यह कि एक के बाद एक हुए कई हमलों की जांच की यही हालत है। 19 सितंबर 2010 को दिल्ली की जामा मस्जिद के पास विदेशी नागरिकों पर हमला हुआ था जिसमें कार विस्फोट की कोशिश की गयी थी। 7 दिसंबर 2010 को वाराणसी के शीतला घाट पर विस्फोट हुआ जिसकी जांच हाईफाई हैकिंग की सूचना से आगे नहीं बढ़ी। 25 मई 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट के गेट न0 2 पर धमाका हुआ और साज़िशकर्ता आजतक लापता है। 13 जुलाई 2011 को मंबई में तीन सीरियल धमाके हुए जिसमें आज तक कोई नतीजा नहीं निकला। और अब पांचवा हमला दिल्ली उच्च न्यायालय के गेट न0 4 व 5 पर हो चुका है लेकिन पुलिस और जांच एजंसियां अभी तक ईमेल के झमेले में उलझी हैं।

कहने का मतलब यह है कि दो सालों में हुए इन बड़े आतंकी हमलों में पुलिस, एटीएस और एनआईए अभी तक किसी खास नतीजे पर नहीं पहंुच सकी हैं। हालांकि जांच एजंसियों ने कसूरवारों को तलाशने के लिये कई छापे मारे और अनेक लोगों को हिरासत में भी लिया लेकिन कोई ठोस जानकारी और पक्का सबूत हाथ न लगने से किसी भी विस्फोट को नहीं खोला जा सका है। जहां तक ईमेल का सम्बंध है इनके लिये उग्रवादियों ने फर्जी नामों से सिम कार्ड खरीदे और लैपटॉप से ईमेल कर दिये। अभी तक जांच एजंसियों को केवल इतना पता लग सका है कि एक मेल इनमें से इंडियन मुजाहिदीन ने मुंबई से किया था। अकेले इतनी जानकारी से काम नहीं चल सकता क्योंकि बम कहां बने और किसने बनाये व कैसे रखे गये यह जानना ज़रूरी है।

नाकामियों की सूची काफी लंबी होती जा रही है लेकिन हमारे राजनेता हैं कि राजनीति से उूपर उठकर गंभीरता के साथ इस राष्ट्रीय समस्या पर विचार करने को तैयार नज़र नहीं आते। वे खुद तो वाई, एक्स और ज़ेड ग्रेड की अभेद्य सुरक्षा में रहते हैं लेकिन आम आदमी को सरकार ने आतंकवादियों के खूनी पंजों में कहीं भी कभी बेमौत मरने को खुला छोड़ दिया है। अब जनता यह सवाल पूरी शिद्दत से करने लगी है कि अगर जनता सुरक्षित नहीं है तो संविधान में सब बराबर होते हुए केवल पक्ष विपक्ष के नेता कैसे और किस अधिकार से सुरक्षित रह सकते हैं? सुरक्षा के दो पैमाने कैसे और कब तक चल सकते हैं? दूसरी बात तमिलनाडु, पंजाब और कश्मीर से जो आवाजें सज़ा पाये आतंकवादियों के पक्ष में राजनीतिक और क्षेत्राीय नज़रिये से उठ रहीं हैं उनको नेशनल पार्टीज़ का भी कहीं न कहीं संरक्षण प्राप्त है तो फिर देश के बारे में कौन और कैसे सोचेगा? नेता अगर आपस में ही वोटों की खातिर लड़ते रहेंगे तो देश और देशवासियों के लिये आतंकवाद से कौन लड़ेगा? दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुए बम ब्लास्ट को लेकर बंगलादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने मीडिया से यह अपील बिल्कुल ठीक की है कि वे हर आतंवादी घटना के बाद राजनेताओं का बयान लेने क्यों दौड़ते हैं जबकि उनके पास नया कहने को कुछ भी नहीं होता। अगर बहुत ज़रूरी हो तो उनका पहले ऐसे मौके पर दिया गया बाइट भी इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि उनको ऐसे कांड की नपे तुले शब्दों में औपचारिक निंदा करनी है। राजनीति करनी है। इसके साथ भविष्य के लिये कुछ झूठे ऐलान करने होते हैं, जो अकसर पूरे नहीं होते हैं।

जानकार सूत्रों का कहना है कि अदालतों की सुरक्षा को लेकर कई साल पहले जो योजना बनाई गयी थी उसपर आज तक अमल नहीं हुआ है। 23 नवंबर 2007 को लखनउू, फैज़ाबाद और वाराणसी में जब न्यायालय परिसरों में आतंकवादी हमले हुए तो सरकार की तरफ से बड़े बड़े दावे किये गये थे लेकिन वास्तविकता यह है कि इस योजना पर आंशिक रूप से भी अमल नहीं हुआ। और तो और दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर इसी साल 25 मई को आतंकवादियों ने प्रयोग के तौर पर छोटा विस्फोट करके शायद यह आंकना चाहा था कि सुरक्षा व्यवस्था का स्तर क्या है और बड़ा बम विस्फोट किये जाने पर कितना नुकसान किया जा सकता है। होना तो यह चाहिये था कि सरकार इस छोटी घटना को लेकर ही सचेत हो जाती लेकिन समय के साथ मामला रफा दफा कर दिया गया। अगर थोड़ा और पीछे जाकर ऐसे हमलों का इतिहास खंगाला जाये तो मार्च 1993, नवंबर 2008, और जुलाई 2011 में मुंबई में एक के बाद एक जो आतंकवादी हमले हुए, उनको लेकर भी सरकार ने राजनीति अधिक और सुरक्षा के ठोस और पुख्ता प्रबंध कम किये। मिसाल के तौर पर हर बार यह तय होता है कि भविष्य में ऐसी जगहों पर सुरक्षा चूक नहीं की जायेगी जहां बम विस्फोट का अधिक ख़तरा हो। इसके बावजूद देखने में यह आता है कि योजना के अनुसार न तो सरकार ने हाईकोर्ट के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगाये और न ही दूसरे सुरक्षा प्रबंध चाकचौबंद किये गये। मैटल डिटैक्टर से लेकर हर आगंतुक की कड़ी चैकिंग , प्रवेश पत्रा बनाने, आरएफ रीडर सिस्टम, फिलैप व बूम कैरियर, प्रवेश द्वार के निकट एक्सरे स्कैनर मशीन, बम निरोधक दस्ते की तैनाती और परिसर के बाहर बहुमंज़िली पार्किंग व्यवस्था आज भी दिल्ली से लेकर यूपी तक प्रोटैक्शन रिव्यू ग्रुप की बैठकों में ही उलझी हुयी है। प्रमुख सचिव गृह से लेकर यह योजना अभी तक सीआईएसएफ के दायित्व तय करने के बीच ही घूम रही है। एक आईपीएस अधिकारी तक की नियुक्ति स्थायी रूप से इस क्षेत्र में होने का मामला भी आज तक लटका हुआ है।

वैसे तो जनता के गुस्से और जज़्बात में कही गयी मामूली बातों से हमारे सांसदों और विधायकों का विशेषाधिकार ख़तरे में पड़ जाता है लेकिन जब जनप्रतिनिधियों की लापरवाही और भ्रष्टाचार से देश और देशवासियों की जान ख़तरे में पड़ती है तो इन नेताओं को सांप सूंघ जाता है। अन्ना हज़ारे के आंदोलन में लगातार चुप्पी साधकर अपनी अभी तक की राजनीतिक पूंजी गंवा देने वाले राहुल गांधी को भी राममनोहर लोहिया अस्पताल जाकर बम विस्फोट के घायलोें का हाल जानने की बजाये ‘गो बैक’ के नारों से समझ जाना चाहिये कि जनता के सब्र का पैमाना अब बार बार छलकने लगा है। वैसे तो हमारे प्रधनमंत्री अमेरिका से परमाणु करार करने के लिये इतने बेकरार होते हैं कि अपनी सरकार तक को दांव पर लगाने में गुरेज़ नहीं करते लेकिन अमेरिका में 11 सितंबर की घटना के बाद फिर से ऐसा कोई बड़ा हमला क्यों नहीं हुआ इस बारे मंे अमेरिका के सुरक्षा मानक अपनाने को कोई होमवर्क करने को तैयार नहीं हैं। जनता का दबाव बढ़ता देख अब हमारी सरकार ने अमेरिका से केवल खुफिया जानकारी साझा करने का ऐलान किया है जिससे कोई खास फायदा होने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। नेताओं से तो यही कहा जा सकता है-

मेरे बच्चे तुम्हारे लफ्ज़ को रोटी समझते हैं,

ज़रा तक़रीर कर दीजिये इनका पेट भर जाये।

 

 

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