लेखक परिचय

अवनीश सिंह भदौरिया

अवनीश सिंह भदौरिया

लेखक दैनिक न्यू ब्राइट स्टार में उप संपादक हैं।

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riverअवनीश सिंह भदौरिया
हमारे देश में बढ़ते प्रदूषण से नदियों का जीवन खतरे की ओर अग्रसित हो रहा है। आज के समय में नदियों की जो हालत है वह बहुत चिंताजनक है। हमारे देश में कई सरकार आर्इं और गई लेकिन किसी ने भी नदियों के जीवन को लेकर कभी कुछ नहीं किया। किया तो सिर्फ वायदे और वायदे। सरकारें हमेशा से नदियों पर सियासत करती आ रहीं हैं और इसका सिलसिला बदस्तूर जारी है। वहीं, सरकार सत्ता में आने के लिये नदियों की स्थिति का फायदा उठाकर उन्हें चुनावी मुद्दा बनाकर घसीटती हैं पर सत्ता में आने के बाद सरकार सायद भूल जाती है कि हमने वायदे भी किये हैं उन्हें पूरा करना है पर ऐसा नहीं होता। फिलहाल हमारे देश में भाजपा ने सत्ता की कमान संभाल रखी है और उसने नदियों के गहरे अफबाद पर चिंता जताई तो है लेकिन कुछ कर नहीं रही है। ऐसे में प्रदूषण से नदियों के अस्तित्व के साथ-साथ हमारा भी अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है। हाल ही में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने देश की नदियों की ताजा स्थिति पर एक शोध प्रस्तुत किया है जो हमें चेताता है कि गंगा, नर्मदा, चंबल, शिप्रा, गोदावरी, कावेरी, यमुना, ताप्ती, साबरमती, महानदी सहित अनेक छोटी-बड़ी नदिया अब अपने अस्तित्व से कड्डा संघर्ष कर रही हैं। पेश की गई रिपोर्ट देश की 302 नदियों की एक भयानक तस्वीर को दर्शाती है। अत्यधिक प्रदूषित होकर हमें अब सिर्फ किस्से-कहानियों में अपने डग़मगाते जीवन की दास्तां बताने को मजबूर हैं। उद्योग किनारे बहने वाली नदियां, सीवेज उड़ेल रहे बड़े-बड़े नाले और धोबीघाट की गंदगी सहित ऐसी अनेक सामाजिक, आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियां हैं जिन्हें हम आज भी हर राज्य में सरकार की नाक के नीचे बदस्तूर चला रहे हैं। ये नदियां अब जलाभाव में अपने आंसू बहा रही है क्योंकि जल के साथ आदमी ने छल किया है। निर्झर जल को अपने स्वार्थ में बांध लिया है। जबकि जल तो प्रवाह का सूचक है।

जल और धन तो चंचल है जो प्रवाह चाहता है, तरलता चाहता है। भारत अनेक नदियों से सम्पन्न देश है। जिनमें से 12 नदियों को विशाल माना गया है। और इनका जलग्रहण क्षेत्र 2528 लाख हेक्टेयर है। इन बड़ी नदियों में से गंगा-ब्रह्मपुत्र मेघना प्रणाली का सर्वाधिक जलग्रहण क्षेत्र है जो लगभग 1100 लाख हेक्टेयर है जो कि देश की सभी बड़ी नदियों के कुल जलग्रहण का 43 प्रतिशत हैं सिंधु (321 लाख हेक्टेयर), गोदावरी (313 लाख हेक्टेयर), कृष्णा (259 लाख हेक्टेयर) और महानदी (142 लाख हेक्टेयर) अन्य कुछ बड़ी नदियां हैं जिनका जलग्रहण क्षेत्र 100 लाख लाख हेक्टेयर से अधिक हैं मध्य आकार की नदियों का जलग्रहण क्षेत्र 250 लाख हेक्टेयर है जिसमें से सुबर्णरेखा नदी का सबसे अधिक जलग्रहण क्षेत्र 19 लाख हेक्टेयर है। धीरे-धीरे ये नदियां जिन-जिन शहरों से गुजर रही हैं वहां अपने वास्तविक जलग्रहण क्षेत्र को गवां रही हैं, ये ऐतिहासिक नदियां अपने साथ शहरों का तरल प्रदूषण समेट कर तिल-तिल कर मर रही हैं और हमारा सत्तातंत्र इन नदियों की चिंता में आपात बैठकें कर वर्षों से मोटी राशि की योजनाओं को आकार देने की बात कर रहा है लेकिन हमारा सत्तातंत्र इन नदियों में जान फूंकने की बजाये नदियों के जीवन को बचाने वाली मोटी रकम से अपनी जेबें भरने में को कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। सत्ता में स्थापित सरकार को दो साल हो गये हैं लेकिन नदियों के जीवन को लेकर बिल्कुल ततपर्य नहीं है उसे तो अपनी जेब की पड़ी है। प्रदूषित नदियों का पानी आज इतना प्रदूषित हो गया है कि अगर काई भी अपनी प्यार बुझाने कि लिये उसे पीले तो उसकी जान-आन पर बन सकती है। आज नदियों के हालातों को देखर कर दुख होता है कि जो नदियां देश की शोभा और शान हुआ करती थीं आज वे अपने अस्तित्व को बचाने में लगी हुई हैं।

मध्यप्रदेश में नर्मदा, चंबल, बेतवा, क्षिप्रा, गंभीर, जामनी, धसान जैसी नदियां अत्यधिक प्रदूषण का शिकार हो अपने अस्तित्व की लड़ाई के आखिरी दौर में हैं। यहां छोटी नदियां भी लगातार सूखती जा रही हैं, कई इलाके तो ऐसे हैं जहां नदियों के निशान तक नहीं बचे हैं क्योंकि बारिश के बाद ये नदियां धीरे-धीरे लुप्त होती जाती हैं। राज्य सरकार ने ऐसी 313 नदियों को चिन्हित किया है जो सूख चुकी हैं, जिन्हें पुनर्जीवित किए जाने की योजना सरकारी कागजों में फडफ़ड़ा रही है। मध्यप्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा अपने उद्गमस्थल अमरकंटक से लेकर खंबात की खाड़ी तक जहां-जहां से गुजरती है बेशुमार प्रदूषण और जहरीला कचरा अपने साथ लाकर अपने पावन रूप पर आंसू बहाती है। एक सर्वे के अनुसार नर्मदा में 100 से अधिक नाले मिल रहे हैं, पहले कभी नर्मदा में 84 प्रकार के जीव पाए जाते थे पर अब ये केवल लगभग 40 तक सिमट गए हैं। कभी सालभर बहने वाली पावन नदी क्षिप्रा सिंहस्थ के चलते और नर्मदा के पानी से कुछ नियंत्रण में तो है पर पूरी तरह प्रदूषण मुक्त नहीं है जिस पर कुछ साधु-संतों ने नाराजगी भी प्रकट की है। महू के जानापाव की पहाडिय़ों से निकलने वाली चंबल नदी खतरे में है यह भगवान परशुराम की जन्मस्थली भी है। नागदा से इसके अधिक प्रदूषित होने का क्रम आगे रूका नहीं है इसके तट पर बसे गांव के लोग अब इसका पानी नहीं पीते। मंदसौर जिले के 115 कि.मी.क्षेत्र से गुजरने वाली इस नदी को शिवना, रेवा, अंजनी और कंठाली नदी से प्रदूषण प्राप्त हो रहा है। राज्य प्रदूषण मंडल द्वारा लिए गए सेंपल पूरी तरह इस पानी को पूर्ण प्रदूषित करार देते हैं। 960 किलोमीटर लंबी और तीन राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान व उत्तरप्रदेश में शान से बहने वाली और अपने पानी पर दबंगई का मान बढ़ाने वाली चंबल अब टुकड़ों में बीमार है। प्रदूषण से लबालब नदियों में पावन गंगा, यमुना, हसदेव और शिवनाथ नदी की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है यही हाल अन्य राज्यों की प्रसिद्ध नदियों का भी है। हमारी नादानी अपनी नदियों को कहानियों तक समेट देने को आतुर है इसलिए अभी समय है कि इनको उतना ही उत्कर्ष बनाया जाए जितने वे सदा-सदा से थीं। हमें याद रखना होगा मानव सभ्यताऐं नदी-घाटियों में ही पली-बढ़ी हैं पर डर है कि वर्तमान मानवीय असभ्यता के चलते पुरातन सभ्यता का अंत इन नदियों के साथ ही न हो जाए। अब सोचना यह है कि क्या आने वाले समय में नदियों के जीवन को बचाया जा सकेगा या फिर हम उन्हें इसी तरह तिल-तिल के मरते देखते रहेंगे। मेरी 125 करोड़ देश वासियों व सरकार से गुजारिश है कि नदियों को उनकी जिंदगी को जल्द से जल्द दुरुस्त किया जाए। सरकार से आशा है कि नदियों के अस्तित्व को बचाने कि लिये सख्त से सख्त कानून को लागू किया जाए जो उनके जीवन में एक नई रोशनी लेकर आए।

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