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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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दिनेश पंत

प्रकृति का कहर एक बार फिर उत्तराखंड पर टूटा है। बादल फटने की घटना ने राज्य को भारी क्षति पहुंचाई है। राज्य के कई हिस्सों में भारी तबाही हुई है। जिसमें कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। प्राकृतिक तबाही का असर केवल आम जनजीवन पर ही नहीं पड़ता है बल्कि जीव जंतु भी प्रभावित होते हैं। हालांकि इस प्राकृतिक आपदा के जिम्मेदार स्वंय मनुष्‍य है जो अपने फायदे के लिए जंगलों को उजाड़ रहा है। जाहिर है जंगलों के खत्म होते अस्तित्व का असर जहां पर्यावरण पर पड़ेगा वहीं जानवरों को भी इसका नुकसान उठाना पड़ता है। यही कारण है कि राज्य में पिछले कुछ समय से वन्य प्राणियों और आबादी के मध्य ‘भूख’ मिटाने की लड़ाई शुरू हो गई है। कभी कभी दोनों पक्षों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। गुलदार, बाघ, हाथी, सुअर जैसे जंगली जानवरों का कहर यहां की आबादी पर टूट रहा है तो दूसरी और सेही, बंदर जैसे कई जंगली जंतुओं ने ग्रामीणों की फसल चैपट कर उसकी आजीविका का भी ताना-बाना बिगाड़ा है।

जंगलों में विचरने वाला गुलदार, चीता, बाघ, शेर व हाथी मानव बस्तियों तक पहुंच कर महिलाओं, बच्चों व मवेशियों को अपना शिकार बना रहे हैं। घात लगाकर हमला करने वाले गुलदार ने तो ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की नाक में दम कर रखा है। आदमखोर होते गुलदार का आतंक कम होने का नाम नहीं ले रहा है। अभी हाल में रामनगर की गर्जिया निवासी 55 वर्षीय महिला शांति देवी को बाघिन ने उस समय अपनी चपेट में ले लिया जब वह जंगल में चारा जुटाने के लिए गई थी। यह गुलदार लोगों को न सिपर्फ जंगल में बल्कि घर के आंगन में पहुंचकर अपना शिकार बना रहा है। गर्जिया की इस घटना के बाद वन विभाग ने ग्रामीणों के जंगल में जाने पर रोक लगा दी। इस रोक के चलते गांव में मवेशियों के लिए चारे का संकट पैदा हो गया है। लोग चारे के अभाव में अपने मवेशियों को औने-पौने दामों में बेचने को विवश हो गए। इस तरह की यह अपने आप में कोई पहली घटना नहीं है। वर्ष 2000 से लेकर अब तक विभिन्न जंगली जानवरों के हमले में 317 लोग अपनी जान गंवा बैठे हैं। 824 लोग घायल हुए हैं। गुलदार के हमले में जहां 204 लोगों ने अपनी जान गंवाई तो 363 घायल हुए। वहीं हाथी के हमले में 85 लोगों को जान गंवानी पड़ी तो 63 घायल हुए। भालू के हमले में 15 लोग मरे तो 374 घायल हुए। जंगली सुअर के हमले में 2 लोग मरे तो 05 घायल हुए। बाघ के हमले में 15 लोगों ने अपनी जान गंवाई तो 19 लोग घायल हुए। यानि मरने व घायल होने का यह सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

ऐसे में सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि जंगल में रहने वाले जानवर अचानक आदमखोर कैसे बन बैठे हैं विशेषकर बाघ व गुलदार। गुलदार व बाघ के हमलों में महिलाओं व बच्चों की संख्या अधिक है। आज उत्तराखंड में शायद ही ऐसा कोई जिला हो जहां पर आदमखोर गुलदार का आतंक न हो। सभी जनपदों के ग्रामीण इलाके गुलदारों के आतंक से भयभीत हैं।

गुलदारों का आदमखोर बनकर मानव बस्तियों में पहुंच जाना और आदमी व मवेशियों को अपना शिकार बनाना तो एक बड़ा सवाल है ही, वहीं राज्य में लगातार वन्य जीव जंतुओं के मौत के घाट उतरना उससे भी बड़ा सवाल। जंगलों में असुरक्षा के चलते ही गुलदार व अन्य वन्य जीव जंतुओं ने मानव बस्तियों की ओर हिंसक होकर रूख किया है। पिछले एक दशक में 90 के आस-पास गुलदारों को वन विभाग आदमखोर घोशित कर चुका है। इनमें से कई गुलदार पकड़े गए हैं तो कई को वन विभाग मौत के घाट उतार चुका है।

उत्तरांचल के ग्रामीण इलाकों में हालत यह हैं कि न तो आम आदमी का जीवन सुरक्षित है ओर न ही उसकी खेती। एक ओर गुलदार ग्रामीणों का जीवन लीलने में लगा है तो दूसरी ओर उनकी खेती को बन्दर, लंगूर शेही और जंगली सुअर बर्बाद करने में लगे हैं।

इन दोनों स्थितियों से निपटने में ग्रामीण खुद को असहाय पा रहे हैं। गुलदारों को वह मार नहीं सकते क्योंकि वन कानूनों के तहत गुलदार को मारने पर सात साल की कैद की सजा का प्रावधन है। ग्रामीणों की एकमात्र उम्मीद वन विभाग से लगी रहती है। सरकार और वन विभाग को भी मालूम है कि गुलदार, तेंदुआ और बाघ जिसे स्थानीय जनता इन्हीं तीन नामों से जानती है आसानी से मानव और उनके पशुओं को अपना शिकार बना रहा है। ग्रामीणों में दशहत है और उनकी दिनचर्या प्रभावित हो रही है। लोगों की दिक्कत यह है कि वे अपने छोटे बच्चों की रखवाली करें या अपने काम पर जायें। हालत यह है कि कई स्थानों पर लोग आदमखोर गुलदार के डर से शाम ढलते ही घरों के अंदर दुबकने को मजबूर हैं। राज्य में बहुतायत संख्या में लोग वन्य जीवों के हमलों में हताहत होते हैं। दूसरी ओर आदमखोर द्वारा शिकार बनाये गये लोगों के परिजनों को शासन की ओर दी जाने वाली अनुग्रह राशि पर भी लोगों द्वारा समय-समय पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। हालांकि अब शासन ने अनुग्रह राशि की नई दरें तय कर दी है। लेकिन ऐसे मामलों के निस्तारण में वन विभाग व सरकार संवेदनशीलता पर लोग अब भी सवाल खड़े करते दिखाई देते हैं।  गुलदारों का लगातार मानव बस्तियों की ओर आने का कारण घटते वन क्षेत्रों को माना जा रहा है लेकिन उत्तराखंड में यह तर्क कुछ मायने नहीं रखता है।

आज भी राज्य में 65 प्रतिशत भू-भाग पर वन हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि तस्करों द्वारा गुलदार के अवैध शिकार के साथ ही जंगलों में लगने वाली आग, विकास के नाम पर हो रहे विस्फोट, जंगल में घटते आहार व पानी के स्रोतों के लुप्त होने के चलते जंगली जानवरों ने मानव बस्तियों की ओर रूख किया है। एक ओर जहां आम आदमी के सामने यह सवाल मुंह बाये खड़ा है कि आदमखोर जानवरों से कैसे बचा जाय तो वहीं वन्य विभाग के सामने यह चैलेंज है कि वह इन जंगली जीवों को आए दिन होने वाली प्राकृतिक आपदाओं, दुर्घटनाओं व अवैध शिकार से कैसे बचाया जाए।

राज्य के प्रमुख वन्य संरक्षक श्रीकांत चंदौला के अनुसार उत्तराखंड के 14 हजार गांव वन सीमाओं के निकट बसे हैं। लंबे समय से मानव व वन्य जीव बगैर संघर्ष के साथ रहते आए हैं। लेकिन बीते एक दशक से दोनों के बीच संघर्षपूर्ण स्थिति बन गयी है। वर्ष 2000 से अब तक 815 वन्य जीवों की मृत्यु हुई है। जिसमें 54 बाघ; 566 चीता और 195 हाथी शामिल हैं। सर्वाधिक 55 चीता व 15 हाथी अवैध शिकार की वजह से मारे गए हैं।

चंदोला बताते हैं कि मानव और वन्य जीवों के मध्य संघर्ष की समस्या को देखते हुए कई स्तरों पर काम किया गया है। इनमें पर्वतीय क्षेत्रों में गुलदार व मैदानी क्षेत्रों में ट्रांजिट रसेन्यू सेन्टर की स्थापना, अवैध्ा शिकार व वन्य जीव अपराधियों को पकड़ने के लिए डाग स्क्वायड की व्यवस्था के साथ ही रैपिड एक्शन फोर्स व हाईव पैट्रोल की स्थापना भी की गई है। वह बताते हैं, संरक्षित क्षेत्रों में इको विकास समितियां भी गठित की गई हैं। हालांकि अवैध शिकार व वन्य जीव अंगों की तस्करी पर रोक के बाद भी वन्य जीव मौत के घाट उतारे जा रहे हैं। 200 बाघ, 2365 गुलदार व 1346 हाथी अब भी वन तस्करों के निशाने में हैं।

वन्य जीवों का यही गुस्सा अब मानव आबादी पर टूटने लगा है। आज सवाल केवल वन्य जीवों के हिंसक हमले से आबादी को बचाने का ही नहीं बल्कि इन वन्य जीवों की सुरक्षा का भी है। (चरखा फीचर्स)

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