लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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– डॉ. दीपक आचार्य

समाज-जीवन में अजीब सी स्थिरता और जड़ता आ गई है, न कोई हलचल हो रही है न कोई उत्साह। ‘जैसा चल रहा है वैसा चलने दो’ का नारा हर कहीं प्रतिध्वनित हो रहा है।

धक्कागाड़ी की तरह चल रहा है सब कुछ। इसमें पुरानी गाड़ी है, घिसे-पिटे-टूटे पुर्जे हैं, नए हैं तो सिर्फ धक्का लगाने वाले। कोई लालच में आकर धक्का लगा रहा है, कोई किसी का लिहाज करके, कोई अपने अपराधों पर परदा डालने, तो कोई किसी और लक्ष्य को सामने रखकर।

एक समूह थक जाता है, फिर दूसरा आ जाता है। इसी तरह धक्कों के सहारे गाड़ी जैसे-तैसे रेंग रही है। लगातार धक्का लगाते-लगाते बेदम हो चले लोगों में जोश भरने कभी जलेबियाँ और कभी रसगुल्ले दिखाए जाते रहे हैं। लोग भी कुछ न कुछ पाने के फेर में धक्कार्थियों की भीड़ में शामिल होते चले जाते हैं। धक्का, धक्के पे धक्का, यही सब चल रहा है हमारे चारों तरफ।

ठहरे हुए पानी में सडांध बनी रहने लगी है। आम से लेकर ख़ास तक सभी ने बना रखी हैं अपनी-अपनी सीमाएँ, और उसी में चक्कर काटते-काटते तरक्की का तानपूरा बजा रहे हैं। वैश्वीकरण के दौर में भी लोग उलझे हैं अपनी-अपनी परिधियों में, जाने कैसे-कैसे रंगों के इन्द्रधनुष रच कर।

कहीं अपनी गलियों में शेर हुए लोग हैं तो कहीं शहरों की दौड़ते-भागते सियार और कहीं चींटियों और मकौड़ों की तरह इधर-उधर लम्बी कतारें। अपने दड़बों में बैठे हुए लोगों के लिए सब कुछ उनके इर्द-गिर्द परिभ्रमण करता है। दड़बों के बॉस को अपनी इतनी आवभगत से ज्यादा क्या चाहिए।

कई ग्रह-उपग्रह हैं और कई आकाशगंगाएं, जो एक-दूसरे की परिक्रमाएं करती हैं। इनके साथ ही कई बड़े-बड़े ग्राह हैं, कोई राजग्राह है, कोई ख़ास ग्राह। ये भी किसी न किसी के चक्कर लगा रहे हैं। एक ग्राह दूसरे से आगे बढ़ने वह सब कुछ कर रहा है जो जंगलों में होता रहा है अर्से से। इन सबके लिए यही उनकी दुनिया है, यही उनका कुटुम्ब है जिस पर अधिकार जताया जाता रहा है।

इस सीमा रेखा से कोई बाहर नहीं निकलना चाहता। सारे अपने-अपने बाड़ों में रहने के आदी हैं। इन बाड़ों में तरकश और तीर हैं, रस्सियाँ हैं और घुटन है। बाड़े भी ऐसे कि एक से दूसरे में कोई जाने को तैयार नहीं, गलती से चला भी जाए तो हो जाता है बहुत बड़ा बवण्डर। अपने -अपने बाड़े में सभी खुश हैं।

जमाने को रंगीन बनाने, रोशनी के कतरों का संसार रचने और परिवेश को सुनहरा स्वरूप देने की कहीं कोई कोशिश नहीं हो पा रही है, बरसों से सिर्फ बातें होती हैं और शब्द आसमान में खो जाते हैं। कोशिश हो भी तो कैसे, बाड़ों की सीमा रेखा लाँघकर जमाने को देखना और समझना कौन चाहता है? हर बाड़े वाला अपने आपको सिकंदर मान कर चल रहा है। अलग-अलग रंगों और आकारों के बाड़ों में बैठे या जबरिया बिठाए गए लोगों से कैसे उम्मीद की जा सकती है जमाने के नए-नए रंग पाने की।

ये बाड़े और इनके आस-पास जमा भीड़ के जयगान से खुश हो जाने वाले लोगों के लिए बाड़ों से बाहर निकल कर जमाने को देखना कितना मुश्किल है। जितना आदर-सम्मान और रुतबा बाड़ों में है उतना बाहर कहाँ? फिर ऐसी कुव्वत भी कहाँ है जो बाहर कुछ हुनर दिखा कर आदर पा सकें। डरने वाले तो अपनी गली में ही होते हैं।

जिन लोगों में हुनर है वे भी दुम दबाए बैठे हैं किसी परिवर्तन के इंतजार में। अपने यहाँ हुनर वाले लोगों को पूछता कौन है? यहाँ तो जी-हुजूरी और चापलूसी करने वालों की तूती बोलती है। फिर बाड़ों में ऐसे लोग राज दरबारियों की जमात में बैठने लग जाते हैं।

अब भी वक्त है अपने आपको बदलने का, जमाने को अपने करीब लाने का। पर इसके लिए जरूरी है अपने बाड़ों से बाहर निकलना। अब जमाना कहाँ से कहाँ आ पहुँचा है और हम वहीं ठहरे हुए हैं।

एक बार तबीयत से कोशिश करें और अपने-अपने बाड़ों से बाहर निकलें, फिर देखें तरक्की की नई डगर कैसे पहुँचती है उन तक। बाड़ों का मोह पाले बैठे लोगों को रहने दें उनके बाड़ों में। खुद बाहर निकलें और जीवन में ताजगी लाएं नए जमाने की हवाओं से। जहाँ वह सब कुछ नहीं है जो बाड़ों में दुर्गंध फैलाता है।

 

 

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1 Comment on "अपने बाड़ों से बाहर निकलें, जमाने को देखें, अपने आप खुलने लगेगा अक्ल का ताला"

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sureshchandra karmarkar
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sureshchandra karmarkar

जातिप्रथा के bade टूटे तो आरक्षण,राजनीतिक दलों,अलग अलग बाबाओं के मठों, केछोटे छोटे बाड़े बन गए. और ये बाड़े हर गाँव,कसबे,तहसील जिले मैं स्थापित हो गए /इन बाड़ों से लोगों को निकालना बहुत कठिन काम है.

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