लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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छत्तीसगढ़ बंधक प्रकरण और राष्ट्रीय मीडिया

– पंकज झा.

रायपुर से कोलकाता के लिए एक सेमीनार में शामिल होने कुछ पत्रकार मित्रों के साथ जा रहा हूं. मौसम अच्छा है और ट्रेन भी रफ़्तार में. जंगली इलाकों से ट्रेन गुजर रही है. तब-तक मोबाइल का टावर यह बताने लगता है कि हम झारग्राम स्टेशन के पास आ गए हैं. नाम सुनकर ही सिहरन पैदा हो जाती है. याद आता है अभी कुछ दिन पहले ही मोओवादियों द्वारा ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पर हमला कर दर्ज़नों जाने ले ली गयी थी. थोड़े ही आगे बढ़ने पर उस अभागी ट्रेन का मलवा भी दिख जाता है. मन में ढेर सारा आक्रोश और ह्रदय से इन माओवादियों के सफाये की कामना के साथ ट्रेन के दरवाज़े पर एक “विशेषज्ञ” से बात शुरू होती है. बातचीत के क्रम में पूछ बैठता हूं कि यह इलाका किस जिले में आता है? थोडा सर खुजाते हुए वह कहते हैं कि जिले का तो मालूम नहीं लेकिन राज्य यह ‘छत्तीसगढ़’ है. अब सर पीट लेने की बारी अपनी. खिसियानी हंसी हंस उनसे विदा लेता हूं. तो पिछले कुछ सालों में ‘छत्तीसगढ़’ और ‘नक्सलवाद’ एक दुसरे का पर्याय बन सामने आया है. आप जब रायपुर से कोलकाता के लिए निकलते हैं तो ओडिशा, झारखण्ड होते हुए पश्चिम बंगाल की सीमा में प्रवेश करते हैं. लेकिन जनसामान्य की समझ से देखें तो अगर बात नक्सलवाद की हो तो ज़ाहिर है झाड़ग्राम भी छत्तीसगढ़ का ही हिस्सा माना जाएगा.

अब एक दूसरी तस्वीर देखिये. बस्तर इलाके के भोपालपट्टनम बाजार से सात पुलिस जवानों का अपहरण हो जाता है. वहां के भद्राकाली नामक थाने में पदस्थ ये जवान 19 सितम्बर को अपहृत कर लिए गए थे. इनमें से तीन की ह्त्या तो उसी दिन कर दी गयी और शेष चार को बंधक बनाकर नक्सली, सरकार से सौदेबाजी कर रहे हैं. ऐसी ही घटना कुछ ही दिन पहले बिहार में हुई थी जहां के लखीसराय से चार जवानों को अपहृत किया गया था. उनमे से भी एक की हत्या कर दी गयी थी बांकी तीन कुछ दिन तक माओवादियों के कब्ज़े में रहने के बाद रिहा हो पाए थे. लेकिन जहां बिहार वाले मामले में सभी राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया ने आसमान सर पर उठाकर उसे सभी समस्यायों से ज्यादा विकराल घोषित कर दिया था वहीं छत्तीसगढ़ के मामले में किसी के कान पर भी जूं नहीं रेंगी है अभी तक.

बात अगर ‘भारत’ और ‘इंडिया’ के फर्क का हो तो समझ में आती है. सभी जानते हैं कि दिल्ली में किसी एक लड़की का प्रेमी के वियोग में भी आत्महत्या कर लेना सबसे बड़ी खबर है. तो अगर बाजारू मीडिया के लिए दिल्ली की घटना ही खबर हो तो रहे, अपनी बला से. जनसरोकारों से दूर ऐसा माध्यम आज ना कल अपनी मौत मरेगा ही. उसके बारे में ज्यादा चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं. लेकिन यहां तो मामला ‘भारत’ के बीच का ही है. गरीबी, पिछडापन, असमानता, बेरोजगारी, माओवाद आदि सबमें सामान जैसा होते हुए भी आखिर क्या कारण है कि बिहार का मामला तो तूल पकड़ लेता है लेकिन छत्तीसगढ़ की परेशानियों से किसी को कोई मतलब नहीं होता ?

लेकिन इसके उलट देखिये तब पता चले. अगर किसी नक्सली का कोई एनकाउंटर हो या मानवाधिकार के नाम पर दूकान चलाने वाले भाई लोग किसी मामले को उठाना चाहे तो फिर वह राष्ट्रीय मामला बन जाता है. फिर तो आलोच्य मीडिया भी आसमान सर पर उठा ले. आप किसी नक्सली को गिरफ्तार करके देख लीजिए. फिर देखिये प्रदेश के गरीब आदिवासियों के खिलाफ कैसा हंगामा करते हैं दिल्ली में बैठे ‘गोरे’ लोग. मामला चाहे किसी नक्सली डॉ. की गिरफ्तारी का हो या फिर गांधी के नाम पर आश्रम चलाने वाले व्यक्ति द्वारा किसी नक्सली के संरक्षण का, हर मामले में आपको फिर मीडिया और ऐसे तत्वों की सक्रियता देखते ही बनती है. तब प्रदेश के बारे में सामान्य समझ भी नहीं रखने वाले लोग भी ऐसे दिखायेंगे जैसे सबसे बड़े विशेषज्ञ वही हों. लेकिन आप उनसे थोड़ा तथ्य पर आधारित बात करके देखिये तो झारग्राम को छत्तीसगढ़ का हिस्सा बताने वाले व्यक्ति से भी इनकी जानकारी कई बार आपको कम दिखेगी. अभी हाल ही में ऐसे समूहों द्वारा मिलकर एक पत्रिका के बैनर तले राज्य द्वारा की जा रही कथित हिंसा पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. आपको जानकार ताज्जुब होगा कि उस गोष्ठी के आधार पर सम्पादकीय लिखने वाले को ये तक नहीं पता था कि छत्तीसगढ़ का पुलिस महानिदेशक कौन है. फिर भी विश्वरंजन को पुलिस अधीक्षक मानते हुए पिले पड़े थे सब लोग राज्य की आलोचना करने बे सर पैर की बातों को लेकर.

तो सवाल यह नहीं है कि राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया का या दिल्ली में बैठे स्व-घोषित बुद्धिजीवियों की उपेक्षा का प्रदेश को कोई नुक्सान होता है. सब जानते हैं कि टीआरपी का कोई केन्द्र छत्तीसगढ़ में नहीं होने के कारण किसी का फोकस यहां नहीं है. कई मायने में लोग निश्चिंत भी रहते हैं उनके प्रकोप से. लेकिन दिक्कत तब आती है, आक्रोश तब देखने को मिलता है जब यही लोग प्रदेश के सभी पत्रकारों को बिकाऊ या पैसे लेकर खबर दबाने वाला कह कर यहां का अपमान करते हैं. जबकि दर्ज़नों उदाहरण ऐसा दिया जा सकता है जब यहां के मीडिया ने कई बार दिल्ली वालों को आइना दिखाया है.

अभी ज्यादे दिन नहीं हुए जब नक्सलियों के पक्ष में लिख कर प्रदेश को बदनाम करने वाले एक स्तंभकार ने यहाँ के पत्रकारों पर बिके होने का आरोप लगाया था. आज वह व्यक्ति स्वतः निर्वासित होने को मजबूर हैं. प्रदेश में कोई उन्हें घास नहीं डालता. इसी तरह कभी अरुंधती राय तो कभी मेधा पाटकर जैसे लोगों की मंशा से आहत होकर प्रदेश के प्रेस क्लब ने उनका बहिष्कार किया हुआ है. इतना ही क्या कम था कि उस गोष्ठी में खुले आम स्वामी अग्निवेश ने यह आरोप लगाया कि प्रदेश के पत्रकार मुख्यमंत्री के सिखाए हुए और उद्योगपतियों के दलाल जैसे लगे. तमाम शिष्टाचार को तिलांजलि दे उन्होंने प्रदेश के एक वरिष्ठतम पत्रकार रमेश नय्यर को भी बदनाम करने की साज़िश की. बाद में श्री नय्यर द्वारा लेख लिख कर अग्निवेश की पोल खोली गयी.

तो सवाल यह बिल्कुल नहीं है कि प्रदेश कोई इनके द्वारा कवरेज का मुहताज है. वास्तव में इनके बिना ही लोग बेहतर से अपना काम-काज कर रहे हैं. पिछले कुछ दिनों का अनुभव यह कहता है प्रदेश की बात उठाने में यहां का मीडिया सक्षम और परिपक्व है. बस सवाल केवल इतनी है कि प्रदेश को बदनाम कर अपना उल्लू सीधा करने वाले लोगों की पहचान कर उनका सतत बहिष्कार किये जाने की ज़रूरत है. बात जहां तक हालिया अपहरण प्रकरण की है तो विपक्ष का यह कहना सही नहीं है कि एक उपचुनाव के कारण सरकार इस पर ध्यान नहीं दे पा रही है. वास्तव में ‘लाल मीडिया’ के दबाव से मुक्त होकर सरकार अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही है. अगर केवल उपचुनाव के लिए ध्यान नहीं देने की बात होती तब तो बिहार में पूरे विधानसभा के लिए ही आम चुनाव की प्रक्रिया चल रही है. फिर भी वहां मीडिया के हाईप के कारण वह अपहरण राष्ट्रीय मुद्दा बन पाया था. तो छत्तीसगढ़ में असली बात मीडिया की प्राथमिकता और उसके द्वारा मुद्दे विशेष को महत्त्व देने या नहीं देने की है. उन्हें ना देना हो महत्त्व ना दें यह मायने रखता भी नहीं है. बस किसी भी तत्व द्वारा प्रदेश के दुःख-दर्द को अपना उत्पाद बनाए जाने का डट कर विरोध किया जाय. निश्चय ही प्रदेश अपनी हर समस्या से पार पा जाने के कूवत रखता है.

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1 Comment on "दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें, किस ज़माने के आदमी तुम हो……!"

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दिवस दिनेश गौड़
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Er. Diwas Dinesh Gaur

बहुत ही बड़े सत्य को आपने आम जन के सामने लाने प्रयास किया है. हमारा मीडिया तो भांड ही है. उसे छत्तीसगढ़ की ख़बरों से कहाँ टीआरपी मिलने वाली है? और जब तक टीआरपी न मिले तो ये खबर क्यों बनाने लगे.

बहुत ही उम्दा लेख है. सत्य से अवगत करवाने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद पंकज भाई…

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