लेखक परिचय

अनिल द्विवेदी

अनिल द्विवेदी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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रौंगटे खड़े हो रहे हैं, कान सिहर रहे हैं कि एक पति अपनी पत्नी की मृत काया को लेकर 12 किलोमीटर तक कैसे चला होगा? लेकिन यही तो भारतीय दम्पत्तियों के रिश्ते की असल पहचान है जिसकी परीक्षा वह आज से नहीं, हजारों सालों से देते आया है। छह हजार साल पहले पतिव्रता सावित्री ने अपने मृत पति सत्यवान को पाने के लिए कठिन तपस्या की थी और यमराज को खुशकर जीवनसाथी को वापस पा लिया था। अब यही इतिहास उड़ीसा के दीना मांझी ने रचा है। अग्रि के समक्ष सात फेरे लेकर अपनी पत्नी को सम्मान देने का जो वचन मांझी ने निभाया, वह उस भारतीय समाज के लिए अनुकरणीय और आईना दिखाने वाला है जहां शादी के मण्डप पर जोडिय़ां बनती हैं और बारात विदा होने तक टूटे जाती हैं।
सोचिए, इतिहास मांझी ही क्यों रच रहे हैं? मैं मूषकभक्षी पूर्व मुख्यमंत्री मांझी की बात नहीं कर रहा बल्कि दीना मांझी के तरह ही मुझे माउण्टेनमेन स्वर्गीय दशरथ मांझी याद आ रहे हैं। जिसके भगीरथी प्रयास पर बॉलीवुड ने एक फिल्म भी बनाई थी। याद दिला दूं कि बिहार में गया के करीब गहलौर गांव के निवासी दशरथ भी दीना की तरह पत्नीव्रता थे। उनके गांव में जो विशालकाय पहाड़ था, वह डॉॅक्टर और अस्पताल के बीच एक रोड़ा की तरह था। एक दिन दशरथ की पत्नी ईलाज ना मिल पाने के चलते चल बसी। पत्नी-वियोग के चलते दशरथ ने तय किया कि वह इस पहाड़ को अकेेले ही तोड़ेगा और रास्ता बनाएगा। फिल्मी डॉयलाग है जिसमें वह पहाड़ के सामने खड़ा होकर कहता है : देखता हूं तेरा घमण्ड ज्यादा बड़ा है या मेरा पौरूष।
और फिर इतिहास गवाह है कि 22 साल के कड़े परिश्रम के बाद मांझी ने पहाड़ के घमण्ड को चूर-चूर कर दिया था। उसने जो सडक़ निकाली, उसके बाद अतरी और वजीरगंज ब्लाक की दूरी 55 किमी से घटकर 15 किलोमीटर हो गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने मांझी को देश के सबसे बड़े पुरस्कार श्रमवीर से सम्मानित किया था। यहां पर मौंजूं बड़ा सवाल यह है कि इन दोनों मांझियों के अंदर हम अपने को कहां और कितना पाते हैं? जो पत्नी पति के पहुंचते तक खाना नहीं खाती, हम उसकी कितनी चिंता करते हैं? उसके प्रति कितने वफादार हैं? उसके दर्द और सम्मान को कितनी तवज्जो देते हैं? यह बात इसी सवाल के साथ खत्म।
अब आते हैं असल मुद्दे पर। उड़ीसा में घटित दो त्रासद घटनाओं के सामने आने के बाद पूरा देश गुस्से से उबल पड़ा है। नेताओं को सोशल मीडिया पर मां-बहन की गालियां दी जा रही हैं। भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था को कोसा जा रहा है। न्यायालय भी आलोचना के केन्द्र में है और सिस्टम का अंग रहे मीडिया भी बहसमुबाहिसा के घेरे में है। पहला सवाल यह कि क्या यह बाजार, पूंजी और अंधाधुंध विकास का परिणाम है कि हम मानवीयता भूलते जा रहे हैं! यकीन नही होता कि जब दीना मांझी अपनी पत्नी की लाश कंधे पर लेकर सडक़ से गुजर रहा होगा तो उसे देखकर किसी का दिल क्यों नहंी पसीजा? उसकी मदद को हाथ क्यों नहीं बढ़े? ना जाने कितने ही वाहन करीब से गुजरे होंगे लेकिन किसी ने मदद क्यों नही की? क्या हमने सब कुछ सरकार पर ही छोड़ दिया है। एक वाहन भर की तो जरूरत थी, क्या समाज इतनी भी मदद नहीं कर सकता?
सोशल मीडिया पर बहसमुबाहिसा का दौर जारी है। सिस्टम कटघरे में हैं और मीडिया उससे अछूता नही है। उसकी कॉलर पकड़ते हुए एक मोहतरमा ने पोस्ट किया कि ऐसे फोटो और वीडियो प्रकाशित-प्रसारित करने की जरूरत क्या थी? इस बांझ समझ से ऊपर उठिये मैडम। चलो यह मान लिया कि किसी ने टीआरपी बटोरने के लिये यह सब किया तो क्या गलत किया? ऐसे दृश्यों को देखकर अनुदार होते समाज की नींद खुल रही है या भ्रष्ट और सड़ चुकी व्यवस्था के खिलाफ देश उबल रहा है तो मीडिया से यही उम्मीद है ना। वह न्याय नही कर सकता लेकिन न्याय पाने के लिए जो चिंगारी उठनी चाहिए, उसे जलाने की डयूटी तो उसी की है।
फिर वातानुकूलित कमरों में बैठकर इन्ही फोटो और वीडियो को अपलोड कर जो लोग बड़प्पन का फतवा जारी कर रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि सामाजिक संवदेना और मदद  के धरातल पर आप रावण और कंस से कमतर नहीं हैं। गुजरे दिन ही सरगुजा में एक आइएएस ने दुर्भागयजनक मौत पर मुस्कुराते हुए तंज कसा था कि मौत का कारण तो मरने वाले से ही पूछना पड़ेगा। हमें तुरंत चेतना होगा। हमारे सिस्टम और सोच को नई ओव्हरहॉलिंग की जरूरत है।
तिजारत के इस दौर में अगर दिवालिया होते व्यापारियों के आत्मघात की संख्या बढ़ रही है, अगर कर्ज से अघियाए किसानों की मौत के आंकड़े, रक्त पिपासु खटमलों की तरह मोटे होते जा रहे हैं, अगर बरोजगार आत्महत्या कर रहे हैं तो हम संवेदनहीन होकर तमाशा देखते हुए कैसे चुपचाप कैसे रह सकते हैं? बुगलामुखी चरित्र से उबरिए। आपको यदि सिर्फ मुस्कुराती-गुनगुनाती खबरें चाहिए तो इंटरटेनमेंट चैनल पर्याप्त हैं लेकिन न्यूज चैनल या अखबार में वही नजर आएगा, जो आप हैं या आपके समाज में घट रहा है। आईने के सामने खड़े होंगे तो चेहरे के बदनुमा दाग तो दिखेंगे ही। भूलिएगा नहीं, जिस दिन मीडिया अपनी ड्यूटी से पीछे हट गया, उस दिन आपकी भी मौत तय है। +

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