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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-अनुराग सिंह-

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फेसबुक का आविष्कार अपने दशक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धिओं में से एक है। इसने तमाम क्रांतिआं करवाई एवं कई राष्ट्र की सत्ता को बदलने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।फेसबुक आज एक बड़ा मंच बनकर उभरा है और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह जीवन से जुड़े हर पहलू का मंच है।ऐसे में साहित्य इससे अछूता कैसे रहता?साहित्य के पठान पाठन के लिये यह एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा
है। किसी भी साहित्य के लिखे जाने के बाद सबसे महत्वपूर्ण
प्रश्न यह हो जाता है कि वह कितने लोगों तक पंहुचा ?आज के समयमे फेसबुक पर अनेक साहित्यिक रचनाएँ लिखी जा रही हैं एवं उसकी पहुच का दायरा पहले की अपेक्षा विस्तृत हुआ है।ऐसे में अपने फेसबुक अकाउंट के माध्यम से हर व्यक्ति साहित्यकार हो सकता है।इससे पूर्व अपनी रचनाओ को छपवाने के लिए बहुत सी दिक्क़तों का सामना करना पड़ता था परन्तु फेसबुक ने निश्चित रूप से इस समस्या को खत्म कर दिया है। जब साहित्य की बात की जाती है तो हमे उसके विधाओं के बारे मे भी सोचना पड़ता है।सामन्य रूप में उपन्यास ,कहानी,कविता,निबन्ध,नाटक आदि विधाएँ
बहुत अधिक प्रचलित हैं लेकिन गौर करने वाली बात यह है की फेसबुक पर लिखी
जाने वाली साहित्य की विधाएँ कौन कौन सी हैं?याहक अहम् प्रश्न है।फेसबुक
पर कविताओं का प्रचलन सर्वाधिक है।विभिन्न प्रकार की कवितायेँ लिखकर
फेसबुक और हर व्यक्ति अपने आप को कवि मानने लगताहै चाहेयह एहसास क्षणिक
ही क्यों न होता हो।कहानी,आलोचना,यात्रावृत्तांत या निबंधात्मक रचनाएँ भी
सामन्य मात्रा में पायी जाती हैं।लेकिन बड़ी विधाएँ इस पर सम्भव नही
हैं।अगर यह कहा जाये की इस फसबुकिआ साहित्य की अपनी कुल 5-6विधाएँ ही हैं
जिस पर रचना देखने को मिलती हैं।
इन सबसे इतर सबसे जरुरी सवाल यह है कि इस पर जो साहित्य आ
रहाहै उसकी कोटि क्या है?क्या फेसबुक पर लिखा जाने वाला साहित्य गहरी
मानवीय संवेदनाओ की सूक्ष्मता से पड़ताल कर पाता है तो अधिकतर मामलो में
हमे उत्तर नकारत्मक ही प्राप्त होगा।साहित्य अगर समाज का दर्पण है तो
फेसबुक पर लिखा जाने वाला साहित्य धुंधला दर्पण के रूप में हैं।यह समाज
में चल रही चीज़ों का वर्णन तो करता है लेकिन इसमें गाम्भीर्य का आभाव
देखा  जाता है।कोई बड़ी घटना जैसे दामिनी दुष्कर्म मामला हो जाने पर पूरा
फेसबुक गुस्सेमे उबलता नज़र आता है लेकिन वह सब जो उस समय आवेश में आकर
लिख दिया गया वह बहुत सतही स्तर का ही होता है।इसमें किसी अन्य की रचना
कोअपने फेसबुक अकाउंट पर अपलोड कर वाह वाही लेना बहुत सामान्य बात है
क्योंकि इसमें एक बार रचना अपलोड कर देने पर तुरंत अन्य लोगो तकपहुच जाती
है।इस प्रकार मौलिकता का मुद्दा भी कम महत्वपूर्ण नही है।
सुचना एवं संचार में आई क्रांति की वजह से जब नया नया सामाजिक
तंत्र खड़ाहो रहा था तो कुछ लोग बहुत तेजीसे यह कहने लगे की अब टी वी व
समाचार पत्रों की पत्रकारिता का अंतिम समय है ।अब सोशल मीडिया युगकी
शुरुवात है अर्थात इसे मीडिया के विकल्प के रूपमे देखा जाने लगा लेकिन
वास्तव में ऐसा कुछ हुआ नही।ठीक इसी प्रकार अगर हम फसबुकिआ साहित्य को उस
साहित्यके विकल्प के रूप में देखने लगे तो यह हमारी भूल होगी।यह अभी अपने
शुरुवाती चरण में है,इसकी कुछ सीमायें हैं यह उनसे पार नही जा सकता।

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