लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में गत् 29 अगस्त का दिन एक यादगार दिवस के रूप में दर्ज हो गया। 26 नवंबर 2008 को पाकिस्तान की शह,सहायता व प्रशिक्षण प्राप्त दस आतंकवादी अपने दु:स्साहस का परिचय देते हुए कराची से किश्ती में सवार हो कर समुद्री रास्ते से मुंबई महानगर के तट पर पहुंच गए थे। इसके बाद इन आतंकियों ने देश के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा व भयावह आतंकी हमला अंजाम दे डाला। इस हमले में 186 बेगुनाह लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे थे। इनमें जहां कई महिलाएं व बच्चे शामिल थे वहीं कई आला पुलिस अधिकारी भी इन आतंकियों से मुकाबला करते शहीद हो गए। एक बड़ी कमांडो कार्रवाई करते हुए देश के सुरक्षा जवानों ने इन सभी आतंकियों को तो मुठभेड़ के दौरान मार गिराया जबकि अजमल आमिर क़साब नाम का एक आतंकवादी अपनी जान बचाकर भागने के दौरान पुलिस व भीड़ के द्वारा ज़िंदा गिरफ्तार कर लिया गया।

इस आतंकी हमले के लिए क़साब को महाराष्ट्र के उच्च न्यायालय द्वारा 21 फरवरी 2011 को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। परंतु क़साब ने महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की। 31 जनवरी 2012 को उच्चतम न्यायलय ने इस मामले की सुनवाई शुरु की। और गत् 29 अगस्त को उच्चतम न्यायालय के जस्टिस आफताब आलम व जस्टिस सी के प्रसाद की दो सदस्यीय पीठ ने क़साब की अपील को $खारिज करते हुए मुंबई उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। जस्टिस द्वय की पीठ ने अपने फैसले में लिखा-‘कि क़साब के बारे में निर्णय करने में कोई दुर्भावना नहीं है। इस व्यक्ति ने भारत के विरुद्ध लड़ाई छेड़ी है, भारत की संप्रुभता को चुनौती दी है और युद्ध का एलान किया है। इसलिए ऐसे श$ख्स की मृत्यु दंड की सज़ा बरकरार रखने में कोई समस्या नहीं है’। इस आदेश के साथ ही माननीय न्यायधीशों ने पाक आतंकी क़साब की सुनवाई अर्जी खारिज कर दी। निश्चित रूप से इस फैसले से देश के आम लोगों को विशेष रूप से 26/11 के हमले से सीधे तौर पर प्रभावित हुए परिवारों के लोगों को बहुत राहत मिली है। पूरा देश, सभी धर्म व संप्रदाय के लोग तथा सभी राजनैतिक दल सुप्रीम कोर्ट के इस $फैसले का स्वागत करते नज़र आए। नि:संदेह बेगुनाह लोगों की जान के साथ खिलवाड़ करने वालों, देश में दहशत का माहौल बनाने वालों तथा देश के शांतिपूर्ण वातावरण को तनावपूर्ण बनाने की कोशिश करने वालों के साथ ऐसी ही कार्रवाई की जानी चाहिए।

इधर माननीय उच्चतम न्यायलय में क़साब को दी गई फांसी की सज़ा बहाल करने का आदेश जारी किया जा रहा था तो ठीक उसी समय अहमदाबाद में एक विशेष अदालत द्वारा 28 फरवरी 2002 को नरोदा पाटिया नामक इला$के में हुए अल्पसंख्यक समुदाय के सामूहिक नरसंहार के दोषियों के विरु़द्ध भी $फैसला सुनाया जा रहा था। नरोदा पाटिया कांड गुजरात में 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान घटी कई प्रमुख भयानक घटनाओं में से एक था। इस हादसे में अल्पसंख्यक समुदाय के 95 सदस्यों को जि़दा जलाकर अथवा उनकी सार्वजनिक रूप से हत्या कर मार दिया गया था। इन बेगुनाह मृतकों में भी कई औरतें,बच्चे व बुज़ुर्ग शामिल थे। यदि 26/11 की मुंबई की घटना सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद का एक जीता-जागता सुबूत थी तो निश्चित रूप से 28 फरवरी 2002 की नरोदा पाटिया व इसी प्रकार की अन्य घटनाएं या फिर गोधरा ट्रेन हादसा यह सब भी अंतर्देशीय आतंकवाद का ही उदाहरण कही जाएंगी। गुजरात में घटी दंगे की अन्य कई घटनाओं की तरह नरोदा पाटिया में भी नरेंद्र मोदी सरकार की तत्कालीन विधायिका माया कोडनानी पर आरोप लगा था कि उन्होंने दंगाई भीड़ को उकसाया, स्वयं अल्पसंख्यक समुदाय की हत्या में शामिल रही, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के घरों व दुकानों में आग लगाने के लिए उसने अपने दंगाई साथियों को पेट्रोल वितरित किया तथा हथियार भी बांटे। कोडनानी के अतिरिक्त भी भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कई नेता इस सामूहिक हत्याकांड में शामिल पाए गए और उन्हें भी विशेष अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया।

उपरोक्त दोनों ही अदालती निर्णय इस नतीजे पर पहुंचने के लिए पर्याप्त हैं कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भारत की अदालतें धर्म या जात-पात के आधार पर अपने फैसले नहीं सुनातीं बल्कि मामले की गंभीरता,उसकी वास्तविकता,सच्चाई तथा संवेदनशीलता को मद्देनज़र रखते हुए इन अदालतों द्वारा अपना $फैसला सुनाया जाता है। इतना ही नहीं बल्कि क़साब जैसे विदेशी आतंकवादी को कानूनी सहायता मुहैया कराकर भी देश की न्याय व्यवस्था ने यह साबित कर दिया कि भारतीय अदालतें बड़े से बड़े आतंकी मुजरिम को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देती हैं। सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका की ही तरह लोकतंत्र का दूसरा स्तंभ समझी जाने वाली हमारे देश की निर्वाचित सरकारें भी इसी प्रकार निष्पक्ष कार्य कर पाती हैं? हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बनाए रखने में सरकारों का क्या योगदान रहता है? इसे देखने के लिए हमें 1984 में हुए सिख दंगे भी याद करने पड़ेंगे, उसके पूर्व उत्तर प्रदेश व बिहार में कई जगह हुई सांप्रदायिक दंगों की घटनाओं पर भी नज़र डालनी पड़ेगी, 2002 के गुजरात दंगों पर भी और वर्तमान समय में सुलग रहे असम राज्य की स्थिति पर भी गौर करना होगा। जहां भारतीय अदालतें उपद्रवियों व आतंकियों को उनके अंजाम तक पहुंचाकर देश की छवि को सुधारने का काम कर रही हैं वहीं तमाम राज्यों की निर्वाचित सरकारों के पक्षपातपूर्ण, ढुलमुल, पूर्वाग्रही तथा विवादित फैसले देश की साफ-सुथरी छवि पर काला धब्बा लगाने का काम करते हैं।

उदाहरण के तौर पर 2002 में नरोदा पाटिया सामूहिक नरसंहार मामले में तत्कालीन भाजपा विधायिका माया कोडनानी को इस घटना का मुख्य अभियुक्त बताया गया। उस पर मुकद्दमा चला। परंतु राज्य की मोदी सरकार ने उसे बचाने की भरपूर कोशिश की। एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर उसे जेल जाने से रोकने का प्रयास किया गया। यही नहीं बल्कि इतने बड़े अपराध की दोषी इस मानवता विरोधी महिला को 2005 में भाजपा ने पुन: टिकट देकर अपना उम्मीदवार बनाया। ज़ाहिर है सांप्रदायिक आधार पर हुए मतों के धु्रवीकरण के बाद उसको चुनाव भी जीतना ही था। 95 लोगों की हत्या में शामिल यह महिला न सिर्फ चुनाव जीत गई बल्कि इस हत्या अभियुक्त को नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रीमंडल में भी शामिल कर उसे मान-सम्मान से नवाज़ दिया। सवाल यह है कि जिस महिला को अदालत सामूहिक हत्याकांड का मुख्य अभियुक्त मान रही हो, मोदी सरकार द्वारा उसी अभियुक्त को मंत्री बनाकर उसकी इज़्ज़त अफज़ाई करना गुजरात सरकार की देश व दुनिया में कैसी छवि पेश करता है। क्या कथित ‘वाईब्रेंट गुजरात’ में निर्वाचित मोदी सरकार से ऐसे ही फैसलों की उम्मीद की जानी चाहिए? मोदी सरकार के और भी कई मंत्री,विधायक व पार्टी नेता 2002 की घटनाओं में सज़ा पा चुके हैं, पकड़े जा चुके हैं, जेल जा चुके हैं अथवा उन पर मुकद्दमे विचाराधीन हैं। केवल 2002 के दंगों में हुई बदनामी के चलते गुजरात अब देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। परंतु राज्य के मुखिया नरेंद्र मोदी को अब भी 2002 की खौफनाक घटनाओं के लिए माफी मांगने पर आपत्ति है। उल्टे वे स्वयं को कट्टरपंथी शक्तियों के समक्ष ‘बेचारा’ पेश करने की कोशिश में अब यह कहने लगे हैं कि जब मैं कुसूरवार ही नहीं तो माफी किस बात की और यदि मैं कुसूरवार हूं तो मुझे फांसी पर लटका दिया जाए। वे गुजरात के खौफनाक दंगों पर कथित विकास का लेप चढ़ाकर उन घटनाओं की नैतिक जि़म्मेदारी से अपना मुंह मोडऩा चाहते हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजधर्म के पालन किए जाने की सलाह को भी वे कोई अहमियत नहीं देते।

ज़ाहिर है राज्य सरकारों के इस प्रकार के पक्षपात पूर्ण कदम धर्म,संप्रदाय, जाति या पार्टी के आधार पर अपराधियों व दोषियों को बचाने की प्रवृति इस संबंध में किसी भी सरकार द्वारा उठाया जाने वाला पक्षपात पूर्ण कदम, सत्ता के बल पर होने वाले प्रशासनिक दुरुपयोग अथवा इसके माध्यम से होने वाला बल प्रयोग निश्चित रूप से हमारे देश की स्वतंत्र व धर्मनिरपेक्ष छवि को बट्टा लगाता है। पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय द्वारा क़साब को दी गई फांसी की सज़ा बहाल करने के समय अन्य राजनैतिक दलों की तरह भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा भी इस फैसले का स्वागत किया गया। परंतु उसी समय नरोदा पाटिया नरसंहार को लेकर गुजरात के आतंकवादियों के विषय में जिसमें कि भाजपा के भी कई लोग यहां तक कि विधायिका भी शामिल थी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई। आखिर क्यों? क्या भाजपा को विशेष अदालत का फैसला रास नहीं आया? क्या ऐसे फैसले का स्वागत कर भाजपा शर्मसार नहीं होना चाहती थी? या फिर ऐसी घटनाओं को भाजपा आतंकी घटनाओं के रूप में नहीं देखती? जो भी हो भारतीय अदालतों ने अपने इन ऐतिहासिक फैसलों से एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राज्य की निर्वाचित सरकारें अपनी सुविधा के अनुसार कभी भले ही पूर्वाग्रह या पक्षपातपूर्ण क्यों न हो जाया करती हों, परंतु भारतीय न्यायालय में धर्म, संप्रदाय व जाति के आधार पर पक्षपात करने की कोई गुंजाईश नहीं है।

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2 Comments on "धर्मनिरपेक्ष भारत की अदालतों में होते निष्पक्ष फैसले"

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Mohammad Athar Khan, Faizabad Bharat
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Mohammad Athar Khan, Faizabad Bharat
भारत सिर्फ नाम का धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है वास्तव में यहाँ सम्प्रदायिक ताकतों का ही बोलबाला है. भारत की न्याय व्यवस्था से मुसलमानों को कभी न्याय नहीं मिला. १. न्यायलय में सरकार द्वारा बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिए हलफनामा दायर करने के बावजूद मस्जिद शहीद हो, आखिर क्या किया न्यायलय ने. २. १९९३ के मुंबई दंगों के दोषियों को तो सजा दे दी लेकिन बाबरी मस्जिद के दोषियों को न्यायलय ने आजतक सजा क्यों नहीं दी. ३. समझौता एक्सप्रेस. मक्का मस्जिद, मालेगांव और अजमेर शरीफ में धमाका करने वालों को सजा कब मिलेगी. ४. इन मामलों में न्यायालय ने… Read more »
शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह

अख्तर साहब जिस बाबरी का जिकरा आप कर रहें हैं तो उसका इतिहास भी तो पढ़ लीजिये. और इतिहास भी अपने “सो काल्ड” पूर्वजों का ही पढ़िएगा. रही बात भारत के धर्म निरपेक्षता की तो धर्म निरपेक्ष शब्द मुसलमानों के मुंह से अच्छा नहीं लगता है. जो आप खुद नहीं है तो दूसरे से आप उसकी किस तरह आपेक्षा कर सकते हैं? जिस मंदिर का आप जिक्र कर रहें है तो बहुत सी मस्जिदें भी इसी तरह तामीर की गई हैं उनको क्यों छोड़ रहे है? एक ऊँगली उठा रहे हैं तो बाकि की उँगलियों की दिशा भी देखिये.

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