लेखक परिचय

चैतन्‍य प्रकाश

चैतन्‍य प्रकाश

लेखक स्‍वतंत्र चिंतक हैं।

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चैतन्य प्रकाश

विराट सूना आकाश क्रीड़ांगन बन गया है। काले मेघों की चपल किल्लोल जारी है। जलभरे बादलों से पटा आकाश मनुष्यता के सौभाग्य का समर्थ प्रतीक बना है। सूरज और चांद भी छिप-छिप कर इस खेल का मजा ले रहे हैं। धरती मां का अखण्ड जलाभिषेक हो रहा है।

धरत्रि उर्वरा है, पुनर्नवा है, सृष्टि के नवोन्मेष का महायज्ञ चल रहा है। इस यज्ञ का पुरोहित ‘किसान’ है। वसुंधरा की उर्वरा में बीज का समर्पण अभीप्सित है। किसान बीज के भाग्य का वाहक है। वह बीज को गलने, मिटने के लिए मुक्त कर रहा है। बीज के मोक्ष से सृष्टि का आविर्भाव होता है। तत्त्व का तत्त्व से मिलन ही पुन: तत्त्व की निर्मिति करता है। मिलन में मिटता क्या है, निर्माण में फिर बनता क्या है? यदि तत्त्व अक्षुण्ण है तो गलने-मिटने, बनने के मायने क्या हैं?

तत्त्व संरचना धारण करता है तो निर्माण कहा जाता है और संरचना से मुक्त होता है तो मृत्यु या निर्वाण घटित होता है। निर्वाण का अर्थ होता है दीए का बुझ जाना, अर्थात ज्योति का दृश्यमान रूप ओझल हो जाता है, मगर ज्योति विद्यमान रहती है। संरचना की मुक्ति और निर्मिति के महायज्ञ का सार्वत्रिक ‘होता’ (आहुति देने वाला) किसान बोध के सर्वाधिक निकट होता है। संरचना की आवाजाही का वह प्रत्यक्ष गवाह है। किसान के भीतर बुद्धत्त्व की सर्वाधिक संभावनाएं हैं। वह लगभग साक्षित्त्व की देहरी पर खड़ा होता है। इसीलिए अधिकांश ऋषियों का जीविका-कर्म कृषि रहा है।

संसार सदैव संरचनाओं में भरोसा करता है। संसार का यही भरोसा सुख-दुख, भय, प्रतिक्रिया-प्रतिशोध,ईर्ष्या-घृणा इत्यादि का मूल है। यह भरोसा ‘भ्रम’ है, ऐसा कहने, सुनने, मानने की अनेक विधा कोशिशों के बावजूद संसार का ‘संरचनावाद’ बरकरार है। संरचनाओं को सच मानकर जीने के कारण संसार में काटने, बांटने की होड़ चलती है। संरचनाओं के मोह में मनुष्य जगत सरलीकरण की ओर बढ़ने की कोशिश करता है।

सर्वप्रथम वह जीवन की सुरक्षा, सुविधा की चाह में संरचनाएं, यथा -घर, परिवार, रिश्ते-नाते, मित्र-शत्रु, वाहन, दफ्तर, पद, प्रतिष्ठा इत्यादि निर्मित करता है। तदंतर प्रकृति को, अनुभूति को, अभिव्यक्ति को सरलतम करने की कोशिश करता है, अस्तु सत्यों को, तथ्यों को, शब्दों को, मर्म को अधिकाधिक सरल स्वरूप में समझना चाहता है। परिणामत: जीवन में एक सतहीपन आता जाता है। सरलीकरण की कवायद ऐसी है कि सतही स्पर्श ही रह जाता है, जैसे पानी भरने के लिए बाल्टी कुएं में डाली जाए और पानी को स्पर्श कर बाल्टी खाली वापस लौट आए।

सतहीपन का उप-उत्पाद है-सनसनी। भय और जुगुप्सा की स्थितियों में रस की अट्टाहास उपस्थिति सनसनी का आधार है। यहां संवेदना और सकारात्मकता विरल हो जाती है। मन उछलकर मस्तिष्क के ऊपर जा बैठता है। विकृति में रस आता प्रतीत होता है-लगभग वैसे ही जैसे श्वान के मुख से सूखी हड्डी के चबाने से निकल आया अपना ही रक्त, उसे स्वादिष्ट लगने लगता है।

सांसारिक बहिर्मुखता धीरे-धीरे अधोमुखता में परिणित हो जाती है। सांसारिक अवरोहण के ये चतुर्विधा चरण हैं- संरचनावाद, सरलीकरण, सतहीपन और सनसनी। संसार का सारा चीत्कार, क्रंदन और अट्टाहास इन चारों स्तंभों के व्याप में समाया है।

इन चारों स्तंभों की माया में बहका संसार एक मनोरोगशाला की भांति अटपटा और अराजक है। संसार की यह धारा बेतहाशा बह रही है। यह धारा पतनोन्मुखी है। इस धारा में संसार निरंतर जल रहा है।

किसान इस धारा के विरुद्ध चलने की सामर्थ्य का जीवंत पुंज है। वह जलते संसार की आग का शमन कर सकता है। वह संरचनाओं के भ्रम से वाकिफ है, वह संरचनाओं की क्षण-भंगुरता का नित्य साक्षी है। वह सत्य को, तथ्य को, मर्म को ज्यों का त्यों समझने की ओर अग्रसर होता है, इसलिए कृषि-कर्म में प्रशिक्षण नहीं बल्कि चित्तग्रहण आवश्यक होता है, वहां सरलीकरण की आवश्यकता अनुभव नहीं होती है, फलत: सतहीपन आता ही नहीं है।

कृषि और किसान गहनतम यात्राओं के प्रतिनिधि यात्री हैं। भूमि की अतल गहराइयों में मीठे जल की तलाश वैज्ञानिकों ने नहीं किसान ने की है। किसान के जीवन में सनसनी का कोई स्थान नहीं है। वह सूरज, चांद, बादल और हवा का सहृदय मित्र है। वह सहयोगपूर्ण जीवन जीता है, अस्तु उसके जीवन में सनसनी नहीं, सहजता है।

धरती का प्यारा, लाडला पुत्र किसान बुद्धत्त्व की पीठिका पर खड़ा होता है। उसे एक कदम ऊपर उठाना है, फिर वह समष्टि में परमेष्ठि का प्रतीक होकर उभर सकता है। पृथ्वी का सारा त्रास मिट सकता है, यदि किसान-बुद्धों का आविर्भाव होने लगे। दुर्योग से किसान इस सदी की विपदाओं से टूट रहा है।

मगर इस चौमासे (वर्षा ऋतु) की जल-किल्लोल में प्रकृति का गहन संदेश निहित है – नैराश्य छोड़कर, जागकर बढ़ो! हे भावी बुद्ध, जगत का त्रास घना हो रहा है। तुम्हारे बुद्धत्व की प्रतीक्षा हैं।

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1 Comment on "किसान बुद्ध का आह्नान!"

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jay prakash singh
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चैतन्य प्रकश जी , इतने सुंदर ललित आलेख के धन्यवाद् आपने इस आलेख के जरिये भारतीय तासीर और उसमे लोक जिसका प्रतिनिधि किसान है , की विशेषताओं को अच्छे ढंग से उकेरा है , यह एक सत्य है की भारत में शास्त्र के साथ लोक भी ज्ञान का सर्जक रहा है , वाहक रहा है , इसलिए भारतीयता की सही पहचान और उसके अनुरूप नया विकास मॉडल खड़ा करने के लिए किसान की भूमिका ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगी , आपका सम्पर्क सूत्र मिले तो आपसे संवाद करना चाहूँगा , मेरे कुछ आलेख है , प्रवक्ता पर आप पढेंगे तो लगेगा… Read more »
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