लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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farmer suicideशैलेन्द्र चौहान
यह बड़े दुख की बात है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश के किसान लगातार आत्महत्या की ओर प्रवृत हो रहे हैं. आश्चर्य की बात तो यह कि पिछली सरकार के कृषिमंत्री यह कहते रहे कि उन्हें यह  नहीं मालूम कि किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के 31 मार्च 2013 तक के आंकड़े बताते हैं कि 1995 से अब तक 2,96 438 किसानों ने आत्महत्या की है. 2014 में किसानों की आत्महत्या का ब्यौरा जून महीने तक ज्ञात हो सकेगा. जानकार इस सरकारी आकंडे को काफी कम कर आंका गया बताते हैं. यह देखा गया है कि गत एक वर्ष  में अधिकांश फसलों की क़ीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई. नतीजतन किसानों की आय कम हुई है. वहीं उनकी आमदनी में इज़ाफ़ा होने वाला कोई बड़ा क़दम सरकार ने नहीं उठाया. एक साल के भीतर ही किसानों को दो -दो प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा. कमज़ोर मॉनसून के चलते खरीफ़ का उत्पादन गिरा, वहीं फ़रवरी से लेकर अप्रैल के पहले सप्ताह तक जिस तरह बेमौसम की बारिश, ओले और तेज़ हवाओं ने किसानों की तैयार फसलों को बर्बाद किया उसका झटका किसान नहीं झेल पाए. इस प्राकृतिक आपदा के बाद राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में जिस तरह से किसानों ने आत्महत्याएं कीं, उससे साफ़ है कि आर्थिक रूप से उनका बहुत कुछ दांव पर लगा था जो बर्बाद हो गया. जहाँ पहले देश में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें महाराष्ट्र के विदर्भ और आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र से ही आती थीं, वहीं अब इसमें चौतरफा विस्तार हुआ है. इनमें बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाक़े ही नहीं, बल्कि देश की हरित क्रांति की कामयाबी में अहम भूमिका वाले हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य भी शामिल हो गए हैं. औद्योगिक और कृषि विकास के आंकड़ों में रिकॉर्ड बनाने वाले संपन्न गुजरात के क्षेत्र भी शामिल हैं क्योंकि वहां किसानों ने दूध को आय का एक मज़बूत स्रोत बना लिया था. लेकिन अब वहां हालात बदल गए हैं. फसल बर्बाद होने के कारण हो रहे भारी नुकसान से किसान की बढ़ती हताशा उसे आत्महत्या की ओर ले जा रही है. इस तरह की आपदा के बाद किसानों को राहत के लिए दशकों पुरानी व्यवस्था और मानदंड ही जारी हैं. अक़्सर सूखे का सामना करने वाले राजस्थान में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें प्रायः नहीं आती थीँ. राजस्थान और मध्य प्रदेश के किसान भी अब आत्महत्या जैसे घातक क़दम उठा रहे हैं. पर क्यों? सीधा जवाब यह है कि खेती करना अब घाटे का सौदा हो गया है. इस देश की सरकार ने इस व्यवस्था को व्यवहारिक बनाने और वित्तीय राहत प्रक्रिया को तय समयसीमा में करने के लिए कभी उचित क़दम नहीं उठाए. कृषि प्रधान देश की सरकार जो विकास के नाम पर एक औद्योगिक ढांचा खड़ा करने को प्राथमिकता बना चुकी  है. किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रहीं आत्महत्याओं के कारणों की वजहें  जानना सरकार आवश्यक नहीं समझती। क़रीब पांच साल पहले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने पंजाब में कुछ केस स्टडीज के आधार पर किसान आत्महत्याओं की वजह जानने की कोशिश की थी. इसमें सबसे बड़ी वजह किसानों पर बढ़ता कर्ज़ और उनकी छोटी होती जोत बताई गई. इसके साथ ही मंडियों में बैठे साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज की ऊंची दरें बताई गई थीं. लेकिन यह रिपोर्ट भी सरकारी दफ़्तरों में दबकर रह गई. दूसरी ओर, अब भी सरकार के साढ़े आठ लाख करोड़ रुपए के कृषि कर्ज़ के बजटीय लक्ष्य के बावजूद आधे से ज्यादा किसान साहूकारों और आढ़तियों से कर्ज़ लेने को मजबूर हैं. ये किसानों के लिए घातक साबित होता है. राजनीतिक पार्टियों द्वारा किसानों को ज़्यादा कर्ज़ की वकालत करने और कर्ज़ माफ़ी की बात उठना भी किसानों के बढ़ते संकट का एक बहुत बड़ा कारण है. एक ओर कर्ज के बोझ से किसान दबा जा रहा है दूसरी ओर कर्ज माफी की उम्मीद में निराशा से. लेकिन यह कोई स्थायी उपाय नहीं है. अगर ऐसा होता तो 2008 की साठ हजार करोड़ रुपए से ज़्यादा की कर्ज़ माफ़ी के बाद किसान आत्महत्याएं बंद हो जातीं. इसलिए इसका उपाय किसान की आय बढ़ाने में है न कि कर्ज़ माफ़ी. अब प्रधानमंत्री ने बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि से प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए दो घोषणाएं की हैं. उन्होंने कहा कि लागत सब्सिडी पाने के लिए पहले किसानों की 50 फ़ीसद या उससे अधिक फसल का बर्बाद होना ज़रूरी था. अब इस मानक को घटाकर 33 फ़ीसद कर दिया गया है. क्या यह पर्याप्त है ? असल में खेती की बढ़ती लागत और कृषि उत्पादों की गिरती क़ीमत किसानों की निराशा की सबसे बड़ी वजह है. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में किसानों की लागत में बहुत तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. इसमें सबसे अधिक बढ़ोतरी सिंचाई सुविधाओं पर होने वाले ख़र्च में हुई है. भूजल स्तर में भारी गिरावट के चलते ब्लैक स्पॉट में शुमार इन इलाक़ों में बोरवेल की लागत कई गुना बढ़ गई है और इसके लिए कर्ज़ का आकार बढ़ रहा है. तेलंगाना में जब आत्महत्या के आंकड़े बढ़े तो बोरवैल पर कर्ज़ इनकी बड़ी वजह थी. नीचे गिरते जल स्तर के चलते वहां बोरवैल पर प्रतिबंध लग गया था और इसके लिए बैंकों से कर्ज़ नहीं मिलने से किसान साहूकारों के पास जा रहे थे. पिछले साल उत्तर प्रदेश से किसानों की आत्महत्यों की खबरें आई तो उसकी वजह वहां किसानों का चीनी मिलों पर हज़ारों करोड़ रुपए का बकाया था. उसके बाद हालात और बदतर हुए हैं.अभी भी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर किसानों का करीब आठ हज़ार करोड़ रुपए का बकाया है. बड़ी तादाद में ऐसे किसान हैं जिनकी जोत दो एकड़ या इससे भी कम है, लेकिन उनको दो साल से गन्ना मूल्य का आंशिक भुगतान ही हो सका है. चीनी पर किसानों के फ़र्स्ट चार्ज के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जब चीनी मिलें सुप्रीम कोर्ट गईं थीं तो सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के पक्ष में फ़ैसला दिया था. जबकि भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल बैंकों के पक्ष में खड़े थे. इस तरह के उदाहरण सरकार की मंशा ज़ाहिर करते हैं कि वह किसान के साथ नहीं खड़ी है. यही वे संदेश होते हैं जो किसान की उम्मीद तोड़ते हैं. सरकार   किसानों को आश्वस्त नहीं कर पा रही है. भूमि अधिग्रहण विधेयक लाने के बाद से स्थितियां बदतर हुई हैं. इसके पक्ष में सरकार भले ही कितनी भी सफाई क्यों न दे किसान भरोसा नहीं कर पा रहा है. अतः उसका विश्वास अर्जित करने के लिए कर्ज देना और माफ करना ही पर्याप्त उपचार नहीं है बल्कि इसका वास्तविक और ठोस खाका बनाकर किसान की आय स्थायी रूप से बढ़ाने के लिए शीघ्र समुचित प्रयास किए जाने की जरुरत है. लेकिन अब तक तो ऐसा लग रहा है कि सरकार इस दिशा में कुछ सोच नहीं रही है.

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