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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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सिवनी जिले के इतिहास का काला अध्याय है सिवनी विधानसभा के ग्राम थांवरी के एक किसान द्वारा की गई आत्महत्या। यह आत्महत्या किस कारण से की गई है, इसके पीछे तर्क कुतर्क जमकर हो रहे हैं। सियासी दल के नुमाईंदे आपस में इसे लेकर राजनैतिक रोटियां सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। सिवनी की विधायिका और पूर्व संसद सदस्य श्रीमति नीता पटेरिया ने इस मामले में यह कहकर परिवारजनों को ढाढस बंधाने के बजाए उनका माखौल उडाया है कि मृतक राकेश संपन्न किसान था। सांसद जैसे जिम्मेदार पद पर पांच साल रहने के बाद विधानसभा के गलियारों में विचरण करने वाली श्रीमति नीता पटेरिया को शायद यह भान नहीं रहा होगा कि जब पाला के मुआवजे की बात आई तो प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव राकेश साहनी ने भी अपने खेत में लगी फसल के लिए भी मुआवजा चाहा है। क्या राकेश साहनी को मुआवजा मिलना उचित है। जो राज्य सरकार का प्रशासनिक मुखिया रहा हो, जिसको पेंशन के तौर पर हजारों रूपए मिल रहे हों वह क्या पाला से क्षतिग्रस्त फसल का मुआवजा लेने का पात्र है, और अगर है तो फिर गरीब गुरबे किसानों को आखिर मुआवजा क्यों नहीं मिल पा रहा है।

प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पाला को प्रकृतिक आपदा में शामिल करवाने के लिए प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह से चर्चा की, फिर भी उनका मन नहीं भरा तो वे वापस दिल्ली पहुचें और फिर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से मिले एवं यही मांग दोहरा दी। शिवराज बहुत ही गर्व के साथ कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने इसके लिए गु्रप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन करने का आश्वासन दिया है। सवाल यह है कि आखिर कब होगा यह जीओएम गठित और कब मिल सकेगा गरीबों को मुआवजा।

किसानों के मसले पर कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सुरेश पचौरी का कहना है कि केंद्र सरकार ने चार सौ पच्चीस करोड रूपए दे दिए हैं। शिवराज दावा करते हैं कि उन्होंने सात सौ करोड का प्रावधान किया है। इस तरह कुल राशि हो जाती है ग्यारह सौ पच्चीस करोड रूपयों की। फिर सुरेश पचौरी का कहना है कि उनके पास दस्तावेज बताते हैं कि शिवराज ने १७ फरवरी तक महज तीन सौ करोड रूपए ही खर्च किए हें। अब बताया जाए कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ किसानों का असली हमदर्द कौन है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इस मामले में आंकडों की बाजीगरी मीडिया के माध्यम से कर लोगों का ध्यान भटकाना चाह रहे हैं।

सिवनी की विधायिका श्रीमति नीता पटेरिया को किसानों के दर्द को कम से कम समझना तो चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के मोटी चमडी वाले जिले के पदाधिकारियों को भी इतनी शर्म नहीं आई कि वे किसान के परिजनो के पास जाकर दो शब्द संवेदना के बोल पाते। बात बात पर देश के राजनैतिक अक्स पर अपने बेबाक विचार रखने वाले जिले के भाजपाईयों ने रेल बजट और आम बजट पर अपनी राय रखना मुनासिब समझा किन्तु धडों में बटी भारतीय जनता पार्टी की जिला इकाई ने इस मामले में स्थानीय विधायक श्रीमति नीता पटैरिया के साथ कंधे से कंधा मिलाना मुनासिब नहीं समझा।

विधानसभा उपाध्यक्ष जेसे संवैधानिक पद पर विराजमान महाकौशल के कांग्रेस के इकलौते क्षत्रप ठाकुर हरवंश सिंह ने भी इस मामले में कोई खास पहल न किया जाना अश्चर्यजनक ही कहा जाएगा। हरवंश सिंह सिवनी में विपक्ष के इकलौते विधायक हैं, इसलिए सत्ताधारी दल के कुकृत्यों के पुरजोर विरोध की जवाबदारी उन पर ही आहूत होती है, इस तरह उनका मौन रहना उनके और भाजपा के बीच चल रही नूरा कुश्ती को उजागर करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। मजे की बात तो यह है कि हरवंश सिंह भी जनता के सामने अपने आप को निरीह प्रदर्शित कर रहे हैं। हरवंश सिंह जी आप एक जिम्मेदार विधायक हैं वह भी चौथी बार चुने गए हैं। आप विधानसभा उपाध्यक्ष हैं, फिर आप अगर यह कहें कि आपकी बात सरकारी नुमाईंदे नहीं सुनते तो यह किसी के गले नहीं उतर सकती है। अगर आप सच कह रहे हैं तो आपको आपकी बात सरकारी मुलाजिमों द्वारा नहीं सुने जाने की बात विधानसभा में उठाने के प्रमाण सिवनी जिले की जनता को देना ही होगा, वरना जनता यही समझेगी कि आप भाजपा विधायक श्रीमति नीता पटेरिया को बचाने के लिए इस तरह का प्रहसन मात्र कर रहे हैं।

भाजपा की कमान इस बार अपेक्षाकृत युवा कांधों पर रखी गई है। जिला भाजपाध्यक्ष सुजीत जैन, जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष महेश चंद मालू ने भी इस मामले में जुबान नहीं खोली है जो निंदनीय है। उधर जिला कांग्रेस की ओर से हीरा आसवानी ने १५ हजार रूपए, नगर कांग्रेस की ओर से इमरान पटेल ने १० हजार तो ब्लाक कांग्रेस की ओर से रेहान पटेल ने दस हजार रूपए की राशि मृतक के परिवार को दी है। आश्चर्य तो इस बात का है जब इस तरह की खबरें आम होने लगती हैं कि इस आत्महत्या के कारणों को अज्ञात बताया जाता है वह भी जिला प्रशासन द्वारा। उस किसान के द्वारा आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या नहीं किए जाने का ताना बना बुना जा रहा है।

सिवनी में इस तरह की पहली घटना घटी है, और उसके साथ ही साथ यह भाजपा के सांसद के डी देशमुख कांग्रेस के सांसद बसोरी सिंह, विधायक नीता पटेरिया, कमल मस्कोले, शशि ठाकुर, और कांग्रेस के ठाकुर हरवंश सिंह के शर्मसार करने वाली बात है। चौक चौराहों पर नथुआ की चर्चा तो हो रही है किन्तु कोई भी राजनैतिक दल इस मामले को हाथ में लेने से हिचक ही रहा है। अपनी विधानसभा का मामला थोडे ही है जो अपन बोलें, नीता जी जाने उनका काम जाने इम क्यों पचडे में फंसे, यह तो वहां के सांसद की जिम्मेवारी है, इस तरह की बातें कहकर जनप्रतिनिधि अपना पल्ला झाड रहे हैं जो किसी भी तरीके से सही नहीं ठहराया जा सकता। इन जनप्रतिनिधियों का अहम तब कहां जाता है जब वे अपनी विधानसभा या लोकसभा से हटकर प्रश्र पूछा करते हैं। यह अलहदा बात है कि उनके इस तरह के प्रश्रों में उनके निहित स्वार्थ छिपे होते हैं।

जनप्रतिनिधियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं गरीब आर्थिक परिस्थिति वाले किसानों के अमूल्य वोट के माध्यम से ही वे लोकसभा या विधानसभा की दहलीज में कदम रख पाते हैं।

मनोज मर्दन त्रिवेदी

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