लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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marriageयों तो हर गांव और नगर में चौक होते हैं; पर लखनऊ के चौक की बात ही कुछ और है। यह केवल एक चौराहा नहीं, बल्कि 200 साल पुराना बाजार और घनी आबादी वाला क्षेत्र भी है। इसलिए इसे ‘पुराना शहर’ भी कहते हैं। लखनऊ के प्रसिद्ध चिकन की कढ़ाई वाले कपड़े यहां सबसे अच्छे और सस्ते मिलते हैं।

 

बात लगभग दस साल पुरानी है। मैं जिस बैंक में काम करता हूं, उसने मुझे लखनऊ के चौक बाजार स्थित अपनी शाखा के निरीक्षण की जिम्मेदारी दी। अतः मैंने रेलगाड़ी से आरक्षण कराया और लखनऊ पहंुच गया। मेरे आने की सूचना वहां थी, इसलिए एक बैंककर्मी मुझे लेने आये हुए थे। बाहर निकल कर उन्होंने एक ऑटो ले लिया। चौक बाजार में पहुंच कर ऑटो वाले ने उनसे पूछा – बाबूजी, कहां चलना है ?

 

– ‘बाप जी की दुकान’ के सामने रोक देना।

 

यह नाम सुनकर मैं चौंका। कपड़े, राशन या किताबों आदि की दुकान का नाम तो मैंने सुना था; पर ‘बाप जी की दुकान’ जैसा नाम पहली बार ही मेरे कान में पड़ा था; लेकिन उस समय कुछ पूछना मैंने उचित नहीं समझा।

 

ऑटो से उतर कर मैंने देखा कि बैंक का भवन तो छोटा था; पर मुख्य बाजार में होने से उसका कारोबार काफी अच्छा था। बैंक का अपना एक सुव्यवस्थित अतिथिगृह भी था। वहीं मेरे ठहरने की व्यवस्था की गयी थी। बैंक के एक कर्मचारी महेश को मेरे साथ लगा दिया गया, जिससे मुझे कोई असुविधा न हो। सामान रखकर मैंने भोजन और विश्राम किया। शाम को बैंक के प्रबंधक आ गये। उनसे परिचय के बाद तय हुआ कि कल से निरीक्षण शुरू होगा।

 

शाम को मैं टहलने निकला। यह सारा क्षेत्र गोमती नदी के तट पर बसा है। महेश ने बताया कि लखनऊ का मूल नाम श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण जी के नाम पर ‘लक्ष्मणपुर’ पड़ा। फिर वह लखनपुर होते हुए लखनऊ हो गया। अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 में हुए स्वाधीनता संग्राम में इस अवध क्षेत्र की बड़ी भूमिका रही। यद्यपि भोग-विलासी नवाब दिन भर शराब, शबाब और कबाब के साथ ही शतरंज और मुर्गेबाजी में लगे रहते थे। नवाब वाजिदअली शाह भी राग और रंग का प्रेमी था; पर उसकी बेगम हजरत महल बहुत दिलेर थी। अवध के छोटे-छोटे राजा और जमींदार अपनी रियासतें बचाने के लिए जब अंग्रेजों से लड़ रहे थे, तब बेगम ने भी उन सबका पूरा साथ दिया। यद्यपि उस संघर्ष में उन्हें सफलता नहीं मिली। उन्हीं बेगम की स्मृति में लखनऊ का सबसे प्रमुख बाजार ‘हजरतगंज’ बना है।

 

घूमते हुए हम लोग गोमती के तट पर स्थित ‘कुड़िया घाट’ तक चले गये। वहां एक सुंदर मंदिर भी है, जहां सैकड़ों लोग एकत्र थे। बुजुर्ग टहलते हुए ताजी हवा खा रहे थे, तो बच्चे खेलकूद में मस्त थे। महेश ने बताया कि किसी समय यहां ‘कौण्डिन्य ऋषि’ का आश्रम था। ‘कुड़िया’ उन्हीं के नाम का अपभ्रंश है।

 

अगले दिन भर मैं बैंक के निरीक्षण में व्यस्त रहा। शाम को हम फिर टहलने निकले। आज चर्चा ‘बाप जी की दुकान’ की होने लगी। महेश ने बताया कि हमारे बैंक के सामने जो ‘टंडन चिकन भंडार’ है, उसके मालिक श्री हरिनाथ टंडन को ही सब ‘बाप जी’ कहते हैं। वे बड़े समाजसेवी व्यक्ति हैं। हर वसंत पंचमी पर वे गरीब और अनाथ लड़कियों की शादी कराते हैं। पिछले बीस साल में उन्होंने 300 से अधिक बेटियों को ससुराल भेजा है।

 

‘‘शादी में तो बहुत खर्चा होता है। इतनी आमदनी है उनकी ?’’ मैंने आश्चर्य से पूछा।

 

– ये खर्चा वे समाज के सहयोग से करते हैं। हर साल दस-बारह लड़कियों की शादी तो होती ही है। उस दिन पुराने शहर का हर व्यापारी ही नहीं, रिक्शा और तांगे वाले भी वहां जाकर कन्यादान के रूप में कुछ न कुछ देकर आते हैं। कई लोग तो अपनी उस दिन की पूरी कमाई इसी शुभ काम में दे देते हैं। ‘बाप जी’ की इतनी साख है कि कोई उनके हिसाब-किताब पर उंगली नहीं उठा सकता।

 

– लेकिन शादी में तो और भी कई खर्चे होते हैं ?

 

– जी हां। बाजार में हर तरह के व्यापार की अलग-अलग संस्थाएं हैं। होटल वाले खाने का प्रबन्ध कर देते हैं, तो कपड़े वाले कपड़े का। ऐसे ही सर्राफ और फर्नीचर वाले हैं। बैंड वाले भी पैसे नहीं लेते। सबको लगता है कि उनकी अपनी बेटी की शादी हो रही है। सब धर्म और जातियों की लड़कियों की शादी बाप जी कराते हैं। पूरे साल वे इसके प्रबन्ध के लिए घूमते रहते हैं।

 

– तो फिर वे कारोबार कब करते हैं ?

 

– कारोबार तो उनके बच्चों ने संभाल लिया है। बाप जी जब से इस सेवा में लगे हैं, तब से उन्होंने दुकान पर बैठना बंद कर दिया है। उनकी दुकान के ऊपर ही ‘सीताराम सेवा समिति’ का कार्यालय है। इस संस्था के माध्यम से ही शादियां होती हैं। वे शाम को वहीं मिलते हैं। आप मिलना चाहें, तो चलिए।

 

– हां जरूर।

 

महेश मुझे समिति के कार्यालय में ले गया। बाप जी के साथ कई लोग वहां बैठे थे। बाप जी की आयु लगभग 75 वर्ष रही होगी। महेश ने मेरा परिचय कराया, तो बुजुर्ग होते हुए भी उन्होंने खड़े होकर मेरा स्वागत किया। मैं उनके काम को समझना चाहता था, इसलिए वहीं रुक गया। कुछ देर बाद बाप जी को फुरसत मिली। मैंने उनसे पूछा कि इतने श्रेष्ठ काम की प्रेरणा उन्हें कैसे मिली ? बाप जी ने गहरी सांस ली और बताने लगे।

 

‘‘लगभग 20 साल पुरानी बात है। मैं दिन भर अपने कारोबार में व्यस्त रहता था। मेरे जीवन का एक ही लक्ष्य था, कारोबार को बढ़ाना। मैं चाहता था कि मेरा काम बाजार में सबसे ऊपर हो। इस मेहनत से मुझे बहुत लाभ हुआ; लेकिन इस चक्कर में अपने पास-पड़ोस को मैं बिल्कुल भूल गया।

 

मेरी दुकान के पीछे एक धोबी बाबूराम रहता है। एक दिन सुबह मैं दुकान पर पहुंचा, तो वहां से रोने-धोने की आवाजें आ रही थीं। दुकान खोलने का समय था, इसलिए वहां जाने की इच्छा तो नहीं थी; पर पड़ोस की बात थी, इसलिए जाना पड़ा। मैं वहां गया, तो मेरी आंखें फट गयीं। बाबूराम की तीनों लड़कियों ने एक साथ जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी।

 

मैंने पूछा, तो पता लगा कि उन तीनों की आयु क्रमशः 28, 25 और 23 साल थी। गरीबी के कारण उनकी शादी नहीं हो पा रही थी। मोहल्ले या रिश्तेदारी में जब किसी लड़की की शादी होती, तो उनके दिल पर छुरियां चलती थीं; पर वे बेचारी क्या करतीं ? इतने साल हो गये उन्हें यह सब देखते और सहते हुए। आखिर उनका धैर्य जवाब दे गया। कल बाबूराम और उसकी पत्नी किसी गमी में अपने गांव गये थे। उनके न होने का लाभ उठाकर तीनों बहिनों ने जहर खा लिया।

 

लोगों ने बताया कि बड़ी लड़की ने कई बार अपने माता-पिता से कहा कि मेरी तो उम्र निकल गयी है; पर दोनों छोटी बहिनों का तो कुछ करो; पर असल समस्या तो गरीबी थी। एक बार सबसे छोटी का रिश्ता आया भी, पर उसने साफ कह दिया कि दोनों दीदियों के अविवाहित रहते वह शादी नहीं करेगी।

 

मुझे अपने ऊपर बड़ी ग्लानि हुई। मेरे पड़ोस में इतना गरीब परिवार रह रहा है और मुझे खबर तक नहीं। मैंने अपने बच्चों की शादी में लाखों रुपये खर्च किये थे। यदि मैं दस-बीस हजार रु. खर्च कर इनमें से किसी एक लड़की की शादी भी करा देता, तो मेरा क्या घट जाता ? लेकिन मैं पैसे के पीछे इतना पागल हो गया कि आसपास में लोग कैसे रह रहे हैं, इसका कुछ पता ही नहीं।

 

इस खबर ने पूरे बाजार को झकझोर दिया। सब व्यापारियों ने मिलकर बाबूराम के लिए पचास हजार रु. जमा किये; पर अब इससे क्या होना था ? यही पैसा यदि पहले दिया होता, तो शायद किसी एक बेटी का विवाह हो जाता। एक का होता, तो बाकी के लिए भी रास्ता खुलता। दिन भर मेरा मन दुकान पर नहीं लगा। मैं यही सोचता रहा कि पहले तो किसी एक की बेटी पूरे गांव और बिरादरी की बेटी होती थी। इसलिए लड़की एक हो या चार, पर वे बोझ नहीं समझी जाती थीं; लेकिन शहरीकरण, आधुनिक शिक्षा और महंगाई ने सबको इतना आत्मकेन्द्रित बना दिया कि अपने परिवार और कारोबार से आगे किसी को कुछ दिखायी नहीं देता।

रात में घर पहुंचने पर भी मेरा मन उदास था। पत्नी ने पूछा, तो मैंने सारी बात बतायी। मुझे अपने बाजार और समाज के लोगों पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। क्या इन गरीबों को जीने का हक नहीं है; कोई इनके लिए कुछ करता क्यों नहीं है ?

मेरी पत्नी बहुत समझदार थी। उसने कहा कि दूसरों को दोष देने से पहले अपने गिरेबान में भी तो झांको। अब तो लड़के बड़े हो गये हैं। उन्होंने दुकान भी संभाल ली है। सब बच्चों के विवाह भी हो चुके हैं। तुम नाना भी बन चुके हो और दादा भी। फिर तुम दुकान से क्यों चिपके हो; यदि तुम्हारे मन में गरीबों की बेटियों के लिए दर्द है, तो फिर आगे बढ़कर ये काम तुम ही क्यों नहीं करते ?

 

पत्नी की बात मेरे दिल को लग गयी। उसने ठीक ही कहा था कि लोग दूसरों को तो दोष देते हैं; पर अपनी ओर नहीं देखते। अगले कई दिन तक मैं इस विषय पर सोचता रहा। अंततः मैंने तय कर लिया कि अब कारोबार से हाथ खींच कर इसी सेवा के काम में लगना है। मेरे दो लड़के हैं। दोनों दुकान पर ही बैठते हैं। मैंने उनसे बात की। उन्होंने भी मुझे प्रोत्साहित किया। दो महीने बाद मेरी साठवीं वर्षगांठ थी। मैंने उस दिन अपने घर पर एक यज्ञ किया। सभी परिचित लोगों को बुलाया और सबके सामने घोषणा कर दी कि कारोबार से अलग होकर अब मैं समाज सेवा में लग रहा हूं। मेरी कोशिश होगी कि कोई गरीब बेटी, पैसे के अभाव में कुंवारी न रह जाए।

 

कुछ दिन बाद मैंने बाजार के लोगों की एक बैठक रखी। सबने मिलकर ‘सीताराम सेवा समिति’ का गठन किया और मुझे ही उसका अध्यक्ष बना दिया। तबसे हमारी संस्था इस काम में लगी है।’’

 

– लेकिन आपको लोग ‘बाप जी’ कैसे कहने लगे ?

 

इस पर टंडन जी जोर से हंसे। फिर बोले, ‘‘हमारी समिति की ओर से जिस पहली बेटी का विवाह हुआ, वह गरीब तो थी ही, पर उसके जन्म के अगले ही दिन एक दुर्घटना में उसके पिताजी का निधन हो गया था। यानि उसने अपने पिताजी को कभी देखा नहीं था। लोग उसे मनहूस समझते थे; पर हमारी समिति के प्रयास से उसका विवाह हो गया। जब पहली बार वह अपने पति के साथ यहां आयी, तब उसने मुझे ‘बाप जी’ कहा। बस तब से सब लोग मुझे बाप जी ही कहने लगे।’’

 

मैंने पूछा कि अब तक इस समिति के माध्यम से कितनी बेटियों के विवाह हुए हैं। इस पर बाप जी ने सामने लगे बोर्ड की तरफ इशारा किया। वहां हर साल का ब्यौरा लिखा हुआ था। पिछले 20 साल में लगभग 300 बेटियों के विवाह इस समिति के माध्यम से हुए हैं। अगले दिन शाम को मैं फिर उनके कार्यालय में आ बैठा। कुछ ही देर में एक व्यक्ति वहां आया। वह बाप जी को नमस्ते कर जमीन पर बैठने लगा; लेकिन उन्होंने आग्रहपूर्वक उसे कुरसी पर बैठाया। फिर उनमें बात होने लगी।

 

– बाप जी, हमारी बिटिया 21 साल की हो गयी है। हम कई साल से उसकी शादी करना चाहते हैं; पर..।

 

– कोई बात नहीं। आप कहां रहते हो..?

 

– मेरा नाम दुर्गादास है बाप जी। लक्कड़ मंडी में मेरा एक खोखा है। वहीं कुछ कपड़े सिल लेता हूं।

 

बाप जी ने उसे एक फार्म दिया, ‘‘आप इसमें अपनी और बेटी की सारी जानकारी लिख दो। वसंत पंचमी पर हमारी संस्था की ओर से बेटियों की शादियां होंगी; पर अपनी जाति-बिरादरी और घर-परिवार देखकर बेटी का रिश्ता तय करना तुम्हारा काम है। जब यह हो जाए, तो हमें बताना। वसंत पंचमी से एक महीना पहले यदि आपकी पक्की सूचना हमारे पास आ गयी, तो इस बार की सूची में आपका नाम भी लिख लिया जाएगा। वरना फिर एक साल के लिए बात टल जाएगी।’’

 

– जी, रिश्ता तो तय हो चुका है।

 

– ये तो बहुत अच्छी बात है। आप फार्म में ये सब बातें लिख दो। सीताराम जी चाहेंगे, तो सब बहुत अच्छे से होगा।

 

दुर्गादास के चेहरे से लग रहा था, मानो उसके सिर का कुछ बोझ हल्का हो गया है। उसने बाप जी को प्रणाम किया और नीचे उतर गया।

 

मेरे पूछने पर बाप जी ने बताया कि रिश्ता तय करने में हम कोई दखल नहीं देते। हमारा काम तो उसके बाद शुरू होता है। शादी वाले दिन हर पक्ष से पचास लोग शादी में शामिल होते हैं। सीताराम जी की कृपा से सब बहुत अच्छे से सम्पन्न हो जाता है। अगली वसंत पंचमी को समय निकालकर आप भी आइये और बच्चों को आशीर्वाद दीजिये।

 

मैं बाप जी द्वारा किये जा रहे इस सेवा कार्य से बहुत प्रभावित हुआ। मैंने चैकबुक निकाली और 5,100 का एक चैक उन्हें दिया, ‘‘वसंत पंचमी तो जब आएगी, तब देखा जाएगा। फिलहाल तो आप मेेरी ओर से ये छोटा या योगदान स्वीकार करें।’’

 

बाप जी ने खड़े होकर बड़े आदर से मेरा चैक लिया और तुरंत ही उसकी रसीद बनाकर दे दी। उन्हें प्रणाम कर मैं वापस लौट आया।

 

अगले दिन बैंक के निरीक्षण का काम पूरा हो गया। अतः मैंने रात की गाड़ी से वापसी का टिकट बनवा लिया। ऑटो में बैठते समय मैंने देखा, बाप जी अपने सेवक का सहारा लेकर धीरे-धीरे ‘सीताराम सेवा समिति’ के कार्यालय से उतर रहे थे। ऑटो वाला बोला, ‘‘बाबूजी, इन जैसे भले लोगों के कारण ही ये दुनिया टिकी हुई है। वरना ये कब की नष्ट हो गयी होती।’’

 

मुझे लगा कि ऑटो वाला सचमुच ठीक ही कह रहा है।

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बिमलेंदु
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बिमलेंदु

दिल को छू लेने वाला लेख.

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