लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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fathers day
डा. राधेश्याम द्विवेदी
पिता दिवस या फ़ादर्स डे पिताओं के सम्मान में एक व्यापक रूप से मनाया जाने वाला पर्व है जिसमें पितृत्व (फादरहुड), पितृत्व-बंधन तथा समाज में पिताओं के प्रभाव को समारोह पूर्वक मनाया जाता है। विश्व के अधिकतर देशों में इसे जून के तीसरे रविवारको मनाया जाता है। कुछ देशों में यह अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है। यह माता के सम्मान हेतु मनाये जाने वाले मातृ दिवस का पूरक है। पिता एक ऐसा शब्द जिसके बिना किसी के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक ऐसा पवित्र रिश्ता जिसकी तुलना किसी और रिश्ते से नहीं हो सकती। बचपन में जब कोई बच्चा चलना सीखता है तो सबसे पहले अपने पिता की उंगली थामता है। नन्हा सा बच्चा पिता की उँगली थामे और उसकी बाँहों में रहकर बहुत सुकून पाता है। बोलने के साथ ही बच्चे जिद करना शुरू कर देते है और पिता उनकी सभी जिदों को पूरा करते हैं। बचपन में चॉकलेट, खिलौने दिलाने से लेकर युवावर्ग तक बाइक, कार, लैपटॉप और उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने तक आपकी सभी माँगों को वो पूरा करते रहते हैं लेकिन एक समय ऐसा आता है जब भागदौड़ भरी इस ज़िंदगी में बच्चों के पास अपने पिता के लिए समय नहीं मिल पाता है। इसी को ध्यान में रखकर पितृ दिवस मनाने की परंपरा का आरम्भ हुआ।
इतिहास:- पितृ दिवस की शुरुआत बीसवीं सदी के प्रारंभ में पिताधर्म तथा पुरुषों द्वारा परवरिश का सम्मान करने के लिये मातृ-दिवस के पूरक उत्सव के रूप में हुई. यह हमारे पूर्वजों की स्मृति और उनके सम्मान में भी मनाया जाता है। फादर्स डे को विश्व में विभिन तारीखों पर मनाते है -जिसमें उपहार देना, पिता के लिये विशेष भोज एवं पारिवारिक गतिविधियाँ शामिल हैं।आम धारणा के विपरीत, वास्तव में फादर्स डे सबसे पहले पश्चिम वर्जीनिया के फेयरमोंट में 5 जुलाई 1908 को मनाया गया था। कई महीने पहले 6 दिसम्बर 1907 को मोनोंगाह, पश्चिम वर्जीनिया में एक खान दुर्घटना में मारे गए 210 पिताओं के सम्मान में इस विशेष दिवस का आयोजन श्रीमती ग्रेस गोल्डन क्लेटन ने किया था। प्रथम फादर्स डे चर्च आज भी सेन्ट्रल यूनाइटेड मेथोडिस्ट चर्च के नाम से फेयरमोंट में मौजूद है। विश्व के अधिकतर देशों की संस्कृति में माता-पिता का रिश्ता सबसे बड़ा माना गया है। भारत में तो इन्हें ईश्वर का रूप माना गया है। यदि हम हिन्दी कविता जगत की कवितायें देखें तो माँ के ऊपर जितना लिखा गया है उतना पिता के ऊपर नहीं। कोई पिता कहता है, कोई पापा, अब्बा, बाबा, तो कोई बाबूजी, बाऊजी, डैडी कहता है। इस रिश्ते के कितने ही नाम हैं पर भाव सब का एक है। सबमें एक सा प्यार सबमें एक सा समर्पण। विश्व पितृ दिवस की शुरुआत 20 वीं सदी के प्रारम्भ में बताई गई है। कुछ जानकारों के मुताबिक 5 जुलाई 1908 को वेस्ट वर्जेनिया के एक चर्च से इस दिन को मनाना आरम्भ किया गया। रुस में यह 23 फरवरी, रोमानिया में 5 मई, कोरिया में 8 मई, डेनमार्क में 5 जून, ऑस्ट्रिया बेल्जियम के लोग जून के दूसरे रविवार को और ऑस्ट्रेलिया व न्यूज़ीलैंड में इसे सितम्बर के पहले रविवार और विश्व भर के 52 देशों में इसे जून माह के तीसरे रविवार को मनाया जाता है। सभी देशों इस दिन को मनाने का अपना अलग तरीका है। एक पुराने भजन की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं –

पिता ने हमको योग्य बनाया, कमा कमा कर अन्न खिलाया।
पढ़ा लिखा गुणवान बनाया, जीवन पथ पर चलना सिखाया।।
जोड़ जोड़ अपनी सम्पत्ति का बना दिया हक़दार।
हम पर किया बड़ा उपकार ! दंडवत बारम्बार।।
काश आज आप हमारे साथ-साथ होते।
हमारे सर पर आपके दोनों हाथ होते।।
आपकी हँसी और आपकी जिन्दादिली।
मुश्किलों में भी, वो हँसी वो ठिठोली।।
आज भी मुझको आपकी याद आती है।
आज भी मुझको आपकी याद आती है।।
काश के हम आपको कभी भी न खोते।
काश आज आप हमारे साथ साथ होते।।
पिता जीवन है, सम्बल है, शक्ति है।
वो सृष्टि निर्माण की अभिव्यक्ति है।।
पिता अँगुली पकडे बच्चे का सहारा है।,
पिता कभी कुछ खट्टा कभी खारा है।।,
पिता पालन पोषण परिवार का अनुशासन है।
वो धौंस से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।।
पिता रोटी है, कपडा है और मकान है ।
पिता छोटे से परिंदे का बडा आसमान है।।
पिता अप्रदर्शित-अनंत सा प्यार है।
पिता है तो बच्चों को इंतज़ार है।।
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।,
पिता से बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं।।
पिता से परिवार में प्रतिपल का राग है।
पिता से ही माँ की बिंदी और सुहाग है।।
पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ति है।
पिता गृहस्थ आश्रम में उच्च स्थिति की भक्ति है।।
वो अपनी इच्छाओं का हनन औ परिवार की पूर्ति है।
पिता रक्त से निगले हुए संस्कारों की मूर्ति है।।
पिता एक जीवन को जीवन का दान है।
पिता दुनिया दिखाने का अहसान है।।
पिता सुरक्षा है गर सिर पर हाथ है।
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।।
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।
पिता से बड़ा तुम अपना भी नाम करो।
उनका अपमान नहीं उनपर अभिमान करो।।
क्योंकि माँ-बाप की कमी को कोई बाँट नहीं सकता।
और ईश्वर भी इनके आशिषों को काट नहीं सकता।।
विश्व में किसी देवता का स्थान दूजा है।
माँ-बाप की सेवा ही सबसे बडी पूजा है।।
विश्व में किसी तीर्थ की यात्रा व्यर्थ हैं।
यदि बेटे के होते माँ-बाप असमर्थ हैं।।
खुशनसीब हैं वो जिनके साथ होते हैं।
उनके आशिषों के हज़ारों हाथ होते हैं।।

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