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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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संजय पराते

प्रत्यक्ष विदेषी निवेश (एफडीआई) पर संसद के अंदर बहस और मतदान के पैटर्न से यह साफ हो गया है कि तथाकथित क्षेत्रीय पार्टियों का आम जनता के व्यापक हितों – जिसको अक्सर राष्ट्रीय हितों के रुप में परिभाषित किया जाता है- से कोई सरोकार नहीं रह गया है। इन दलों का पूरा रवैया अपनी पार्टियों के नेताओं के हितों की रक्षा करना और इस हेतु केन्द्र सरकार और सत्तारूढ़ पार्टियों से सौदेबाजी तक सीमित रह गया है।

एफडीआई पर आम जनता के बीच काफी समय से बहस जारी है। संसद में इस बहस पर विराम लग चुका है। थोथे सरकारी प्रचार को छोड़ दिया जाये, तो यह स्पष्ट है कि एफडीआई आम जनता के हित में नहीं है, क्योंकि इसका देश की अर्थव्यवस्था में कोई सकारात्मक योगदान नहीं होने वाला है, सिवाय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के। लेकिन ऐसा आर्थिक पैमाना किसी काम का नहीं, जिसका जनता के जीवन स्तर पर कोई सकारात्मक प्रभाव ना दिखे। सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जीडीपी में वृद्धि के साथ आर्थिक संकट से जूझ रही आम जनता को गरीबी, भुखमरी, महंगाई, बेरोजगारी आदि से राहत क्यों नहीं मिल रही है? या यह कैसा आर्थिक विकास है, जो जीडीपी में वृद्धि तो करे, लेकिन साथ ही आम जनता के विशाल हिस्सों को आर्थिक संकट के दलदल में और ज्यादा गहरे धकेल दे और उसके पास 20 रुपये दैनिक क्रयशक्ति से कम पर जिंदा रहने या फिर आत्महत्या करने का ही विकल्प रह जाये?

1990 के दशक से जिन आर्थिक सुधारों को चरणबद्ध रूप से लागू किया जा रहा है, उसके दुष्परिणाम अब सबके सामने हैं। उस समय भी यही दलील दी गई थी कि आम जनता को उसकी तकलीफों से उबारने के लिए और आर्थिक संसाधनों को जुटाने के लिए इन सुधारों को लागू किया जा रहा है। पिछले बीस सालों में आम जनता की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि वह और ज्यादा बदहाल हुई है। इस बदहाली से उबारने के नाम पर और तगड़े आर्थिक सुधारों का डोज दिया जा रहा है। यह एक चक्रीय दुष्चक्र है- जितने ज्यादा आर्थिक सुधार होंगे, आम जनता उतनी ही ज्यादा बदहाल होगी; लेकिन चंद लोग इससे भरपूर लाभान्वित होंगे, उनके मुनाफे बढ़ेंगे। स्पष्ट है कि आर्थिक सुधारों की नीति वास्तव में आर्थिक असमानता को बढ़ाने की ही नीति है। वैष्वीकरण और उदारीकरण की नीतियों की वैश्विक हकीकत यही है, जिसके खिलाफ न केवल तीसरी दुनिया के देशों में, बल्कि विकसित देशों की जनता भी प्रतिरोध के रास्ते पर आ रही है। अमेरिका में ‘वालस्ट्रीट पर कब्जा करो’ आंदोलन की धमक अभी खत्म नहीं हुई। वालमार्ट का असली चेहरा अमेरिका से ही छनकर हम तक पहुंच रहा है और राष्ट्रपति ओबामा को भी स्माल बिजनेस शनिवार को ‘खुदरा खरीदी’ की पहलकदमी करनी पड़ी है।

अर्थशास्त्र की यह साधारण-सी बात है कि निजी एकाधिकार प्रतियोगिता को खत्म कर देता है और यह अर्थव्यवस्था के हित में नहीं है। खुदरा व्यापारियों को बर्बाद करने के बाद जब प्रतियोगिता खत्म हो चुकी होगी, तब एकाधिकारियों का असली चेहरा सामने आता है। तब आम जनता के पास किसी भी चीज की स्वतंत्रता नहीं रह जाती- न अच्छा खरीदने की, न सही कीमतों की और न उत्पादक वर्ग को सही मुनाफे की। उसके पास एक ही विकल्प बच जाएगा- जो जैसा है और जिस कीमत पर है, उसका उपभेग करो। जो इस कीमत को चुकाने में अक्षम है, वह उपभोग से वंचित रहे। ऐसा अर्थशास्त्र ‘खराब अर्थशास्त्र’ का ही उदाहरण बन सकता है।

वालमार्ट व कैरीफोर के विशाल महल केवल दस लखिया शहरों तक ही सीमित नहीं रहने वाले हैं और इसलिए केवल इन शहरों के ही खुदरा व्यापारी प्रभावित नहीं होने वाले हैं। एकाधिकारवादी विदेशी पूंजी जब पैर फैलाती है, तो वह देश के इस छोर से उस छोर तक फैलाती है, क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी है जो न किसी देश की सीमाओं को मानती है और न किसी देश विशेष के कानूनों से बंधी रहती है। मुनाफा उसके लिए सर्वोपरि है और इस मुनाफे की खोज में वह आज बनाई गई सीमाओं का भी निश्चय ही भविष्य में अतिक्रमण करेगी। भारत में एकल ब्राण्ड की आड़ में भारती-वालमार्ट के गठबंधन ने जो खेल खेला है, वह तो सबके सामने है ही। फिर एफडीआई के लिए तय नियम-कायदे उसके मुनाफे के हित में कल बदले नहीं जायेंगे, इसकी गारंटी कौन देगा? आज तो इस पूंजी की जरूरत यह है कि उसे इस देश में पैर टिकाने के लिए जगह चाहिए और उसके अधिकतम मुनाफे सुनिष्चित होने चाहिए। आज उसे उन गांवों में कतई दिलचस्पी नहीं है, जहां उसे शहरों की तुलना में कम मुनाफे दिखते हैं। आज उसकी नजर 20-25 करोड़ मध्यवर्गियों के बाजार पर ही है। और यह बाजार अमेरिका के बाजार से भी बड़ा है। लेकिन निश्चीत ही वह भविष्य में पैर फैलाएगा और शहरी बाजारों को ध्वस्त करने के बाद ग्रामीण बाजार की ओर कदम बढ़ाएगा। आखिर गरीबों का यह बाजार भी कम से कम 50 खरब रुपयों का बाजार है। इसलिए समग्र रूप से चार करोड़ खुदरा व्यापारियों का भविष्य संकट में है। हम देख रहे हैं कि खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता के नाम पर हर रोज ऐसे नियम-कायदे बनाये जा रहे हैं, जिसे खुदरा व्यापारी पूरी करने की हालत में ही नहीं हैं। ठेलों में बिकने वाले गर्म समोसे सीलबंद नहीं बिक सकते, ऐसे समोसे तो केवल वालमार्ट की दुकानों पर ही मिल सकते हैं। इन मानकों की कसौटी पर कोई भी खुदरा व्यापारी खरा नहीं उतर सकता।

लेकिन दिक्कत यही है कि विदेशी पूंजी के इस खेल में वालमार्ट के साथ मिलकर इस देश का पूंजीपति भी (खुदरा व्यापारी नहीं-और खुदरा व्यापारी पूंजीपति नहीं होते।) अपने मुनाफों को खोज रहा है। आर्थिक मंदी के दौर में उसे अपने मुनाफों को सुरक्षित रखने का यही आसान उपाय दिख रहा है। इसी संदर्भ में हमारे देश की राजनैतिक पार्टियों की भूमिका को जांचा-परखा जाना चाहिए।

जब कांग्रेस विपक्ष में थी, तो वह एफडीआई के खिलाफ थी और भाजपा इसके पक्ष में। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में खुदरा व्यापार में एफडीआई लाने का वादा किया था। आज कांग्रेस सत्तारूढ़ है और एफडीआई के पक्ष में, जबकि भाजपा विपक्ष में है और एफडीआई के खिलाफ। दरअसल दोनों पार्टियों में से कोई भी एफडीआई के खिलाफ नहीं है, क्योंकि दोनों पार्टियों की नीतियां विश्वीकरण और उदारीकरण आधारित आर्थिक सुधारों के पक्ष में हैं। जो भी पार्टी राज्य या केन्द्र में सत्तासीन होती है, इन्हीं नीतियों को लागू कर रही है। भाजपा द्वारा एफडीआई का विरोध तो केवल ‘दिखावा’ है- आम जनता में इन नीतियों के खिलाफ पनप रहे असंतोष को अपने पक्ष में वोटों में तब्दील करने के लिए।

वामपंथी पार्टियां ही हैं, जो एफडीआई के सतत् विरोध में रहीं हैं- लेकिन एफडीआई के प्रति उनका अंधविरोध कभी नहीं रहा है। राज्यसभा में बहस के दौरान माकपा नेता सीताराम येचुरी ने स्पष्ट किया कि खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के खिलाफ वे क्यों हैं? उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी एफडीआई से तीन शर्तें पूरी करवाना चाहती है- 1. उत्पादक शक्ति का विकास हो, 2. रोजगार बढ़े और 3. नई आधुनिक तकनीक हमारे देष में आये। खुदरा क्षेत्र में एफडीआई ये तीनों शर्तें पूरी नहीं करती। वास्तव में क्या हमारे देश में इस संसाधन और तकनीक नहीं हैं कि हम अच्छी सड़कों और गोदामों का निर्माण भी नहीं कर सकते और इसके लिए हमें विदेशी पूंजी की जरूरत है? यह पूंजी रोजगार बढ़ाने की बात तो दूर, रहे-सहे रोजगार को भी खत्म करने जा रही है।

क्षेत्रीय दलों का ढुलमुलपन अब पूरी तरह से उजागर हो गया है। सत्ता पर कांग्रेस की इजारेदारी को तोड़ते हुए इन क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ था। तब ऐसा माना गया था कि यह क्षेत्रीय दल अपने प्रदेश की जनता की आशा-आकांक्षाओं का, उनकी जरूरतों और हितों का प्रतिनिधित्व करेंगे। राजीव युग के अवसान के बाद गठबंधन की जो राजनीति उभरी और गठबंधन सरकारों का उदय हुआ, उसमें इन क्षेत्रीय दलों की महत्वपूर्ण भूमिका बनी और तब ऐसा लगने लगा था कि राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय हितों का ये पार्टियां प्रतिनिधित्व करेंगी। लेकिन कालान्तर में हमारा अनुभव यही रहा कि भ्रष्टाचार और वंशवाद की जिन बीमारियों से कांग्रेस ग्रस्त है, ये पार्टियां भी कमोबेश इन्हीं बीमारियों से ग्रस्त है। नतीजन इन पार्टियों के नेताओं की राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाने की महत्वकांक्षा में तो कोई कमी नहीं आई, लेकिन न तो प्रदेश की आम जनता के हितों का और न ही राष्ट्रीय हितों का उन्होंने ख्याल रखा। नतीजन इन दलों के नेताओं के व्यक्तिगत हितों का पोषण, राज्य की सत्ताओं पर कब्जा और इस हेतु केन्द्र की राजनीति को साधना ही इन दलों की नीति रह गई। ऐसा हमने लगातार देखा है- चंद्रबाबू नायडू द्वारा संयुक्त मोर्चा को तोड़कर भाजपा के सांप्रदायिक गठबंधन में शामिल होना, राष्ट्रपति पद के चुनाव में मुलायम सिंह द्वारा वामपंथ को गच्चा देकर एनडीए को समर्थन करना, परमाणु करार विवाद के समय भी मुलायम का संप्रग को साथ देना और अब मुलायम-माया -करूणानिधि की जोड़ी का एफडीआई के समर्थन में वोट देना।

भारत की राजनीति में वामपंथ की ताकत और उसकी संसदीय ताकत से नहीं, उसके जनाधार से नापी जाती है। आम मेहनतकशों की नजर में वामपंथ एक विश्वसनीय ताकत है, जो संसद के अंदर और संसद के बाहर उसके हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं ने वामपंथ की इसी विश्वसनीयता का उपयोग अपनी साख और राजनैतिक प्रतिष्ठा के लिए किया है। वरना इस बात की कैसे व्याख्या की जा सकती है कि सांप्रदायिक भाजपा को केन्द्र की सत्ता से दूर रखने के लिए जो संयुक्त मोर्चा बना था, उस मोर्चे के ही अध्यक्ष रातों-रात भाजपाई गठबंधन के साथ हो लिए? जो मुलायम एफडीआई के खिलाफ वामपंथ द्वारा आहूत आम हड़ताल में जोर-शोर से शामिल होते हैं, वही मुलायम संसद में एफडीआई के खिलाफ गर्जन-तर्जन तो करते हैं और मतदान के समय सरकार के पक्ष में पलटी मार देते हैं? जो बसपा लोकसभा में एफडीआई के खिलाफ बोलती है, वही बसपा राज्यसभा में मायावती के नेतृत्व में एफडीआई के पक्ष में मत देती है। आखिर इन पार्टियों और नेताओं के ऐसे रवैये की कैसे व्याख्या की जाये?

एफडीआई पर मतदान का सवाल सरकार के टिकने-गिरने से भी जुड़ा हुआ नहीं था और न ही भाजपा के पक्ष में दिखने से, जैसे की ये पार्टियां प्रचारित करना चाह रही हैं। यह मतदान तो सरकार के एक विशुद्ध कार्यकारी फैसले को पलटने से जुड़ा था, जो वास्तव में नीतियों और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा मामला है। दरअसल ये पार्टियां एक ऐसे संतुलनकारी सर्कस में लगी हैं, जो हास्यास्पद भले ही लगता हो, लेकिन है खतरनाक। ये एक साथ आम जनता के वोटों और पूंजीपतियों के हितों को साधने में लगे हैं। इससे पूंजीवादी लोकतंत्र की सीमायें भी स्पष्ट होती जा रही हैं, जिसमें संसद आम जनता की आशा-आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने के बजाय केवल ‘बहुमत के जुगाड़’ के अखाड़े में तब्दील होकर रह गई है। विधायी वोटों का बहुमत एफडीआई के पक्ष में हो तथा संसद की भावना और आम जनता का बहुमत एफडीआई के खिलाफ हो, तो ऐसी स्थिति कब तक झेली जा सकती है? एफडीआई पर सरकार की संसदीय जीत उसकी नैतिक पराजय का भी द्योतक है। सवाल यह भी है कि विदेशी वित्तीय पूंजी और पूंजीपतियों के हितों को साधने वाली पार्टियां आने वाले चुनावों में आम जनता को कितना साध पायेंगी? लेकिन यह स्पष्ट है कि एफडीआई के खिलाफ संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि शुरू हुआ है।

 

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1 Comment on "एफडीआई: संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है…….."

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आर. सिंह
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प्रवक्ता के इस अंक में ऍफ़ डी आई पर तीन आलेख प्रकाशित हुए हैं पहले दो लेखों के लेखकों से मैंने एक प्रश्न पूछा है।चूंकि एक आम उपभोक्ता होने के नाते वह प्रश्न मेरे लिए सर्वोपरि है,अतः उस प्रश्न को यहाँ भी दुहराने की गुस्ताखी कररहा हूँ।।अगर लेखकों और प्रवक्ता के पाठकों को बुरा लगे तो उसके लिए माफी चाहता हूँ। प्रश्न केवल यह है, संजय पराते जी , केवल एक प्रश्न.वालमार्ट ने तो भारत के बाजार में प्रवेश पाने के लिए १२५ करोड़ रूपये खर्च किये.क्या आप बता सकते हैं कि हमारे भारतीय और खुदरा व्यापारी घटिया और मिलावटी… Read more »
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