लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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डॉ. दीपक आचार्य

परायी सामग्री देती है परायेपन का अहसास

जो अपना है वही दे सकता है अपनेपन का अहसास। जो पराया है उसे अपनाने पर जीवन के हर क्षण में परायेपन का अहसास होता है। यहाँ बात किसी व्यक्ति के बारे में नहीं बल्कि सामग्री के बारे में की जा रही है।

पुरुषार्थ से प्राप्त की गई सामग्री का उपयोग आनंद भी देता है और संतोष भी। यहाँ पुरुषार्थ से तात्पर्य किसी दूसरे की वस्तु को अधिकारपूर्वक अपनाने से नहीं बल्कि पुरुषार्थ का मतलब है अपनी खुद की मेहनत से होने वाली प्राप्ति।

पर आजकल हर कहीं ऐसे-ऐसे लोगों का बाहुल्य होता जा रहा है जिनका एकमेव सामग्री का अपने हक में संग्रहण रह गया है। फिर चाहे वह सामग्रंी किसी व्यक्ति की हो या दफ्तर अथवा प्रतिष्ठानों की।

बिना कुछ किए धराए परायी सामग्री को अपने लिए इस्तेमाल करने की मनोवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। जो परायी सामग्री को हथिया कर ज्यादा से ज्यादा माल अपने यहां जमा कर ले, उसे माना जा रहा है जमाने का सिकंदर। ऐसे लोग खुद भी लाभ पाते हैं और अपने आकाओं को भी खुश कर लेने का माद्दा रखते हैं।

एक जमाना था जब अपने यहां ऐसे लोगों को तिरस्कार का सामना करना पड़ता था जो परायी सामग्री को अपने यहाँ ले आते थे। पूरे समाज में ऐसे लोगों को हीन दृष्टि से देखा जाता था। पर आज, इसका ठीक उल्टा होता जा रहा है।

फैशनपरस्ती और दिखावे की आँधी ने सारे मूल्यों और नैतिक आदर्शों को धूल धूसरित कर रखा है। अब ऐसे लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है जो ‘राम नाम जपना-पराया माल अपना’ अथवा ‘ मेरा है वो तो मेरा है ही, बाकी है वो तेरा-मेरा दोनों का’ की तर्ज पर जिन्दगी जी रहे हैं।

ऐसे लोगों का यह स्वभाव ही है जो उन्हें हर दृष्टि से पराया बना डालता है। इनके काम में आने वाली हर वस्तु वे परायी ही चाहते हैं। पराये संसाधनों और उपकरणों में इनके लिए जरूरी परिधानों व आभूषणों से लेकर वह हर चीज आ जाती है जिसका उपयोग करने में ये प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

परायी सामग्री पर मौज-शौक करने वाले लोगों में कितनों के घरों में अपने ऑफिस या व्यवसायिक स्थलों की सामग्री का भरमार होता है। ये सामग्री किसी भी स्वरूप में हो, है तो परायी ही। इनका इस्तेमाल कार्यस्थल के लिए होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं करते हुए जो लोग इस प्रकार की सामग्री का इस्तेमाल अपने घर पर करते हैं वे जीवन की पूर्णता और आनंद को प्राप्त नहीं कर सकते।

ऐसे सभी लोगों को देखने पर पता चलता है कि इनका जीवन कई समस्याओं से भरा हुआ रहता है। इसी प्रकार जो लोग दहेज के आदी होते हैं और ससुराल की सामग्री का उपयोग करते हैं वे भी इस दोष से बच नहीं सकते।

रोजाना नींद से जगने से लेकर रात को आँखें मूँदने तक ये रोजाना उन्हीं वस्तुओं को देखते रहते हैं जो उनकी नहीं बल्कि परायी हैं। दिन-रात निरन्तर जब भी परायी वस्तुएं दिखती रहती हैं तब इनके मूल स्वामियों और दाताओं के भी चेहरे सामने आते रहते हैं।

इन्हीं वस्तुओं में उन लोगों के चेहरे भी नज़र आते हैं जिन्होंने ये वस्तुएं दी हैं अथवा जिन लोगों को दबाव या प्रलोभन आदि में डालकर ले ली गई हैं। कई प्रकार की सामग्री उन लोगों से प्राप्त होती है जिनका हम से किसी न किसी प्रकार का लेन-देन का रिश्ता होता है और उनके किसी काम की एवज में प्राप्त होती है।

बहुत कम मौके ऐसे होते हैं जब कोई व्यक्ति हमें बिना किसी स्वार्थ के कोई वस्तु या उपहार प्रदान करे। ऐसा अपवाद ही हो सकता है। अन्यथा कोई भी व्यक्ति दूसरों को कोई वस्तु तभी प्रदान करता है जब उसका कोई स्वार्थ हो। ऐसे में दूषित भावों के साथ तथा भीतरी खिन्नता के क्षणों में प्राप्त होने वाली वस्तु हमेशा दुःख ही देती है।

इस प्रकार की परायी सामग्री अपने साथ कई प्रकार के दोष लेकर आती है। इस प्रकार की सामग्री में दाता के खराब ग्रहों का असर तो होता ही है, उसकी कमायी पापराशि का पाप भी शामिल होता है। इस प्रकार की दूषित वस्तुओं के मुफ्त में हमारे घर आने पर हमें प्रसन्नता भले ही हो, लेकिन अनचाहे ही हम ऐसी कई समस्याओं को अपने घर निमंत्रित कर लेते हैं जिनका निवारण सहज नहीं है।

इस प्रकार की सामग्री चाहे-अनचाहे देने वाले लोग ऐसे में कई समस्याएं आपको सौंप कर खुद मुक्त हो जाते हैं। परायी सामग्री से घर को सजाने और समृद्ध बनाने वाले लोगों के लिए एक समय ऐसा आ जाता है जब उनके अपने भी पराये लगने लगते हैं और संबंधों की भीड़ में वे नितान्त अकेले रह जाते हैं। ऐसे समय उनके द्वारा इकट्ठी की गई परायी सामग्री ही उनके साथ होती है लेकिन वह उन्हें कोई सहयोग कर पाने की स्थिति में नहीं होती क्योंकि उनमें जान नहीं होती।

यह जड़ता प्रायःतर जीवन के अंतिम क्षणों में देखने को मिलती है। ख़ासकर सरकारी क्षेत्र के लोगों में यह स्थिति ज्यादा दृष्टिगत होती है। ऐसे लोगों के सम्पर्क में आने वाले लोगों को भी इनके इस दोष का संक्रमण होने लगता है। कई बार हमारे जीवन की कठिनतम समस्याओं का एक कारण यह संक्रमण दोष भी होता है।

जीवन को शुचिता और परिशुद्धता प्रदान करने के लिए इस प्रकार की सामग्री का प्रयोग वर्जित होना चाहिए। इस एकमात्र उपाय से ही हम जीवन को सुन्दर और निर्बाध बना सकते हैं।

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