लेखक परिचय

सुनील अमर

सुनील अमर

लगभग 20 साल तक कई पत्र-पत्रिकाओं में नौकरी करने के बाद पिछले कुछ वर्षों से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन| कृषि, शिक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा महिला सशक्तिकरण व राजनीतिक विश्लेषण जैसे विषयों से लगाव|लोकमत, राष्ट्रीय सहारा, हरिभूमि, स्वतंत्र वार्ता, इकोनोमिक टाईम्स,ट्रिब्यून,जनमोर्चा जैसे कई अख़बारों व पत्रिकाओं तथा दो फीचर एजेंसियों के लिए नियमित लेखन| दूरदर्शन और आकाशवाणी पर भी वार्ताएं प्रसारित|

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 सुनील अमर 

इसे हिन्दी की बढ़ती लोकप्रियता कहें या मादरे-वतन का कर्ज, देश का एक नौजवान अंग्रेजी लेखक अपनी ताजा पुस्तक को हिन्दी में लिख रहा है! इस लेखक को देवनागरी लिपि नहीं आती फिर भी जुनून है कि इंटरनेट पर गूगल ट्रांसलिट्रेशन की मदद से वे रोमन लिपि से हिन्दी बना लेते हैं। वे कहते हैं कि हिन्दी मे लिखकर सुकून मिल रहा है।

अपनी पहली पुस्तक ‘हिटलर इन लव विथ मैडोना’ लिखकर विवाद व चर्चा में आये युवा अंग्रेजी लेखक फ्रैंक हुजूर ने यद्यपि हाल के वर्षों में दो और किताबें – इमरान वर्सेस इमरान तथा इमरान खान-द फाइटर लिखी है लेकिन उनका लेखक मन अपने देश और अपनी मिट्टी यानी हिन्दी भाषा में लगा हुआ है। यही कारण है कि फ्रैंक अपनी ताजा पुस्तक को हिन्दी में लिख रहे हैं और यह एक नयी बात है। देश में और भी बहुत से अंग्रेजी लेखक हैं लेकिन वे सिर्फ अंग्रेजी में ही लिखते हैं। फ्रैंक इसी पुस्तक की तैयारी में इन दिनों लंदन में हैं। पिछले दिनों जब वे लखनऊ में थे तो उन्होंने बताया कि उनकी नयी पुस्तक ‘इमरान खान-द फाइटर’ पूरी तरह से ई-बुक है मतलब यह प्रिंट में नहीं है और सिर्फ इ्रंटरनेट पर ही उपलब्ध है। फ्रैंक के अनुसार यह देश का पहल ई-नावेल है। उन्होंने बताया कि किताबों के इंटरनेट संस्करण तो होते हैं लेकिन इमरान खान-द फाइटर का एक ही संस्करण है और वह इंटरनेट संस्करण है।

मूलरुप से पटना के निवासी मनोज खान उर्फ फ्रैंक हुजूर ने पाकिस्तान के मशहूर क्रिकेटर रहे इमरान खान पर आत्मकथात्मक उपन्यास लिखकर दोनों मुल्कों-हिन्दुस्तान व पाकिस्तान में चर्चा बटोरी थी। यह किताब अंग्रेजी व उर्दू में हिन्दुस्तान, पाकिस्तान व लंदन मे बुक स्टालों पर है तथा इसका हिन्दी संस्करण भी भारतीय बाजारो में जल्द ही आने वाला है। सभी जानते हैं कि इमरान खान क्रिकेट से सन्यास लेने के बाद ‘तहरीक-ए-इंसाफ’ पार्टी बनाकर पाकिस्तान की राजनीति में उतरे। ऐसे में इस पुस्तक का राजनीतिक महत्त्व भी है। फ्रैंक इन दिनों लंदन में हैं और वहाँ के जगत प्रसिद्ध ‘सोहो’ पर एक उपन्यास लिख रहे हैं जो कि हिन्दी में होगा। सोहो, लंदन में एक ऐसा शहर है जो पिछले 200 वर्षों से अपनी सेक्स-इंडस्ट्री को लेकर चर्चित रहा है। इसी सेक्स इंडस्ट्री की अन्तर्कथा को वे कागज पर उतारना चाह रहे हैं। जानना दिलचस्प होगा कि सारी दुनिया को लोकतंत्र सरीखी खुली शासन व्यवस्था देने वाले ब्रिटेन ने सेक्स जैसी सामाजिक वर्जना को भी न सिर्फ खुलापन दिया बल्कि सोहो जैसे स्थानों की मार्फत इसके व्यवसायीकरण को सामाजिक व कानूनी जामा भी पहनाया। दुनिया की सबसे चर्चित (या यूँ कहें कि कुख्यात!) पोर्न स्टूडियोज यहीं पर हैं और यह सब लोकतंत्र की अम्मा कही जाने वाली ब्रिटिश संसद से जरा सा ही फासले पर है!

यह पूछने पर कि देश-दुनिया की इतनी ज्वलंत समस्याओं के बावजूद सोहो जैसे विषय पर लिखने की क्या आवश्यकता थी, फ्रैंक ने कहा कि इस सेक्स इंड़स्ट्री को लेकर बहुत सी भ्रांतियां व्याप्त हैं जबकि यह भी एक आर्ट है और इससे लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। वे कहते हैं कि इस उपन्यास की भाषा को उन्होंने हिन्दुस्तानी यानी कि हमारी बोलचाल मे जो उर्दू मिश्रित हिन्दी बोली जाती है, रखा है ताकि आम आदमी भी इसे पढ़ व समझ सके। फ्रैंक ने लंदन में एक प्रकाशन संस्था भी शुरु की है जो एशिया, खासकर भारतीय उपमहाद्वीप के लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए है।

यह भले ही बाजार की जरुरत हो, लेकिन हिन्दी अब वहाँ भी अपने पैर जमा रही है जहां कभी इसके पहुँचने की कल्पना भी नहीं की गई थी।

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