लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्वर चतुर्वेदी

स्त्री अपने शरीर के बारे में समझ बनाने के बाद ही उसे अस्वीकार या खारिज कर सकती है। इसके बाद ही सही रूप में लिख सकती है। पितृसत्ता और लिंगभेदीय संस्कृति की समाप्ति के बारे में लिखकर ही अर्थपूर्ण लेखन कर सकती है। दमन के बिना स्त्री की कल्पनाशीलता कभी खत्म नहीं होती, जैसे संगीत, पेंटिंग, लेखन। उसकी सृजनात्मक क्षमता अनंत है। जहां तक स्त्री के पास अपनी जगह है, बाहरी ज गतउसकी कमरे की जिन्दगी को अस्त-व्यस्त नहीं करता वह दमन की अवस्था में भी लिख सकती है।

वर्जीनिया वुल्फ और हेलिनी सिकसाउस दोनों ने इतिहास में स्त्री लेखन के अभाव पर गहरी चिन्ता व्यक्त की है। वुल्फ ने पुरानी लेखिकाओं के लेखन के अभाव की बात करते हुए आज की लेखिका की लेखन शैली के मूल्यांकन का उसे आधार बनाया है। सिकसाउस ने कहा कि हमें समाज की लाखों परतों को उघाडना है। मैं उनकी पुनरावृत्ति नहीं करना चाहती। ”स्त्री को अपने को पाठ में पेश करना चाहिए। इस संसार और इतिहास में पेश करना चाहिए।” स्त्री लेखन का लंबे समय से जो अभाव बना रहा है, उस चुप्पी को तोड़ने के लिए स्त्री का लिखना बेहद जरूरी है।

सिकसाउस ने लिखा ” मैं जानती हूँ कि तुमने अब तक क्यों नहीं लिखा, क्योंकि लेखन को महान कार्य माना जाता था, तुम्हारे लिए तो यह बड़ी बात ही थी। यह कार्य महान लोगों के लिए सुरक्षित रखा गया था, वे थे महान् पुरूष।”

वुल्फ और हेलिनी दोनों ने ही मर्द द्वारा स्त्री के दमन के बारे में लिखा कि दमन के कारण कैसे औरत नहीं लिख पायी। खासकर हेलिनी ने इस पहलू पर अनेक मर्तबा रोशनी डाली, जबकि वुल्फ ने चलताऊ ढ़ंग से इसकी चर्चा की है। खासकर विश्वविद्यालयों में जहां औरत का लॉन में अकेले चलना मना था, लाइब्रेरी में अकेले जाना मना था, औरत लाइब्रेरी में प्रवेश तब ही कर सकती थी जब उसके साथ कोई मर्द स्कॉलर होता था।

इसके विपरीत सिकसाउस का मानना था कि ” मेरा संघर्ष अपरिहार्यत: परंपरावादी मर्द के खिलाफ है।” दोनों का यह मानना था कि औरत को लिखना चाहिए। वुल्फ की नजर में स्त्री को बदलाव के लिए ही नहीं बल्कि अपने निहित स्वार्थी लक्ष्य के लिए भी लिखना चाहिए। वह चाहती थी कि स्त्री का लिखा पढूँ।

सिकसाउस ने लिखा स्त्री को अपने शरीर को हासिल करने के लिए लिखना चाहिए। शरीर के माध्यम से लिखना चाहिए। ” लेखन तुम्हारे लिए है, तुम स्वयं के लिए हो, तुम्हारा शरीर तुम्हारा है, तुम इसे लो।” दोनों इस बात पर एकमत थीं कि स्त्री और पुरूष के लेखन की शैली भिन्न होती है। वुल्फ ने लिखा मर्द का लिखा पढ़ने से ताजगी मिलती है, उसमें जो दृश्य निर्मित किया जाता है उसमें ‘मैं’ अन्तर्निहित होता है।” सिकसाउस ने लिखा कि ” मैं औरत के लिए लिखती हूँ। औरत औरत के लिए लिखे।मर्द, मर्द के लिए लिखे।”

सिकसाउस ने लिखा मैं अपने विचारों के बारे में कुल मिलाकर यह कह सकती हूँ कि दैनन्दिन जीवन में ‘सच’ को पकडे रहना चाहिए। जब कोई लिखता है, तो हमेशा सच का सामना करता है, मैं सच कहती हूँ, मैं ज्ञान की या जानकारी की बात नहीं कहती। उसका अज्ञात सत्य से मतलब होता है। जब आप समूह के लिए लिखते हैं तो अंधेरे में सत्य की तलाश करते हैं। वह नहीं जानता, वह सिर्फ चलता जाता है। मैं ऐसा ही महसूस करती हूँ और अपनी ऑंखें बंद कर लेती हूँ।अनुभूतियों पर विश्वास करती हूँ।

सिकसाउस का मानना है मैंने सब कुछ खोया, पिता, देश, मॉ, सब कुछ खोया बची रह गयी तो सिर्फ भाषा और भाषा ही मेरा राष्ट्र है। मैंने भाषा के जरिए ही अपने देश को पाया। प्रेम और मृत्यु में महायुद्ध शुरू हुआ है। जो प्यार करते हैं वे मौत के प्रति वचनबद्ध होते हैं। जो व्यक्ति प्यार करता है, प्यार में ‘गिरता’ है, प्रेम में मौत को पुकारता है। लेखन नरक से ही शुरू होता है। किसी न किसी रूप में जीवन का इतिहास पहलीबार निजी जीवन के नरक से ही शुरू होता है। लेखन किसी न किसी रूप में हृदय की गहराई से आता है। वह स्वर्ग हो या नरक। लेखन हमेशा, किसी न किसी रूप में सुरक्षित रहता है। लेखक समृद्ध व्यक्ति है, मेरे लिए यह लेखक की परीक्षा है। समृद्धि दुविधापूर्ण, खतरनाक और अनिवार्य है। समृद्धि हमेशा गरीबी के खजाने से वंचित करती है। वह खजाना जो गरीबों के पास है, यह वह उन लोगों का खजाना है जिनके पास कुछ भी नहीं है और गरीबी ही संपदा है।यह त्रासद और शानदार इच्छाओं का स्रोत है, ये इच्छाएं हमारे पास नहीं हैं जबकि हम समृद्ध हैं।हमें इस गरीबी का अनुभव हासिल करना चाहिए, वरना हम सच्ची दरिद्रता को जान नहीं पाएंगे। हम गरीबी को तब जानते हैं जब हमारे पास थोड़ा होता है।गरीबी और अमीरी के परे होते हैं। एक ही समय में प्रत्येक चीज महंगी, अनुपलब्ध, कीमती और हमारी जद के बाहर होती है।

जो लिखना नहीं जानते उनके बारे में कोई कैसे लिख सकता है? हमें यह सवाल अपने दिल से पूछना चाहिए। यह तब ही संभव है कि उन्हें बोलने दिया जाए। हमें उन्हें अपनी भाषा देनी चाहिए जिससे वे बोल सकें। मुझे नाटक ने इस मामले में मदद की है कि वे बोलें। हम कैसे सेंटिंग में बदलाव लाएं? जब व्यक्ति ऐसी अवस्था को प्राप्त कर लेता है कि वह अन्य के सामने पूरी तरह खुला होता है, तब वह व्यापक अर्थ में कहें तो अन्य की जगह हासिल कर लेता है, खासकर इतिहास में जगह प्राप्त कर लेता है। अन्य के मिलने की हमेशा संभावना रहती है। मैं हमेशा आशा करती हूँ कि अज्ञात, खोज के लिए हमारा इंतजार कर रहा है। कोई और भी है जो कहीं स्वयं के बारे में लिख रहा है।अन्य के बारे में लिखने और सोचने के बाद भी अन्य बचे रह जाते हैं। खासकर वे लोग जिन तक पहुँचना मुश्किल था और जो हमारे एकदम पास थे।

सिकसाउस ने लिखा इतिहास क्या है? यह बेहद मुश्किल सवाल है। यह सवाल हमेशा मुझे उद्वेलित करता है। आप ऐसे समय में लिख रहे हैं जब लोग मर रहे हैं, उनके भूत हमारा पीछा कर रहे हैं। वे मेरे पाठ में हैं, पाठ के साथ हैं। कुछ समय मुझे वियतनाम उद्वेलित करता रहा है, उसके बाद ग्रीस उसके बाद ईरान… मेरा पाठ उन लोगों से भरा पड़ा है जो कष्टों से गुजर रहे हैं और उनसे निकलने की कोशिश कर रहे हैं।

मेरा इतिहास क्या है? मैं कौन सा इतिहास देख रही हूँ? इतिहास और पाठ को कैसे जोड़े? मैं नहीं जानती कि मेरा इतिहास क्या है? मैं यहूदी हूँ, तो हो सकता है मेरा यहूदी इतिहास हो, मैं नहीं जानती कि उसमें मेरा इतिहास कौन सा है और कैसे है? मैं अपनी पहली प्रतिक्रिया समय के बारे में देना चाहूँगी, एक यहूदी औरत के नाते अपने को परिभाषित करना चाहूँगी, किसी को इस दौर के घोटालों के बारे में भी बोलना चाहिए। किसी को इसके कारण खोजने चाहिए। जब औरत के सवाल उठाए जाएं तो उनका जबाव जरूर दिया जाना चाहिए। खासकर जब औरत पर आरोप लगाए जाएं तो जबाव जरूर दिया जाना चाहिए। मैं हमेशा सोचती रही हूँ कि पाठ में इतिहास की काव्यात्मक प्रस्तुति हो। इतिहास का मानवीय स्वर सामने लाया जाना चाहिए। मनुष्य के भवितव्य को सामने लाना चाहिए।

मैंने वास्तव पुरूष चरित्र रचने की कोशिश नहीं की है। ऐसा क्यों? क्योंकि मैं शरीर से लिखती हूँ और मर्द तो मर्द है और मैं यह नहीं जानती कि मर्द को आनंद कैसे मिलता है। मैं शरीर और आनंद के बगैर मर्द नहीं रच सकती। फिर रगमंच में मर्द का क्या मतलब है? रंगमंच कामुक आनंद की जगह नहीं है। रोमियो और जूलियट एक-दूसरे से प्यार करते हैं। किन्तु मंच पर प्यार नहीं करते। वे वहां गाते हैं। वे सीना खोलकर गाते हैं। मनुष्य के हृदय में सेक्स नहीं होता। हृदय किसी न किसी रूप में धड़कता रहता है। मर्द के सीना है तो वह औरत के पास भी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे चरित्र अधूरे प्राणी हैं, वे कमर तक ही हैं। नहीं, हमारे प्राणियों में किसी चीज का अभाव नहीं है, न तो शिश्न का अभाव है, और न स्तन का अभाव है, न किडनी का, न ही पेट का ही अभाव है।कितु मैं इस सब पर नहीं लिखती। अभिनेता और अभिनेत्रियां मुझे पूरा शरीर देते हैं, जिसे हमें खोजने की जरूरत नहीं हैं। यहां सब कुछ जीवन्त है और सत्य है। यह रंगमंच की लेखक को सौगात है।

सिकसाउस से जब यह सवाल पूछा गया कि आपने औरत पर लिखने की बजाय कम्बोडिया पर नाटक क्यों लिखा? तो इसके जबाव में कहा कि इस सवाल का मैं सैंकडों मर्तबा जबाव दे चुकी हूँ। इसके बावजूद जब यह सवाल पूछा गया तो मैंने सोचा कि क्या बात है कि बार-बार यह सवाल पूछा जा रहा है, तब मेरे दिमाग में विचार आया कि एक नाम है ‘ओरियन’ (ओरिएण्ट) या पुरबिया। इसके बाद स्त्री का रहस्य मेरे दिमाग में कोंधा? यहां में ‘और’ या ‘गोल्ड’, ‘ओरिण्ट’ या पूर्व, कुछ समृद्ध पुरबिया। एशिया क्यो, पूर्व? क्योंकि मैं वह नहीं हूँ।चूंकि मैं में हूँ। यह पुरबिया जगत मुझसे अलग है, इसी बात की वह हमें शिक्षा देता है। मेरी भिन्नता ही मुझे भिन्नता की अनुभति देती है, चूंकि एशिया की आत्मा में धर्म है, चूंकि ये लोग दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं, चूंकि यह बचा हुआ है, चूंकि इसकी हत्या की जा रही है, चूंकि यह गरीब है, यही वजह है कि वह समृद्ध है, गोरे रंग के आने के पहले से यह काला रंग है, चूंकि इसका परा-इतिहास है, अपना अतीत और वर्तमान है।चूंकि उनके चेहरों पर मुखौटे हैं, एशिया में ऐसा सोचते हैं कि मुखौटे चेहरे की आत्मा हैं, अन्य शब्दों में एशियाई औरतें लगातार धीरे-धीरे नदी के किनारे चलती जा रही हैं। यह यथार्थ हजारों लोगों में देखा जा सकता है, चूंकि वहां बड़े पैमाने पर मौत हो रही हैं और बड़े पैमाने पर जीवन भी है। कम्बोडिया पर नाटक लिखने के पहले, मैं जिस कवि को सबसे ज्यादा पसंद करती हूँ क्लेरीस लिस्पेक्टर उसने कहा था ”लाइफ इज ओरिएंटल” (पूरबिया जिन्दगी) वह हमेशा कहती थी कि जिन्दगी पुरबिया है।

यहां जिन्दगी धीमी है, गुलदस्ते में सजे फूलों की तरह है, यह ऐसी कला है जो अनुपयोगी और अनिवार्य है। एशिया के लोगों में भी लोग भूखे हैं, एशिया में सब कुछ फल से शुरू होता है, अन्न को लोग संरक्षित करके रखते हैं, यहां तक कि प्रेम, लेखन और रंगमंच को भी संरक्षित करके, छिपाकर रखते हैं।

कम्बोडिया ही क्यों? सरोकार के अलावा इसमें और कीमती क्या है? वह जो कीमती है उसे प्रार्थना के जरिए बचा सकते हैं, हासिल कर सकते हैं। मैंने इस आखिरी बात पर ध्यान दिया कि कम्बोडिया के कैम्पों में क्या बचा है, वे कीमती हैं, वे जिन्दा हैं जो बांस और कनात में त्रासद रूप में जी रहे हैं, उनमें अपने घर, नाच, भूत के प्रति प्यार है, वे मौत के सम्मुखीन हैं, कानून के सामने हैं, वे देश से भागे हुए हैं, वे हल्के वजन के आदर्श नमूने हैं। मैंने अपने विचारों को शरणार्थी शिविरों में रहने वालों को समर्पित कर दिया है। सिकसाउस कहती है आशा का दूसरा नाम ही लेखन है। यही हमें अपने से परे ले जाता है।

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2 Comments on "स्त्री अस्मिता और पुरबिया संस्कृति"

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kalpana
Guest

लेख अति सुन्दर हे , लेखन किसी न किसी रूप में हदय की गहराई से आता हे . मन की भावनाओ को शब्दों में संजोना ही नई सृष्टि है . लेकिन मन तो सभी के पास होता है उसको सही आकार देना यही एक चुनोती होती है ,लेखक अति संवेदनशीलता के कारण ही अपना पक्ष रख सकता है . @@@@@@@@@@

rajeevkumar905
Guest

Praiseable article.

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