लेखक परिचय

लालकृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण आडवाणी

भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उपप्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर। प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व। वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।

Posted On by &filed under राजनीति.


लालकृष्ण आडवाणी

काफी लम्बे अर्से के बाद 3 दिसम्बर, 2010 को मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया के मुखपृष्ठ पर हर्षित कर देने वाला समाचार पढ़ने को मिला। समाचार का शीर्षक है ”एस.आई.टी. क्लीयरस मोदी ऑफ विलफुल्ली एलाऊइंग पोस्ट-गोधरा रायॅट्स-फाईन्ड्स नो सबसेंटशियल इवीडेंस” (एस.आई.टी. ने मोदी को, जानबूझकर कराए गए गोधरा पश्चात् के दंगों में क्लीन चीट दी-कोई ठोस सबूत नहीं मिले)।

साठ वर्षों के मेरे राजनीतिक जीवन में नरेन्द्र मोदी को छोड़ मुझे अपने किसी अन्य सहयोगी का स्मरण नहीं आता जिसके विरुध्द इतना लगातार, इतने समय तक और इतना विषैला प्रचार उनके विरोधियों ने चलाये रखा हो। विडम्बना देखिए कि जिस समयावधि में मोदी के विरुध्द यह निंदनीय अभियान अपने चरम पर था, उसी अवधि में गुजरात के मुख्यमंत्री को भरपूर प्रशंसा और गुजरात सरकार को राज्य के चहुंमुखी विकास तथा अच्छे और ईमानदार सुशासन के संदर्भ में देश में एक मॉडल बनाने के लिए देश तथा विदेशों से बधाईयां मिलती रहीं।

श्री मोदी के विरुध्द इस दुष्ट अभियान में शामिल लोगों का हमला एक आरोप पर आधारित था। अयोध्या से लौट रही रेलगाड़ी पर गोधरा में हुए नृशंस हमले जिनमें 58 कारसेवकों की जलकर मौत हो गई के पश्चात् गुजरात के कुछ भागों में भड़के दंगो में मोदी ने दंगाइयों को जानबूझकर खुली छुट दी।

27 अप्रैल, 2009 को सर्वोच्च न्यायालय में श्रीमती जाकिया जाफरी द्वारा दायर की गई याचिका में श्री मोदी के विरुध्द प्रथम दृष्टया रिपोर्ट (एफ.आई.आर.) दर्ज करने की मांग की गई। न्यायालय ने जाफरी की शिकायत पर जांच करने के लिए सीबीआई के पूर्व निदेशक आर.के.राघवन के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (एस.आई.टी.) गठित किया।

श्री मोदी के विरुध्द श्रीमती जाफरी के आरोप इस तरह हैं : ”राज्य के संवैधानिक निर्वाचित मुखिया जोकि बगैर जातीय, समुदाय और लिंग का भेदभाव किए सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों, जीवन और सम्पत्ति के अधिकारों के लिए जिम्मेदार हैं, वे ही संवैधानिक शासन और कानून के शासन को पलीता लगाने वाले अपराधिक षडयंत्र, कत्लेआम के दौरान गैर कानूनी और अवैधानिक व्यवहार को बढ़ावा देने तथा तत्पश्चात् प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से दंगों के आरोपियों और अपराध में शामिल लोगों को संरक्षण देने के आरोपी हैं।”

राघवन की टीम ने लगभग बीस महीने तक इन आरोपों की जांच की। जांच के दौरान एस.आई.टी. ने नरेन्द्र मोदी से व्यक्तिगत रुप से पूछताछ की और गत् सप्ताह के शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

द टाइम्स ऑफ इंडिया और अन्य समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया है कि एस.आई.टी. को आरोपों की पुष्टि के संदर्भ में कोई साक्ष्य नहीं मिला और उसने गुजरात के मुख्यमंत्री को इससे मुक्त कर दिया है। समूचा देश सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी गई एस.आई.टी. की पूरी रिपोर्ट की व्याकुलता से प्रतीक्षा कर रहा है।

***

1977 के लोकसभाई चुनावों के नतीजे उन्नीस महीने के आपातकाल के परिप्रेक्ष्य में हुए थे, जिससे लोकतंत्र की फिर से वापसी पर देश ने राहत की सांस ली थी। उस समय हम जो चुनाव अभियान में शामिल थे, कांग्रेस पार्टी के विरुध्द मतदाताओं के गुस्से को आसानी से भांप सकते थे।

इसलिए जब मतगणना शुरु हुई और नतीजे घोषित हुए तो किसी को भी कांग्रेस पार्टी के हार जाने का आश्चर्य नहीं हुआ। परन्तु हार की व्यापकता, विशेष रुप से उत्तर भारत में सभी के लिए हैरतअंगेज थी- कांग्रेस और विपक्ष के लिए भी। कांग्रेस पार्टी के लिए यह नतीजे सुन्न कर देने वाले थे। सिर्फ इसलिए नहीं कि कांग्रेस पार्टी केन्द्रीय सत्ता से पहली बाहर हुई थी अपितु इसलिए भी कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, और दिल्ली जैसे अनेक महत्वपूर्ण प्रदेशों में कांग्रेस लोक सभा की एक सीट भी नहीं जीत पाई।

इसी प्रकार पिछले सप्ताह जब नीतिश कुमार के नेतृत्व में जनता दल (युनाइटेड)- भारतीय जनता पार्टी गठबंधन बिहार विधानसभाई चुनावों में शानदार ढंग से विजयी हुआ तो किसी को भी आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन आश्चर्यजनक यह था कि एनडीए गठबंधन को जीत के बारे में सर्वाधिक आशावादी अनुमान यह था कि यह दो-तिहाई बहुमत (नई दिल्ली के एक वरिष्ठ संपादक शेखर गुप्ता जो चुनाव के अंतिम चरण से पूर्व राज्य के दौरे पर गई उच्चस्तरीय पत्रकार टीम के अंग थे ने मुझे यही बताया था) प्राप्त करेगा, परन्तु अंतिम परिणाम आते-आते नितीश कुमार – सुशील मोदी की टीम ने 243 में से 216 सीटे जीत लीं यानी कि विधानसभा की कुल संख्या का 8/9 वां!

मै मानता हूं कि पिछले पांच वर्षों में नीतिश कुमार के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन को सुशासन और विकास कार्यो के चलते पुन: जनादेश मिला। जनता दल (युनाइटेड) द्वारा लड़ी गई 141 में से 115 और भाजपा द्वारा लड़ी गई 102 मे से 91सीटें जीतने जैसी इस अप्रत्याशित विजय-का असली कारण पूर्व के 15 वर्षों का जंगलराज है। चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस प्रवक्ता इन 15 वर्षों के लिए लालू और राष्ट्रीय जनता दल को कोसते रहे परन्तु तथ्य यह है कि इस अवधि में काफी समय तक कांग्रेस भी राष्ट्रीय जनता दल की बराबर साझेदार थी। लोगों द्वारा राजद- कांग्रेस शासन और जद(यू) -भाजपा शासन के बीच वास्तविक तुलनात्मक अनुभव था जिसने एनडीए को यह शानदार प्रचंड विजय दिलाई।

Leave a Reply

4 Comments on "गुजरात और बिहार के बारे में हर्षदायक समाचार"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
sachin
Guest

कांग्रेस को कुछ हिन्दू लोग अभी भी वोट क्यों देते हैं जबकि प्रधानमंत्री ने साफ कहा की इस देश के संसाधनों पे पहला हक मुसलमानों का है उसके बाद भी मूर्ख उन्हें ही वोट करते हैं. इस देश को इस्लामिस्तान बनाने से बचाना है तो मोदी और आदित्यनाथ जैसे नेताओं को ही आगे करना होगा वरना लोकतांत्रिक तरीके से मुस्लिम राष्ट्र हो जाएगा ये देश.

dr.arun srivastava.py jaipur
Guest
dr.arun srivastava.py jaipur

apka lekh sarahaniya hain.arun

डॉ. राजेश कपूर
Guest
खास और महत्व पूर्ण यह भी है कि—————— * भ्रष्टाचार का मर चुका मुद्दा बड़े शक्तिशाली ढंग से जीवित हो गया है. पतित, गुंडागर्दी की राजनीति करने वालों की जो दुर्दशा हुई है, करोड़ों के मन को उससे ठडक मिली है और लोकतंत्र में समाप्त होती आस्था का बचाव हुआ है. * चारों ओर फैले निराशा के घनघोर अन्धकार में बिहार ने आशा का संचार किया है. मानो वर्षों की सुखी-बंजर धरती पर वर्षा की जीवन दाई फुहार पडी हो. ** एक सशक्त सन्देश बिहार से आया है कि अगर भारत के सबसे अधिक भ्रष्ट समझे जाने वाले प्रदेश में… Read more »
Rajeev Dubey
Guest

इन दोनों ही राज्यों में आपकी सरकारों के अच्छे कार्य के अलावा एक अति महत्वपूर्ण बात नेतृत्व के द्वारा सामान्य जन के प्रति संवेदनशील होना एवं संपर्क में रहना था . यही कारण था कि कांग्रेस के अथक विरोधी एवं वैमनस्य पूर्ण प्रयास के बाद भी आपकी सरकारें चलती रहीं और पुनर्निर्वाचित हुईं . सुशासन एवं प्रगति आपकी केंद्र सरकार के समय भी थी. परन्तु जनसंपर्क का अभाव था . यदि उत्तर प्रदेश और केंद्र में आपकी सरकारों को वापस लाना है तो यह व्यापक जनसंपर्क कार्यक्रम अतिशीघ्र आरम्भ करना होगा ….

wpDiscuz