लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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प्रख्यात आलोचक डॉ0 प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा कि जिस भाषा के पास अच्छे आलोचक नहीं होते उस भाषा का विकास संभव नहीं हो पाता। हिन्दी के पास आलोचना की लम्बी परम्परा रही है। लेकिन आज कुछ लोग यह शिकायत करते हैं कि अच्छी आलोचना और नाटक नहीं लिखे जा रहे। मेरा मानना है कि जब हम किसी चीज को पढ़ना छोड़ देते हैं तो यह समस्या पैदा होती है। आज हमारे पास पुरानी पीढ़ी से लेकर युवा पीढ़ी तक के आलोचक शामिल हैं। श्रोत्रिय ने कहा कि अच्छी रचना आलोचक को खुद अपने पास बुलाती है। यह बात उन्होंने शिमला के बचत भवन में जानेमाने कवि-आलोचक श्रीनिवास श्रीकांत की आलोचना पुस्तक ‘गल्प के रंग‘ का लोकार्पण करते हुए कही। यह आयोजन 6 अगस्त को किया गया।

डा0 श्रोत्रिय ने कहा कि पहले साहित्य का विकेन्द्रीयकरण था जिससे पटना, इलाहाबाद, भोपाल, मुम्बई, लखनऊ और शिमला जैसे शहर साहित्य के केन्द्र हुआ करते थे। इनमें साहित्य के बड़े आयोजन होते थे और बड़ी संख्या में लेखक जुट़ते थे। अच्छी रचनाएं बाहर आती थीं जिससे उसकी खूब चर्चा भी होती थी। लेकिन दिल्ली जैसे महानगर को जबसे साहित्य का गढ़ बना दिया गया तभी से हिन्दी साहित्य का नुकसान होना शुरू हो गया।

डॉ0 श्रोत्रिय ने श्रीनिवास श्रीकांत की आलोचना पुस्तक पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि श्री निवास मूलतः कवि हैं लेकिन इस पुस्तक के माध्यम् से उनका श्रेष्ठ मर्मज्ञ आलोचक सामने आया है जिससे उनकी आलोचना दृष्टि की ऊंचाई का पता चलता है। श्रीनिवास श्रीकांत ने पुस्तक में 15 आलोचना निबन्ध लिखें हैं जिसमें हिन्दी के ग्यारह लेखक, मराठी के दो और जर्मन के गुण्टर ग्रास हैं। उन्होंने पुस्तक में संग्रहीत निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, मृदुला गर्ग, केशव और हरनोट की पुस्तकों पर लिखे आलोचना लेखों के साथ गुण्टर ग्रास पर लिखे आलेख को सबसे श्रेष्ठ आलोचना लेख बताया। उन्होंने कहा कि पुस्तक में संग्रहीत अन्य लेख भी आलोचना की दृष्टि से अच्छे बन पडे हैं।

कार्यक्रम का शुभारम्भ एस आर हरनोट ने श्रीनिवास श्रीकांत की कविताओं से किया और कहा कि श्रीनिवास श्रीकांत के रचनाकर्मी जीवन में दो लम्बे अन्तराल है। एक 1954 और 1970 के बीच और दूसरा सहत्तर के मध्य से नई सदी के लगभग मध्य तक, जब वे न अपना कुछ प्रकाशित करवा पाए और न इतनी चर्चा में ही रहे। 2007 में एकाएक ’बात करती है हवा‘, 2008 में ‘घर एक यात्रा है‘ और 2010 में ‘हर तरफ समंदर है‘ और ‘कथा में पहाड़‘ से ये पुनः अपनी शीत निद्रा से अकस्मात जागे हैं और श्रीश्री जी ने समकालीन कविता में ही नहीं, समकालीन रचनात्मक आलोचना में भी अपनी एक विशिष्ठ पहचान बना कर हिन्दी के समकालीन लेखक वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया है। ‘कथा में पहाड़‘ लगभग 40 महत्वपूर्ण कथाकारों की कहानियों को टिप्पणियों के साथ पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत करना आसान काम नहीं था।

वरिष्ठ आलोचक डॉ0 हेमराज कौशिक ने श्रीनिवास श्रीकांत के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला और उनकी आलोचना दृष्टि पर ‘गल्प के रंग‘ के संदर्भ में विस्तार से बात की। प्रसिद्ध कथाकार केशव नारायण ने कहा कि श्रीनिवास श्रीकांत की कविताओं की रेंज बहुत व्यापक है। ससीम से असीम तक। वह यथार्थ को अपने परिवेश से उठकार सर्वव्यापी बनाते हैं उससे लगातार सवाल करते हुए। हम इसे मामूली यथार्थ से किन्हीं खास मनःस्थितियों में अति विशिष्ठ की ओर उन्मुख होना भी कह सकते हैं। यानि मूर्त से अमूर्त की ओर। उस अमूर्त को रूप देने की गहरी इच्छा से ओतप्रोत।

युवा कवि-आलोचक आत्मा रंजन ने कहा कि श्रीनिवास श्रीकांत का कवि कालातीत विषयों पर कविताएं लिखते हुए भी अपने समय की बड़ी चिन्ताओं के प्रति सजग रहता है। वह पर्यावरण चेतना से भी आगे पारिस्थितिकी के असंतुलन जैसे बड़े सामयिक प्रश्नों की पड़ताल करता हुआ इसके मूल में तमाम तरह के अतिक्रमण का प्रतिरोध सूक्ष्म और सशक्त ढंग से रचता है। कवि का बिम्ब विधान अद्भुत है। चित्रकला और संगीत जैसी अन्य कला-विधाओं को कवि अपनी काव्य भाषा में टूल की तरह इस्तेमाल करता है।

इस अवसर पर चर्चित युवा कवि सुरेश सेन निशांत ने श्री कांत पर लिखी कविता सुनाते हुए कहा कि ‘उम्र के उस मुकाम पर/जब सब आराम करने की सोचते हैं/तो वह देवदार वृक्ष सा/निहारे जा रहा है यह दृश्य।‘

नेपाली लेखक जगदीश राणा ने भी श्रीनिवास के साथ व्यतीत किए पुराने दिनों को याद किया जबकि श्री सुंदर लोहिया जो स्वयं इस आयोजन में नहीं आ पाए उनका लघु आत्मीय लेख पढ़ कर सुनाया गया। श्री लोहिया के अनुसार ‘श्रीनिवास श्रीकांत ने अपना रचनाकर्म वेश कीमती सामान की तरह समय की पोटली में बांध कर रखा और अब उसे जग जाहिर करके हमस ब को चमत्कृत कर रहे हैं।‘

वयोवृद्ध कवि और लेखक श्रीनिवास श्रीकांत ने इस अवसर पर एकल कविता पाठ भी किया और उन्होंने तरन्नुम में गीत और गजलें भी सुनाई।

मंच का सफल संचालन आत्म रंजन ने किया। इस आयोजन में शिमला व प्रदेश के विभिन्न भागों से लगभग 130 लेखक माजूद थे जिनमें सत्येन शर्मा, राम दयाल नीरज, सुदर्शन वशिष्ठ, सुशील कुमार फुल्ल, बद्री सिंह भाटिया, राजकुमार राकेश, रमेश चन्द्र शर्मा, जयवंती डिमरी, श्रीनिवास जोशी, कुल राजीव पंत आर0डी0 शर्मा, मस्त राम शर्मा, एस.शशि, मीनाक्षी पाल, राजेन्द्र राजन, ओम प्रकाश भारद्वाज, रत्न चंद निर्झन, रमेश शर्मा, खेम राज शर्मा, जगम प्रसाद शास्त्री, विशम्भर सूद, प्रमुख थे। समारोह का आयोजन हिमालय साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण मंच द्वारा किया गया।

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