लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

अनुराधा बाली उर्फ फिज़ा एक ऐसी बदनसीब महिला का नाम है जिसका जीवन प्राय:विवादों में ही घिरा रहा। जल्दी से जल्दी बड़ी से बड़ी छलांग लगाने की उसकी तमन्ना ने आखिरकार उसके व्यक्तित्व को इतना विवादित कर दिया कि मरते वक़्त भी इन विवादों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। नि:संदेह अनुराधा की जगह यदि कोई दूसरी महिला भी उन परिस्थितियों का सामना कर रही होती जिसका कि अनुराधा उर्फ फिज़ा को करना पड़ा तो शायद वह भी या तो यही रास्ता चुनती जो फिज़ा ने अपने जीवन के अंतिम समय में चुना या फिर जिन परिस्थितियों के चलते फिज़ा की यह हालत हुई उन्हें समझने,उनसे मुकाबला करने और जूझने का प्रयास करती।

परंतु फिजा ने मौत को गले लगाना ज़्यादा बेहतर समझा। इसका कारण साफ था कि एक तो यह कि वह जिन परिस्थितियों में तथा जिन सुहावने सपनों को सजाते हुए वह अनुराधा से फिजा बनी थी वह सभी सपने उसके अपने सजाए हुए थे। और दूसरे यह कि अपने इन सपनों को साकार करने के लिए जिस चंद्रमोहन को चांद मोहम्मद बनाए जाने की नाकाम कोशिश उसने की थी उसके लिए भी आख़िरकार न केवल वही दोषी ठहराई गई बल्कि उसकी यह ‘चाल’ महज़ आलोचनापूर्ण अ$फसाना बनकर रह गई। हां इस पूरे अफसोसनाक प्रकरण में इतना ज़रूर हुआ कि अनुराधा जैसी एक अनजान सी समझी जाने वाली महिला रातों-रात प्रसिद्धि के उस शिखर पर ज़रूर जा पहुंची जहां सीधे रास्ते पर चलते हुए या रचनात्मक व सकारात्मक कार्यों को अंजाम देते हुए पहुंचना आसान नहीं होता।

फिजा की मौत के प्रकरण से एक बात और पुन: साबित हो गई कि समाज में प्राय: होता वही है जोकि पुरुष प्रधान समाज चाहता है। नि:संदेह फज़ा ने चाहे हाईकोर्ट का जज बनने की लालच में या फिर चौधरी भजनलाल जैसे कद्दावर राजनीतिज्ञ परिवार की बहू बनने की इच्छा में चंद्रमोहन से अनैतिक व गैरकानूनी रूप से विवाह क्यों न किया हो या हिंदू पर्सनल लॉ की बंदिशों के चलते अपने विवाह में आने वाली कानूनी अड़चनों को दूर करने के लिए धर्म परिवर्तन करने तक का सहारा क्यों न लिया हो। परंतु इस पूरे घटनाक्रम में चंद्रमोहन को भी क्लीन चिट हरगिज़ नहीं दी जा सकती। ऊंची परवाज़ भरने की तमन्ना किसमें नहीं होती। संभव है कि कोई औरत कभी कुछ ज़्यादा ही ऊंचे सपने देखने लग जाती हो। परंतु क्या मर्द भी अपने सपनों को पूरा करने के लिए इस स्तर तक नहीं जाते? स्वयं चंद्रमोहन के ही परिवार में यदि देखा जाए तो चौधरी भजनलाल व उनके पुत्र कुलदीप बिश्रोई ने आखर कांग्रेस से अपना नाता क्यों तोड़ा? क्या कोई सैद्धांतिक या वैचारिक मतभेद थे? जी नहीं। केवल इसलिए कि भजनलाल जी को मुख्यमंत्री बनाने के बजाए सोनिया गांधी ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को हरियाणा का मुख्यमंत्री क्यों बना दिया। इसके पश्चात जब भजनलाला व कुलदीप बिश्रोई ने कांग्रेस का साथ छोड़ा तब से लेकर अब तक उस परिवार की राजनैतिक हालत भी फज़ा के जीवन के दर्दनाक अंतिम क्षणों से कोई कम हरगिज़ नहीं है। परंतु इसे पुरुष वर्ग राजनैतिक उतार-चढ़ाव कह कर परिभाषित करता है। जबकि फज़ा जैसी बदनसीब औरतों को अपनी ज़िन्दगी की इच्छाओं के पूरा न होने पर अपनी जान तक से हाथ धोना पड़ता है।

इसमें कोई शक नहीं कि फिज़ा की मौत से उन सभी लड़कियों को भी सबक लेने की ज़रूरत है जो दूसरे मर्दों के बल पर ऊंचे सपने देखने की कोशिश करती हैं तथा अंजाम की परवाह किए बिना बड़े से बड़ा कदम उठाने से नहीं हिचकिचाती। किसी शादीशुदा व बाल-बच्चों वाले परिवार रखने वाले किसी विवाहित मर्द की ओर देखना या उसे आधार बनाकर अपने उज्जवल भविष्य के सपने सजाना निश्चित रूप से गलत,अनैतिक व गैर कानूनी है। यदि फज़ा को चंद्रमोहन से लगाव था या हो गया था तो उसे चंद्रमोहन को उसके अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी रहने में उसकी सहायता करनी चाहिए थी। बजाए इसके उसने चंद्रमोहन पर कब्ज़ा जमाने की ही ठान ली। नतीजतन न सनम ही मिला, न विसाल-ए-सनम। न इधर के रहे न उधर के रहे। चंद्रमोहन ने भी इस प्रकरण में न तो हरियाणा के उपमुख्यमंत्री के पद की गरिमा का ख़याल रखा न ही एक जि़म्मेदार राजनैतिक घराने की संतान होने का ह$क अदा किया। बजाए इसके वह भी अनुराधा उर्फ फज़ा के आकर्षक शरीर, डील-डौल व सुंदरता पर मंत्रमुग्ध होते हुए एक मनचले मर्द की तरह उस पर इस हद तक फदा हो गए कि उसे हासिल करने के लिए उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन किए जाने का फैसला तक ले लिया। भले ही फज़ा ने आजिज़ी में आकर इस दुनिया से अलविदा क्यों न कहा हो परंतु चंद्रमोहन द्वारा इस सिलसिले में उठाए गए सभी कदमों के चलते चंद्रमोहन की राजनैतिक अर्थी तो उसी समय निकल चुकी थी जबकि वह अपने ही कारनामों से बार-बार आहत होते दिखाई दे रहे थे। चाहे उनका धर्म परिवर्तन करना हो, चाहे इसी के चलते उपमुख्यमंत्री का पद गंवाना हो, कांग्रेस से निष्कासित होना हो, हिंदू धर्म से इस्लाम धर्म में जाना व पुनः इस्लाम धर्म से हिंदू धर्म में वापस जाना और इतनी छीछालेदर के बाद उनके अपने चुनाव क्षेत्र से उन्हें कांग्रेस द्वारा पुन: प्रत्याशी न बनाया जाना और वर्तमान समय में भी मजबूरीवश तथा अपनी हुई छीछालेदर के चलते राजनैतिक परिदृश्य से पूरी तरह $गायब रहना एक कुशल व सक्रिय राजनीतिज्ञ के लिए उसकी राजनैतिक मौत से कम नहीं है।

बहरहाल, अनुराधा बाली की मौत पर न केवल लड़कियों व महिलाओं को आत्ममंथन करने की ज़रूरत है बल्कि उनके माता-पिता व परिवार के संरक्षकों को भी यह सोचने की ज़रूरत है कि आमतौर पर ऐसे परिणाम तभी सामने आते हैं जबकि कोई व्यक्ति अपनी पहुंच व अपनी हैसियत से अधिक ऊंची उड़ान भरने की कोशिश करता है। पिछले कई सालों से ख़ासतौर पर पंजाब व हरियाणा से जुड़े हुए दर्जनों ऐसे मामले प्रकाश में आ चुके हैं जिन्हें देखने से यह पता लगता है कि विदेश जाने के चक्कर में तथा विदेश में रहने वाले युवक से विवाह करने की ख़ातिर किसी लडक़ी ने अपना जीवन बरबाद कर लिया हो। सोचने का विषय है कि जब अपने ही देश, अपने ही प्रांत यहां तक कि अपने ही जि़ले व क़स्बे में होने वाले रिश्तों में कई बार लडक़ा-लडक़ी के परिवारजन एक-दूसरे के विषय में सही-सही जानकारी नहीं प्राप्त कर पाते ऐसे में दूसरे देश में रहने वाला लडक़ा या लडक़ी वहां बैठकर क्या गुल खिला रहे हैं, वे विवाहित हैं या अविवाहित, कहीं और उनके रिश्ते हैं या नहीं, वे किन्हीं बच्चों के माता-पिता हैं या नहीं, उनका व्यवहार, चाल-चलन व स्वभाव आदि कैसा है कैसा नहीं, उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, रहन-सहन व उसकी व्यस्तताएं क्या हैं क्या नहीं इन सब बातों का अंदाज़ा आख़िर कैसे लगाया जा सकता है? विदेशों में बसने की तमन्ना रखने वाली तथा हवाई जहाज़ की सैर करने की तमन्ना रखने वाली लड़कियों को तो बस इतना दिखाई देता है कि उनका पति विदेश में रहता है। और यही हवाई उड़ान भरने की सोच अब तक सैकड़ों मासूम लड़कियों को अंधे कुंए में धकेल चुकी है। मेरी जानकारी में तो कुछ ऐसे मामले भी हैं जिससे यह पता चलता है कि विदेशों में बसने वाली लड़कियों द्वारा भी इसी प्रकार भारतीय लडक़ों का भी शोषण किया जाता है तथा उन्हें भी अपना अप्रवासी भारतीय होने का स्टेटस दिखाकर व जताकर उनसे विवाह कर उन्हें न केवल प्रताडि़त किया जाता है बल्कि उन्हें उनके हाल पर भी छोड़ दिया जाता है।

फिज़ा प्रकरण में एक बात और चिंताजनक है कि आख़िर इस्लाम धर्म के जि़म्मेदार लोग अनुराधा को फिज़ा व चंद्रमोहन को चांद मोहम्मद बनाए जाने जैसी घटनाओं को रोकने का प्रयास क्यों नहीं करते। ज़ाहिर है ऐसी घटनाएं देश में पहले भी कई बार हो चुकी हैं जबकि किसी ग़ैर मुस्लिम व्यक्ति ने इस्लाम धर्म का रास्ता केवल इसलिए चुना हो ताकि उसे दूसरा विवाह करने में आसानी हो। बड़ी अजीब सी बात है कि आज मंहगाई के बोझ से दबा आम मुसलमान भी स्वयं अपनी दो शादी करता हुआ नज़र नहीं आता। ऐसे में किसी $गैर मज़हब का व्यक्ति जब महज़ दूसरी शादी करने की ग़रज़ से ही इस्लाम धर्म स्वीकार करे तो निश्चित रूप से यह उसका सि$र्फ एक हास्यास्पद $कदम ही माना जाएगा। और यदि इस्लाम धर्म के जि़म्मेदार लोगों द्वारा इस प्रकार के स्वार्थी तथा क़ानूनी दांवपेंच के चलते इस्लाम धर्म स्वीकार करने वालों को रोका नहीं गया तो यह भी इस्लाम धर्म की बदनामी का एक कारण बन सकता है। हो सकता है कि यदि चंद्रमोहन या अनुराधा को इस्लाम धर्म स्वीकार करने जैसा $कानूनी कवच न मिला होता तो वे आपस में विवाह ही न करते। बहरहाल, जो भी हुआ वह न तो चंद्रमोहन के लिए अच्छा हुआ और फिज़ा ने तो अपना जीवन ही समाप्त कर डाला। समाज में इस बात की कोशिश होनी चाहिए कि भविष्य में अन्य फिज़ाओं की ज़िन्दगी में ऐसी खिज़ाएं कभी न आएं l

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