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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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film-festival                बेहद अफसोसजनक बात है कि भारतीय फिल्मों के जनक दादा साहब फाल्के की ही पहली फिल्म के केवल दो प्रिंट बचे हैं। ऐसा केवल उनके साथ ही नहीं बाद के कर्इ फिल्मकारों की माइलस्टोन फिल्मों के साथ भी हुआ है। व्यवसिथत रखरखाव के अभाव में गुम होती जा रही फिल्मी धरोहर को संजोने के लिए गंभीरता से कदम उठाने की जरूरत है।

नहीं देख सकते पहली फिल्म :  फिल्म इंडस्ट्री जिस उल्लास से अपने सौ साल पूरे होने का जश्न मना रही है, वो इस सवाल के साथ ही फीका पड़ जाता है कि क्या आपके पास आपकी पहली फिल्म और पहली बोलती फिल्म के प्रिंट हैं? आखिर एक सिने प्रेमी के लिए कितनी मायूसी की बात है कि वह ‘राजा हरिश्चंद्र’ और ‘आलम आरा’ जैसी फिल्में नहीं देख सकता। इन दोनों फिल्मों के अलावा मृणाल सेन, तपन सिन्हा, सत्यजीत राय आदि की दर्जनों ऐसी फिल्में हैं, जिन्हें हम अपना मील का पत्थर कह भर सकते हैं, लेकिन देख नहीं सकते।

हरिश्चंद्र के प्रिंट गायब :  देश के राष्ट्रीय अभिलेखागार में पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र के केवल दो प्रिंट हैं। चार प्रिंट वाली इस फिल्म की दूसरी और तीसरी रील उपलब्ध नहीं। 3700 फीट लंबी रील वाली और 40 मिनट की इस फिल्म को आप आधा ही देख सकते हैं, वो भी केवल एक जगह राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार में। दो गुम रीलें आखिर कहां गर्इं, इसका कोर्इ पता नहीं चल सका। इसके खोजने की तमाम कोशिशें असफल रही, हालांकि यह खोज काफी देर से की गर्इ।

अभिलेखागार में आलम आरा :  सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा तीन-चार साल पहले जब यह आधिकारिक घोषणा की गर्इ कि देश की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ का कोर्इ प्रिंट उपलब्ध नहीं है, तो आश्चर्य से अधिक फिल्मी प्रेमियों का गुस्सा होना स्वाभाविक था। इंपीरियल मूवी कंपनी द्वारा बनार्इ गर्इ दो घंटे चार मिनट की इस फिल्म का कोर्इ प्रिंट राष्ट्रीय अभिलेखागार सहित कहीं उपलब्ध नहीं है। 1931 में अर्देशिर र्इरानी द्वारा निर्देशित यह फिल्म पारसी नाटक से प्रेरित थी। यह 1928 में बनी दुनिया की पहली बोलती फिल्म ‘लाइटस आफ न्यूयार्क’ के केवल तीन साल बाद बनी थी। आज इस फिल्म के कुछ फोटोग्राफ और मीडिया पिक्चर ही राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध हैं।

निराश रहे तपन सिंहा : दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार तपन सिंहा अपनी गायब फिल्मों की खोज आखिरी दम तक करते रहे, लेकिन सफलता हासिल न हुर्इ। उनकी पहली फिल्म ‘अंकुश’ जिसे 1954 में बनाया गया था का प्रिंट, फिल्म अभिलेखागार में लगी आग में स्वाहा हो गया। उन्हें उम्मीद थी कि इसका प्रिंट कहीं और उपलब्ध होगा, लेकिन उन्हें कहीं नहीं मिला। अपनी एक और क्लासिक फिल्म ‘कालामाटी’ के प्रिंट खोने से भी वह निराश थे। तपन ने ‘काबुलीवाला’, ‘एक डाक्टर की मौत’, ‘सगीना महतो’, जैसी कालजयी फिल्में बनार्इं। तपन के बेटे अनिंध्य ने एक इंटरव्यू में बताया कि उन्हें जीवन में किसी और चीज ने उतना उदास नहीं किया, जितना प्रिंट के खोने ने किया।

मृणाल का मलाल :  मृणाल सेन को भी अपनी कालातीत फिल्म ‘पुनष्चो’ को खोने का गहरा दुख है और यह तमाम फिल्म प्रेमियों का भी साझा दुख है। ‘पुनष्चो’ विधवा विवाह पर बनी एक क्रांतिकारी फिल्म है। इसमें एक मध्यवर्गीय परिवार की विधवा महिला के नौकरी करने पर सवाल उठाए जाते हैं और उसके असितत्व पर भी। सेन की कुछ अन्य फिल्मों जैसे ‘पदातिक’, ‘आकाश’, ‘कुसुम’ और ‘कलकत्ता 71’ आदि के साउंड ट्रैक खराब हो गए हैं। यानी रखरखाव के अभाव में इन्हें मूक फिल्मों की तरह देखना मजबूरी है।

नर्इ फिल्मों का हाल :  बात 70 के दशक की है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम की मदद से कर्इ युवा फिल्म निर्देशकों ने लीक से हटकर करीब 70 नायाब फिल्में बनार्इ थीं। लेकिन इनमें से ज्यादातर फिल्मों को आप देखना चाहें, तो आपको निराषा हाथ लगेगी। हालांकि इन फिल्मों को लेकर एक सकारात्मक पहल भी की गर्इ है। एनडीएफसी की तरफ से इनमें से 11 फिल्मों के खराब हो चुके प्रिंट को रेस्टोरेशन के जरिए ठीक किया जा रहा है। बाकी फिल्मों को भी इस आधुनिकतम तकनीक से ठीक करने की कोशिश की जा रही है। इनमें श्याम बेनेगल की ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’, तपन सिंहा की ‘एक डाक्टर की मौत’, सर्इद मिर्जा की ‘सलीम लंगड़े पर मत रो’, सुधीर मिश्रा की ‘धारावी’, अरूण कौल की ‘दीक्षा’ आदि शामिल हैं।

अभिलेखागार की स्थिति :  अभिलेखागार व्यवस्थागत लापरवाही का शिकार रहा है। यहां पैसे से लेकर प्रिंट संरक्षण के लिए बिजली जैसी बुनियादी चीजों का अभाव है। स्थिति अभी भी ज्यादा अच्छी नहीं है। जब से डीवीडी और डिजिटल फार्मेट आ गया है, तब से संरक्षण का काम आसान है। किंतु नाइट्रेट वाली फिल्मों का डिजिटल प्रिंट नहीं बन सकता। अब सेंसर हुर्इ हर फिल्म की एक डीवीडी कापी, अनिवार्यत: अभिलेखागार के पास जमा हो जाती है। फंडिंग की दिषा स्थिति भी बेहतर हुर्इ है, लेकिन इसे और बेहतर करने की जरूरत है। इसमें प्राइवेट सेक्टर और बालीवुड हसितयों की मदद भी ली जा सकती है।

नरेन्द्र देवांगन

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