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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-अशोक प्रवृद्ध”-

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ऋग्वेदादि वैदिक व पौराणिक ग्रंथों में अब तक सिमटी प्राचीनतम और हजारों वर्ष पूर्व लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी का आदिबद्री के गाँव मुगलवाली (हरियाणा के महेंद्रगढ़ /यमुनानगर जिला का मुगलावाली गाँव) में उद्गम होना ऐतिहासिक, पुरातात्विक और भौगोलिक दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है और इस खोज से भारतीय इतिहास की कई महत्वपूर्ण लुप्त कड़ियों के फिर से जुड़ सकने की आशा बलवती हो गई हैं। मुगलवाली के इस क्षेत्र में भू-जल स्तर काफी नीचे है और उसके आसपास लगे पानी के कई ट्यूबवैलों में भूमिगत जलस्तर 85 फुट से नीचे है, परन्तु यह एक हैरतअंगेज बात है कि जहाँ पर सरस्वती नदी मिली है वहाँ मात्र आठ फुट नीचे ही खुदाई करने पर सरस्वती का जल निकल आने से सरस्वती नदी के  इस क्षेत्र में विराजमान होने की पुष्टि हो गई है । इससे क्षेत्र के लोगों में उत्साह के साथ एक नया विश्वास भी पैदा हो गया और उनका कहना है कि जिस सरस्वती के बारे में कहानियों में सुनते थे, वैदिक-पौराणिक ग्रंथों में पढ़ते थे, अब उस सरस्वती के साक्षात दर्शन भी हो गए हैं। पुरातन भारतीय संस्कृति के विद्वानों का कहना है कि यमुना नगर के मुगलावाली में जिस तरह के ऐतिहासिक, पुरातात्विक और भूगर्भशास्त्रीय प्रमाण मिले हैं, उनसे यह बात सिद्ध हो जाती है कि वैदिक सरस्वती इसी क्षेत्र की विशाल नदी थी, जो भूगर्भीय हलचलों के कारण  विलुप्त-प्राय हो गई थी , जिसके साक्ष्य वैदिक-पौराणिक ग्रंथों में मिलते हैं । सरस्वती की भौगोलिक स्थिति , भारतीय संस्कृति में महता और सभ्यता-संस्कृति में इसके सहयोग का विस्तृत उल्लेख ऋग्वेद, महाभारत, ऐतरेय ब्राह्मण, भागवत पुराण, विष्णु पुराण आदि पुरातन ग्रंथों में अंकित है। ऋग्वेद में सप्तसिंधु क्षेत्र की महिमा को प्रस्तुत करते हुए जिन सात नदियों का वर्णन किया गया है, उनमें से एक सरस्वती है।परन्तु विगत एक शताब्दी से भी ज्यादा पुराना एक विचार यह भी है कि हाकरा घघ्घर नदी ही प्राचीन वैदिक सरस्वती है, जो कभी एक विशाल नदी थी और हिमालय से शुरू होकर राजस्थान में समुद्र में मिल जाती थी। किसी समय राजस्थान और गुजरात का रेगिस्तानी इलाका हरा-भरा था, परन्तु भूगर्भीय हलचलों से यह इलाका धरती के नीचे आ गया और बाद में रेगिस्तान में परिवर्तित हो गया। भूकंपों की वजह से सरस्वती का अपने उद्गम से सम्बन्ध कट गया और वह सूख गई, जो आज भी भूगर्भ के भीतर बह रही है।

वैदिक कालीन नदी सरस्वती के अस्तित्व और उसकी भूगर्भ में अंगड़ाई ले रही जलधारा को लेकर भूगर्भशास्त्री, पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकारों में लम्बे समय से मतभेद बना हुआ है , और यह भी सर्वविदित है कि भारतवर्ष में इतिहास और संस्कृति विचारधारा की लड़ाई के अति संवेदनशील मैदान हैं, जहाँ  सदैव ही वामपंथी और दक्षिणपंथी अपनी धींगामुश्ती की लड़ाई लड़ते रहते हैं। सरस्वती नदी भी भारतवर्ष की धर्म=अध्यात्म, इतिहास व संस्कृति से जुड़ा एक ऐसा ही मुद्दा है, जिसके बारे में वामपंथियों का कहना और मानना है कि यह हिन्दुत्ववादियों का षड्यंत्र है। इसके ठीक विपरीत दक्षिणपंथियों का मानना है कि भूगर्भीय हलचलों से जमीन में सदियों पूर्व समा अर्थात लुप्तप्राय हो चुकी वैदिक सरस्वती को वे फिर से बहाकर ही दम लेंगे। नई खबर यह है कि हरियाणा की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने वैदिक सरस्वती के लुप्त प्रवाह को खोजने की मुहिम शुरू कर दी है और यमुना नगर जिले के मुगलवाली गाँव में जमीन में आठ फीट नीचे ही मीठे पानी की धारा मिली है। भूगर्भ विज्ञानी मानते हैं कि जहाँ खोदा गया है, वहाँ जमीन के अंदर मिट्टी-पानी इन इलाकों के मिट्टी-पानी से अलग है, इसलिए बहुत सम्भव है कि यह प्राचीन सरस्वती की ही धारा हो।

सदियों पूर्व लुप्त हो चुकी एक मृतप्राय सरस्वती नदी का खुदाई करके नदी का प्रवाह मार्ग ढूँढ़ने का यह काम प्रारम्भ तो हुआ मनरेगा के तहत, परन्तु इसकी महता को देखते हुए शीघ्र ही यह काम कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग की देखरेख में आगे बढ़ा। अब इसमें भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण, इसरो और तेल और प्राकृतिक गैस आयोग के शामिल होने की आशा है। कुरुक्षेत्र में इस परियोजना पर छह साल से काम हो रहा है। दिलचस्प यह भी है कि 1886 में आर.डी. ओल्डहम सहित अनेक इतिहासकारों की भी सरस्वती परियोजना में दिलचस्पी थी। इस शोध और उत्खनन से जुडे़ जानकार ए.के. चौधरी सहित कई अन्य जानकारों का कहना है कि इस इलाके में जहाँ मात्र छह से दस फुट की गहराई पर पानी का एक आंतरिक प्रवाह दिखता है उससे लुप्त हो चुकी वैदिक सरस्वती की पुष्टि होती है। वैदिक सरस्वती की खोज में अकबर कालीन दस्तावेजों का भी सहारा लिया गया है। सरस्वती नदी को लेकर किए गए सर्वेक्षण में कई आश्चर्यजनक तथ्य भी सामने आए हैं। सरस्वती नदी को धरातल पर लाने के चलते जब राजस्व अभिलेख अर्थात रिकॉर्ड खंगाला गया तो भू अभिलेखों में सरस्वती नदी के बहने का स्थान मौजूद मिला। सर्वेक्षण में राजस्व विभाग, पंचायती विभाग और सिंचाई विभाग की मदद ली गई। इसके अतिरिक्त उपग्रह व अन्य तकनीकी सुविधाओं से भी जमीन को खंगाला गया। इस दौरान रिकॉर्ड में पाया गया कि जिले के कई गाँवों में सरस्वती के लिए आज भी रास्ता छोड़ा गया है। जहाँ से होकर प्राचीन समय में सरस्वती नदी गुजरती थी। स्थानीय अधिकारियों ने समाचार माध्यमों को दिए गए जानकारी में बताया कि सरस्वती नदी का सर्वेक्षण उद्गम स्थल से जिला यमुनानगर के कुरुक्षेत्र के साथ लगते अंतिम गाँव तक किया गया है। इसरो के मुताबिक सरस्वती की जलधारा अब भी जमीन के नीचे बहती है, जिसका नक्शा उपग्रह के माध्यम से गूगल पर देखा जा सकता है। अगर ऐसा है तो यह बिल्कुल नई चीज है। इन सबकी वैज्ञानिक जाँच से विभिन्न सतहों और कंकड़-पत्थर-बजरी की उम्र का पता करना मुश्किल नहीं है।

 

वैदिक और पौराणिक ग्रंथों में अंकित सरस्वती के अस्तित्व को लेकर देशी-विदेशी भूविज्ञानी और भारतीय धर्म-अध्यात्म, सभ्यता-संस्कृति के अध्येताओं के द्वारा इसकी शोध और जमीनी खोज में जुटने की बात कोई नई नहीं है । 1860 में फ्रांस के भूविज्ञानी विवियेन सेंट मार्टिन के द्वारा लिखित वैदिक भूगोल  नामक पुस्तक में सरस्वती के साथ घग्गर और हाकड़ा की भी पहचान की गई थी। इसके बाद 1886 में अंगेजी हुकूमत ने भारतवर्ष का भौगोलिक सर्वेक्षण कराया था। इसके अधीक्षक आरडी ओल्ढ़म की रिपोर्ट बंगाल के एशियाटिक सोसायटी जर्नल में छपी है। इस रिपोर्ट में सरस्वती के नदी तल और इसकी सहायक नदियों सतुलज व यमुना के बहने वाले पथ रेखांकित किए गए हैं। 1893 में इस रिपोर्ट ने प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक सीएफ ओल्ढ़म को प्रभावित किया। तत्पश्चात अपनी खोज से ओल्ढ़म ने इसी जर्नल में सरस्वती के भूगर्भ में उपस्थित होने की पुष्टि की है। साथ ही घग्धर और हाकड़ा के सूखे पथों का भी ब्यौरा दिया है। ये नदियाँ पंजाब में बहती थीं। पंजाब की लोकश्रुतियों में आज भी ये नदियाँ विद्यमान हैं। इन्हीं नदियों के पथ पर एक समय सरस्वती बहा करती थी। इसके बाद 1918 में टैसीटोरी, 1940-41 में औरेल स्टाइन और 1951-53 में अमलानंद घोश ने सरस्वती की खोज में अहम् भूमिका निभाई। इन सब विद्वानों ने अपने निष्कर्षों में सिद्ध किया कि सरस्वती के विलोपन का मुख्य कारण सतलुज और यमुना की धार का बदलना था। सतलुज की धार सरस्वती से अलग होकर सिंधु में जा मिली। लगभग इसी समय यमुना ने भी अपनी धारा का प्रवाह बदल दिया और वह पश्चिम में अपने बहने का रुख बदलकर, पूर्व में बहकर गंगा में जा मिली। नतीजतन सरस्वती सूखती चली गई।

जर्मन विद्वान हर्बट विलहेमी ने भी सरस्वती के अस्तित्व और इसके पथ का गहन अध्ययन किया। 1969 में इस शोध की जेड जियोमोर्फोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट में सरस्वती नदी पर 1892 से 1942 तक अध्ययनों का सिलसिलेवार ब्यौरा व संदर्भ देते हुए हर्बट ने साबित किया कि सिंधु नदी की जो धारा उत्तर-दक्षिण में बहती है, उसके पूर्व में 40 से 110 किलोमीटर लम्बाई में एक प्राचीन सूखा नदीतल है, वह सूखा नदीतल वास्तव में सरस्वती का ही है। एक समय वजूद में रहे इन्हीं नदीतलों को हाकड़ा, घग्घर, सागर, संकरा और वार्हिद नामों से जाना जाता था।

सरस्वती की खोज में पाकिस्तान के पुराशास्त्री भी लगे रहे हैं। इस सिलसिले में पाकिस्तान के रफीक मुगल ने 414 पुरातात्त्विक स्थलों की खोज की है। ये स्थल बहावलपुर के रेगिस्तान और चोलिस्तान में फैले हुए हैं। इसी क्षेत्र में हाकड़ा का करीब 300 मील लम्बा नदी तल है। इन नदी तलों का अस्तित्व ईसापूर्व 99 से लेकर तीसरी और चौथी शताब्दी तक माना गया। इस शोध की पुष्टि हावर्ड विश्व विद्यालय के प्राध्यापक बायंट ने भी की है। रफीक ने जो नदीतल खोजे हैं, उन्हीं के समीप भारतवर्ष के बीकानेर इलाके के उत्तर में अमलानंद घोश ने भी 100 छोटे नदी तलों को सरस्वती के रूप में चिन्हित किया है।

इन विद्वानों के अतिरिक्त 19वीं और 20वीं सदी में कई पुरातत्व वेताओं ने प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के आधार पर सरस्वती की खोज की। इनमें क्रिश्चियन लेसन, मैक्समूलर, जेन माकिनटोस और माइकल डेनिनो जैसे पश्चिमी विद्वान शामिल हैं। इन सभी के निष्कर्षों में घग्घर-हाकड़ा नदियों को वैदिककालीन नदी माना गया है। यहाँ तक कि इन विद्वानों ने 19वीं सदी में 1500 किलोमीटर लम्बी नदी की धारा का प्रवाह भी खोज लिया था। सरस्वती और घग्घर-हाकड़ा नदी प्रवाह तंत्र एक जैसा होने के कारण ये विद्वान एकमत थे। इन्होंने सरस्वती का उद्गम स्थल हिमाचल प्रदेश में शिवालिक पहाड़ियों से निकलने वाली जलधाराओं को माना है।

इन सब निर्विवाद शोधों के बावजूद भारत के वामपंथी सरस्वती नदी के अस्त्तिव का होना पूरी तरह नहीं स्वीकारते और स्वीकारते भी हैं तो इसे अफगानिस्तान की हेलमंड या हरक्सवती के रूप में चिन्हित करते हैं। इसे अवेस्ता में हरखवती कहा गया है। जबकि ऋग्वैद के सूक्तों में स्पष्ट उल्लेख है कि सरस्वती हिमालयी पर्वतों से निकलकर कच्छ में जाकर सागर में विलीन होती है। दरअसल संस्कृत ग्रंथों के तथ्यों को वामपंथी इसलिए नकारते रहे है, जिससे इनमें दर्ज भारतीय गौरव-गाथा को झुठलाया जा सके। परन्तु अब सरस्वती नदी के प्रवाह के साक्ष्य मिलने के बाद सिद्ध हो गया है कि ऋग्वैद आदि ग्रंथों में उल्लेखित सरस्वती का भूगोल आधारहीन कल्पना नहीं है।

बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने इस विलुप्त नदी को खोजने की पहल की। 15 जून 2002 को केंद्रीय संस्कृति मंत्री जगमोहन ने सरस्वती के नदीतलों का पता लगाने के लिए खुदाई की घोषणा की। लुप्त सरस्वती के इस खोज को सम्पूर्ण वैज्ञानिक धरातल देने की दृष्टि से इसमें इसरो के वैज्ञानिक बलदेव साहनी, पुरातत्त्वविद् एस कल्याण रमन, हिमशिला विशेशज्ञ वाईके पुरी और जल सलाहकार माधव चितले को शामिल किया गया। हरियाणा में आदिबद्री से लेकर भगवान पुरा तक पहले चरण में और दूसरे चरण में भगवान पुरा से लेकर राजस्थान सीमा पर स्थित कालीबंगन की खुदाई प्रस्तावित थी। यह खोज कोई ठोस परिणाम दे पाती इससे पहले राजग सरकार गिर गई और डॉ मनमोहन के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने 6 दिसम्बर 2004 को संसद में यह बयान देकर कि इस नदी का कोई मूर्त रूप नहीं है, इसे मिथकीय नदी ठहराकर, खोज की नई संभावनाओं पर विराम लगा दिया। नतीजतन वाजपेयी सरकार की पहल अधूरी रह गई। लेकिन राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के दर्शन लाल जैन सरस्वती शोध संस्थान की अगुवाई में नदी की खोज की सार्थक पहल करते रहे। उन्होंने अपनी खोज के दो प्रमुख आधार बनाए। एक विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में प्राचीन इतिहास विभाग के प्राध्यापक रहे डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर की सरस्वती खोज पदयात्रा और दूसरा 2006 में आए तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के सर्वे और खुदाई को। वाकणकर की यात्रा आदिबद्री से शुरू होकर गुजरात के कच्छ के रण पर जाकर समाप्त हुई थी। ओएनजीसी ने डॉ एमआर राव के नेतृत्व में सरस्वती के पथ व नदीतलों के पहले तो उपग्रह-मानचित तैयार किए, फिर धरातलीय साक्ष्य जुटाए। हिमाचल प्रदेश में सिरमौर जिले के काला अंब के पास सरस्वती टियर फाल्ट का गम्भीर और गहन अध्ययन किया। अध्ययन के परिणाम में पाया गया कि हजारों साल पहले आए भूकंप के कारण यमुना और सतलुज ने अपने मार्ग बदल दिए थे। यमुना पूरब में बहती हुई दिल्ली पहुँच गई और सतलुज पश्चिम होते हुए सिंधु नदी में जा मिली। जबकि पहले इन दोनों नदियों का पानी सरस्वती में मिलकर हरियाणा, राजस्थान व गुजरात होते हुए कच्छ में मिलता था। अवशेषीय अध्ययन के बाद ओएनजीसी ने राजस्थान के जैसलमेर से सात किलोमीटर दूर जमीन में करीब 550 मीटर तक गहरा छेद किया। यहाँ 7600 लीटर प्रति घंटे की दर से स्वच्छ जल निकला। इस प्रमाण के बाद ओएनजीसी ने भारत विभाजन के बाद भारतीय पुरातत्व संस्थान द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण का भी अध्ययन किया। इससे पता चला कि हरियाणा व राजस्थान में करीब 200 स्थलों पर सरस्वती के पानी के निशान हैं। उपग्रह से चित्र लेकर नदी का मार्ग तलाशने के काम में अर्से से प्रसिद्ध वैज्ञानिक यशपाल और राजेश कोचर भी लगे हुए हैं। इन्होंने इस वैदिक कालीन नदी के अस्तित्व की भू-गर्भ में होने की पुश्टि की है। ओएनजीसी के अध्ययन से पहले ऋग्वैद के आधार पर 1995 में सरस्वती की प्रामाणिक खोज अमेरिका की नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी और ज्योग्राफिक इंफोरमेशन सरस्वती के उपगृह मानचित्र भी लिए हैं। इनके निष्कर्ष में उल्लेख है कि सरस्वती और सिंधु दो अलग-अलग नदियाँ थीं। इन चित्रों का सूक्ष्म निरीक्षण करने से पता चलता है कि जैसलमेर क्षेत्र में बड़ी मात्रा में भूजल के स्त्रोत हैं। ये वही स्रोत अथवा जलधाराएं  हैं, जिनका उल्लेख ऋग्वैद में सरस्वती नदी के पथ के रूप में किया गया है। कमोबेश यही निष्कर्ष भारतीय अंतरिक्ष शोध संस्थान और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा 1998 में शुरू किए शोधों में सामने आए हैं। हालाँकि ऐतिहासिक साक्ष्यों की पुष्टि इतिहास सम्मत प्रमाणों से करने की जरूरत है, न कि किसी वाद या विचार के आधार पर ?  अब आदिबद्री से ही इस लुप्त नदी के पुनर्जन्म की शुरूआत हुई है, जो तय है कच्छ के रण तक सरस्वती नदी के रूप में साकार दिखाई देगी।

 

ध्यातव्य है कि सरस्वती नदी शोध संस्थान के अध्यक्ष दर्शनलाल जैन ने सरस्वती नदी के महत्व को वर्षों पूर्व समझा और इसे धरा पर लाने का संकल्प लिया था । यह कार्य उन्होंने 1999 के दौरान अपने हाथ में लिया था, जब केन्द्र में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठ्बन्धन की सरकार थी और जगमोहन केन्द्रीय पर्यटन मंत्री हुआ करते थे, तो करोड़ों रुपया खर्च करके देश के कई भागों में सरस्वती की खोज में खुदाई का कार्य प्रारम्भ हुआ था। लेकिन संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार ने सता में आते ही इस नेक कार्य को ठंडे बस्ते में डाल दिया।  इससे भारतीय सभ्यता-संस्कृति को समझने की एक सार्थक कार्य ही नहीं रुक गया बल्कि करोड़ों रुपए का खर्च बेकार हो गया। अब केन्द्र व प्रदेश में सरकार बदली और भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो यह काम देहरादून की एक प्रयोगशाला और अन्य संस्थाओं के सहयोग से फिर से शुरू हो गया तथा उसके सार्थक परिणाम भी शीघ्र मिलने शुरू हो गए हैं, और न केवल हरियाणा के यमुनानगर जिले के आदिबद्री में सरस्वती का उद्गम स्थल खोज लिया गया है, बल्कि मुगलवाली गाँव में धरातल से सात फीट नीचे तक खुदाई करने से नदी की जलधारा भी फूट पड़ी है। इस धारा का रेखामय प्रवाह तीन किलोमीटर की लम्बाई में नदी के रूप में सामने आया है और आगे खुदाई का कार्य अभी जारी है। एक मृत पड़ी नदी के इस पुनर्जीवन से उन सब अटकलों पर विराम लगा है, जो वेद-पुराणों में वार्णित इस नदी को या तो मिथकीय ठहराने की कोशिश करते थे या इसका अस्तित्व अफगानिस्तान की हेलमन्द  नदी के रूप में मानते थे। इससे एक बार फिर यह सिद्ध हुआ है कि ऋग्वैद आदि ग्रंथों में उल्लेखित सरस्वती का भूगोल आधारहीन कल्पना नहीं है।इस सम्बंध में दर्शनलाल जैन ने कहा कि यह पहला कदम है, और अभी काफी काम होना है। सरस्वती नदी संजीवनी बनेगी, इससे पानी की कमी तो पूरी होगी ही, साथ ही बरसात के दिनों में बाढ़ का प्रकोप कहर नहीं बरपा पाएगा। उन्होंने इसके लिए केन्द्र व राज्य सरकार की कार्यशैली की सराहना की।

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1 Comment on "आखिर लुप्तप्राय वैदिक सरस्वती मिल ही गई"

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राहुल खटे
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बहुत उपयुक्‍त जानकारी है, इससे सरस्‍वती को काल्‍पनि‍क मानने वालों के ज्ञान में नि‍श्‍चि‍त वृद्धी होगी।

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