लेखक परिचय

पंडित दयानंद शास्त्री

पंडित दयानंद शास्त्री

ज्योतिष-वास्तु सलाहकार, राष्ट्रीय महासचिव-भगवान परशुराम राष्ट्रीय पंडित परिषद्, मोब. 09669290067 मध्य प्रदेश

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आज तक संसार में कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमताओं का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाया है और न ही यह सम्भव है कि वह अपनी समस्त क्षमताओं का उपयोग करने में सफल हो जाए। इतनी असीमित क्षमताएं इस मनुष्य ने यानि आपने अपने अन्दर समेट रखी हैं। ईश्वर के पश्चात् यदि कोई सर्वशक्तिमान है तो वह केवल मनुष्य, केवल आप ही हैं। ईश्वर में और आप में केवल यही अन्तर है कि वह अदृश्य है और आप दृश्य।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, अमरीका का छात्र और राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संस्था (नासा) का वह प्रतिष्ठित वैज्ञानिक अंतरिक्ष के अनन्त विस्तार में फैले सितारों और ग्रहों के अस्तित्व को उगलियों से छूकर महसूस कर लेता था, लेकिन उन्हें देख नहीं पाता था। कारण, भौतिकविद् केंट कुलर्स जन्मान्ध थे।

उनका वैज्ञानिक तथ्य था कि प्रत्येक तारे से प्रकाश की किरणों के अतिरिक्त विद्युत्-चुम्बकीय तरंगें भी निकलती हैं। अतः कुलर्स का विशेष कम्प्यूटर उन तरंगों को ध्वनियों और दृश्यों में बदलने के बजाय उन्हें एक स्पर्शपटल पर उभरे बिन्दुओं के रूप में अनूदित कर देता था और कुलर्स की उगलियॉ स्पर्शपटल को छूकर जान लेती थी कि सितारे क्या-क्या कहते हैं।

कुलर्स की विचारशक्ति मात्र दिखाई दे रही वस्तुओ के दायरे मे ही बॅधकर नहीं रह गई थी। जिन तथ्यो को समझने मे अच्छे-खासे विद्वान् भी उलझन मे पड़ जाते है। उन्हे सुगमता से समझ लेने का रहस्य कुलर्स बताते थे कि ‘‘मेरे मस्तिष्क मे जो भी आंकड़े और तथ्य आदि रहते है वे मानो त्रिविमीय छवियो (Three Dimensional Pictures) मे बदल जाते है और सब कुछ स्पष्ट हो जाता है’’ अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र मे अत्यधिक महत्वपूर्ण योगदान करने के कारण कुलर्स की असाधारण प्रतिभा को विश्व ने प्रतिष्ठा दी। दृढ़-आत्मविश्वास और महान् बनने की प्रक्रिया का इससे उत्तम उदाहरण और क्या हो सकता है कि बचपन मे एक दिन चर्च मे प्रार्थना के उपरान्त केट कुलर्स ने अपनी नोटबुक मे लिख लिया था -‘‘ईश्वर महान् है, लेकिन मै भी महान् हूँ।’’

आप अपने जीवन के साथ जो भी करते है या करना चाहते है यह पूर्णतः इस तथ्य पर निर्भर करता है कि आप स्वयं को किस रूप मे स्वीकार करते रहे है। आप स्वयं को जिस रूप मे अपने समक्ष प्रस्तुत करते है। आप अपने अस्तित्व को वैसा ही पाते है।

कुछ वर्ष पूर्व तक व्यक्तियो की यह धारणा थी कि कम्प्यूटर जैसा उत्तम यन्त्र बनाकर मनुष्य ने अपनी मंजिल प्राप्त कर ली है, और वह सोचने लगा कि अब इस तीव्रगामी यन्त्र की सहायता से जटिल से जटिल गणनाएं भी सुगमता से सम्पन्न की जा सकेगी। परन्तु आज व्यक्ति यह देखकर हैरान है कि दिन-प्रतिदिन एक से बढ़कर एक सुपर कम्प्यूटर बाजार मे आते जा रहे है परन्तु उसका अन्त दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा।

महान् अमरीकी व्यवसायी, मोटर-वाहन निर्माता हेनरी फोर्ड ने कहा था-‘‘प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमताओ का जितना आंकलन करता है, वह उस क्षमता से कहीं अधिक कार्य-सम्पन्नता से कर सकता है’’ लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी श्रेष्ठ रचनात्मक क्षमताओ का उचित आंकलन करने का कभी प्रयास ही नहीं करते; और आप भी तो उसी श्रेणी से बाहर निकलने मे रुचि नहीं ले रहे है, न ही प्रयत्न कर रहे है, जिस श्रेणी के व्यक्ति अपनी उत्तम क्षमताओ का समुचित उपयोग करने की कामना नहीं करते, चाहे आपकी क्षमता कुछ भी रही हो, योग्यता कुछ भी रही हो यदि आप एक बार ठान ले तो इनमे आप अविश्वसनीय विकास करने मे पूर्णतः समर्थ है। मात्र आपको अपनी क्षमताओ एवं योग्यताओ का पुर्नमूल्यांकन करने की, उनमे आवश्यक परिष्कार करने की आवश्यकता है ध्यान रखिए कि आप अपनी क्षमताओ का समुचित आंकलन ही कीजिए।

जब अनेक वैज्ञानिक आकाशीय पिण्डो पर जीवन की उपस्थिति के सम्बन्ध मे केवल विचार विमर्श कर रहे थे, तब अपनी कल्पनाशील क्षमताओ का पूर्ण उपयोग करके एक वैज्ञानिक ने दूसरे आकाशीय पिण्डो पर बुद्धिमान प्राणियो की खोज की दिशा मे अपना सार्थक कदम बढ़ाया और अन्तरिक्ष मे बुद्धिमान सभ्यताओ की खोज का उत्तम प्रयास किया। उनके इन्हीं प्रयासो ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सान्ताक्रूज खगोल विज्ञान विभाग के उस खगोलविद् प्रोफेसर फैक डेक को महानता के सर्वोच्च शिखर पर ला खड़ा किया था।

आप भी स्वयं को सही रूप मे समझने का प्रयत्न कीजिए, स्वयं का समुचित मूल्यांकन कीजिए और उसके बाद स्वयं को उसके अनुसार बदलने का प्रयास कीजिए। इन सब के लिए अपने मस्तिष्क को निम्न 10 प्रभावशाली तथ्यो से बारम्बार स्मरण कराते रहिए-

1. अपने को स्वीकार कीजिए—— आप जो भी है, जैसे भी है, जहां भी है उसी रूप मे अपने को स्वीकार कीजिए। आप अत्यन्त प्रतिभावान है, आकर्षक है, सुयोग्य है, हंसमुख है और लोकप्रिय है। इसलिए आप स्वयं को पर्याप्त मान-सम्मान प्रदान कीजिए, स्वयं को परिपूर्णता से स्वीकार कीजिए। सर्वशक्तिमान ईश्वर आपका पिता है आपको उसका पूर्ण स्नेह प्राप्त है, आपको वह अत्यन्त ही चाहता है और सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आप उसे पूर्णतः स्वीकार है। तो अब आपको ही स्वयं को स्वीकार करने मे क्या आपत्ति है, जबकि अनेक व्यक्तियो ने तो आपको बहुत पहले से ही स्वीकार किया हुआ है

2. अपने मे विश्वास रखिए- —स्वयं मे आप सुदृढ़ विश्वास रखिए। इस श्रेष्ठ विश्वास को किसी भी परिस्थिति मे डगमगाने न दीजिए। महान् ईश्वर ने अपने समान ही महानता प्रदायक अनगिनत श्रेष्ठ उपहारो से आपको सुसज्जित करके भेजा है इन सर्वोत्तम उपहारो को, क्षमताओ को अपने भीतर सुन्दरता से सँजोए रखिए एवं अक्षुण्ण बनाये रखने का प्रयत्न कीजिए। इन समस्त उत्तम अलौकिक उपहारो का प्रभावशाली प्रदर्शन कर, अपने विशिष्ठ अस्तित्व को संसार मे आलोकित करिए।

3. अपने से श्रेष्ठ व्यवहार कीजिए—– जिस प्रकार आप अन्य लोगो से उत्तम व्यवहार करने और उनसे उत्तम व्यवहार प्राप्त करने के लिए इच्छुक रहते है, उसी प्रकार का श्रेष्ठ व्यवहार अपने आप से भी कीजिए। अपने मस्तिष्क को उसी प्रकार विश्राम प्रदान करने की व्यवस्था कीजिए, जिस प्रकार आप अपने शरीर को विश्राम देते है। मस्तिष्क को प्रदान किया गया तनिक-सा यह विश्राम या कोई मनोरंजन आपके मस्तिष्क को नवीन उर्जा, नवीन उत्साह-उल्लास के साथ ही अतिरिक्त उर्जा उपलब्ध कराएगा और अपनी अतुलनीय निरन्तर सेवाएं प्रदानकर आपको अभिभूत कर देगा।

4. अपने को सदैव व्यस्त रखिए— आप अपने मस्तिष्क को हमेशा व्यस्त रखिए। शारीरिक रूप से और मानसिक रूप से कुछ-न-कुछ अवश्य करते रहिए। यदि आप शारीरिक रूप से थक जाएं तो मानसिक कार्य करके शरीर को विश्राम दीजिए और यदि मानसिक कार्य करते-करते थक जाएं तो कुछ हल्का-फुल्का शारीरिक कार्य करके मस्तिष्क को विश्राम प्रदान कीजिए। इस उक्ति का सदैव ध्यान रखिए-‘‘खाली दिमाग शैतान का घर।’’ शैतान को अपने मस्तिष्क मे घर बनाने का प्रयास न करने दीजिए अन्यथा यह शैतान आपके मस्तिष्क मे सदैव उपद्रव ही करता रहेगा; और आपकी नींद हराम कर देगा। अतः आप सदैव कुछ-न-कुछ करते ही रहिए और अपने को व्यस्त रखिए।

5. अपने को सदैव प्रसन्न रखिए—– अपने मस्तिष्क को सदैव आनन्द उत्सव मनाने का अवसर प्रदान करते रहिए, तभी तो वह भी आपके जीवन मे प्रसन्नता के मोती बिखेरेगा और आप अपने कार्यों को सुचारू रूप से सम्पन्न करने मे सफल होगे मन के अप्रसन्न होने पर किसी भी कार्य मे अपना मन लगाना व्यक्ति के लिए दुष्कर होता है और अप्रसन्न मन की स्थिति मे किसी भी कार्य मे हाथ डालने का प्रयास करने पर उसमे त्रुटियां होने की पूर्ण सम्भावना बनी रहती है जबकि इसके विपरीत प्रसन्न और प्रफुल्ल मन समस्त कार्यों को सम्पन्न करने हेतु आपके उत्साह मे वृद्धि करके आपकी सफलता की कहानी का एक नवीन पृष्ठ रच देता है

इसलिए यह आवश्यक है कि आप सदैव स्वयं को प्रफुल्लित रखिए। जहां तक सम्भव हो अपनी प्रसन्नताओ को अन्य लोगो के बीच बांटने का प्रयत्न भी करते रहिए और दूसरो के दुख-दर्द मे भागीदार बनने का भी प्रयत्न कीजिए। इस प्रकार आप अपनी प्रसन्नता मे भी कई गुणा वृद्धि करने मे भी सफल रहते है

6. अपने मे अनुराग रखिए- —स्वयं से अनुराग रखना भी आपके लिए अति आवश्यक है जब आप ही स्वयं से प्रेम नहीं करेगे तो अन्य लोग आपको प्रेम करने के लिए कैसे उद्यत होगे अपने से अनुराग रखने का तात्पर्य है अपनी स्थिति के प्रति पूर्णतः आश्वस्त होना। यह विश्वास रखना कि अपनी इस स्थिति मे ही रहते हुए मुझे अपना लक्ष्य प्राप्त करना है इसलिए पूरी शक्ति से स्वयं के प्रति अपनी चाहत का विकास-वृद्धि कीजिए। अपने विलक्षण अस्तित्व के प्रति अनुराग रखिए, उससे पर्याप्त प्रेम कीजिए तभी अन्य लोग आपकी ओर आकर्षित होगे और आपके सफलता अभियान मे अपना समुचित योगदान देने के लिए आगे आएंगे

7. अपने को चिन्ता-मुक्त बनाइए—– चिन्ताओ को स्वयं से दूर रखने का आप तुरन्त कारगर उपाय कीजिए। ये दुश्चिन्ताएं आपके अस्तित्व को कोई हानि पहुंचाएं, आपकी कल्पना शक्ति को नष्ट करने का कोई प्रयास करे; उससे पूर्व ही आप इन चिन्ताओ की चिता सजाने का प्रयत्न कीजिए। ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी’-जब दुश्चिन्ता ही नहीं रहेगी तो फिर कौन हानि पहुंचा सकता है आपको इससे मुक्ति पाने मे विलम्ब करना ‘स्वयं अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारना है’ इसलिए मस्तिष्क मे उपजी किसी भी दुश्चिन्ता का उपचार करने मे अति शीघ्र जुट जाइए।

8. अपनी भूलो को भूलिए—- भूतकाल मे हुई स्वयं की गलतियो को, चूको को भूलने का यथासम्भव प्रयत्न कीजिए; जो हो गया सो हो गया, उसकी क्यो व्यर्थ चिन्ता करना, भूत का क्या पश्चाताप करते रहना, उसके लिये हर समय क्या रोना ? बीते हुए समय के दुःखद क्षणो को, अप्रिय प्रसंगो को, विगत दुःस्वप्नो को भूलने का सार्थक प्रयास कीजिए और केवल भविष्य की सुनहरी किरणो मे सराबोर होने का प्रयत्न कीजिए। भूतकाल की इन भूल-चूको को स्मरणकर अपनी शारीरिक एवं कल्पनाशील क्षमताओ को कुंठित करने का प्रयास न कीजिए। विगत की गलतियो को बार-बार याद करने की अपेक्षा उन गलतियो से सबक सीखने का यत्न कीजिए और भविष्य मे वैसी ही गलतियां दोहराने की भूल मत कीजिए। वर्तमान को सुन्दरतम बनाइए और उसी मे पूर्णता से जीने का प्रयत्न कीजिए। खुशियो की तूलिका उठाइए और अपने जीवन को सफलता-उल्लास के इन्द्रधनुषी रंग प्रदान करने मे जुट जाइए।

9. अपने सौभाग्य को आमन्त्रित कीजिए—- अपने मस्तिष्क मे सौभाग्यशाली विचारधारा की बारात सजाइए और इस सौभाग्यशाली विचारधारा की बारात मे दूल्हा बना मस्तिष्क को हर प्रकार से रिझाइए ताकि यह दूल्हा सुगमता से अत्यन्त सुन्दर आपकी सफलता रूपी दुल्हन को रिझा सके ध्यान रखिए, सौभाग्यशाली विचारधारा ही आपके सौभाग्य को बलपूर्वक आकर्षित करती है

10. अपने ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखिए—– ईश्वर मे अपका दृढ़ विश्वास आपकी समस्त बाधाओ को नष्ट करने मे अविश्वसनीय रूप से समर्थ है इसलिए ईश्वर के प्रति अपने दृढ़ विश्वास को किसी भी स्थिति मे कमजोर न होने दीजिए। यह अखण्ड, दृढ़ विश्वास ही आपकी मंजिल को आपको निकट खींच लायेगा और अवश्य ही खींच लायेगा जब आप महान् साहित्यकार एच. डब्ल्यू. लोगफैलो के इन शब्दो पर भी मनन करने का सार्थक प्रयत्न करेगे-‘‘महान् व्यक्तियो को जो श्रेष्ठ प्रतिष्ठा प्राप्त हुई, वह इन महापुरुषो को अनायास एक ही प्रयास मे प्रयास मे प्राप्त नहीं हुई। जब उनके अन्य साथी सोए पडे थे, तब वे एकाग्रचित्त, शान्ति से आत्मोत्थान की दिशा मे प्रयत्नशील थे इस प्रकार वे सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचकर महान् बने’’

महानता-अर्जन के सिद्धान्तो का वर्णन करते हुए बैजामिन डिजरायली ने उद्घाटित किया था कि-‘‘अपने मस्तिष्क को महान् विचारो से पोषित करो नायकत्व मे विश्वास दृढ़ करने वाला ही स्वयं को नायक बनाता है’’ आप महान् है, अपने इस विश्वास को दृढ़ता प्रदान कीजिए और स्वयं से कहिए-मै भी महान् हूँ, महान् हूँ, महान् हूँ।

 

 

 

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