लेखक परिचय

राकेश उपाध्याय

राकेश उपाध्याय

लेखक युवा पत्रकार हैं. विगत ८ वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं.

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-राकेश उपाध्याय

वह जीन्स की पैंट और टीशर्ट पहनते हैं और खादी के कुर्ते भी, उन पर दोनों ही खूब फबता है। दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ और विचारक जहां उन्हें नादान, बच्चा आदि विशेषणों से अलंकृत करते हैं वहीं कांग्रेस समेत तमाम मध्यमार्गी खेमे में वह उम्मीद की नई रोशनी माने जा रहे हैं। दक्षिणपंथी खेमे के सर्वप्रमुख विचारकों के नजरिए से देखें तो भारत के लोकतंत्र में वंशवाद के वह नवप्रतीक नेता हैं और उन्हें कांग्रेस के कुशल राजनीतिक प्रबंधक लगातार योग्यता का इंजेक्‍शन देकर देश के राजनीतिक मानचित्र पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं वहीं अमेठी के एक सामान्य कांग्रेस कायकर्ताओं की नजरों में राहुल बाबा नेहरू-इंदिरा-राजीव के सपनों को परवान चढाने के लिए धरती पर अवतरित किसी देवदूत से कम नहीं हैं।

जी हां, हम बात राहुल गांधी की कर रहे हैं। अमेठी के सांसद राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के पौत्र राहुल गांधी, स्व. राजीव गांधी के पुत्र राहुल गांधी। कांग्रेस के हैदराबाद अधिवेशन में राहुल गांधी को कांग्रेस के मंच पर लाने के लिए जिस प्रकार से पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में होड़ मची नि:संदेह वह राहुल के प्रति कांग्रेस काडर में व्याप्त बेइंतहा मुहब्बत का शानदार नमूना था। कांग्रेस में राहुल गांधी के इस बढ़ते क्रेज का नतीजा था कि कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी को उन्हें सितंबर, 2007 में महासचिव पद आसीन करना पड़ा।

मई, 2004 में अपने परिवार की परंपरागत संसदीय सीट अमेठी से राहुल गांधी निर्वाचित हुए तो राजनीतिक विश्‍लेषकों ने इस विजय को उनके पुरखों की पुण्याई से जोड़कर उनकी प्रतिभा को खारिज करने की कोशिश की। उस समय सुप्रसिद्ध अंग्रेजी साप्ताहिक तहलका में प्रकाशित एक साक्षात्कार का हवाला देकर तमाम विरोधी नेताओं ने राहुल का बहुत उपहास उड़ाया। उनके बारे में तरह-तरह की ओछी बातें हवा में उछाली गईं और यह सिध्द करने की कोशिश की गई कि राहुल बचकानी बातें करने वाले वंशवादी, जन्मजात तानाशाह प्रवृत्ति के बड़बोले युवा हैं। उनकी हर बात को मीडिया और विचारकों ने बहुत बारीक देखना शुरू किया और किसी ने भी उनके वक्तव्यों के पोस्टमार्टम में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

आज संसद में राहुल बाबा के प्रवेश को 6 वर्ष बीत चुके हैं। तमाम अवसरों पर संसद में उन्होंने आम अवाम के मुद्दों पर गंभीर बहस में हस्तक्षेप की भी कोशिश की है। जब भी उन्होंने हस्तक्षेप किया वह मीडिया में सुर्खियों में छा गया। बहस विदर्भ में किसानों की आत्महत्या पर हो या देश में बढ़ती गरीबी की, आम आदमी तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचने-पहुंचाने का सवाल हो या फिर देश को आण्विक शक्ति के आधार पर उर्जा उत्पादन में अग्रणी बनाने की, राहुल ने हर अवसर पर संसद में अपनी आवाज बुलंद की और तमाम विचारकों की इस अवधारणा को खारिज करने की कोशिश की कि उन्हें योग्यता का इंजेक्‍शन लगाकर देश का नेता बनाया जा रहा है। विदर्भ की कलावती के बहाने राहुल ने आम आदमी के सरोकार से जुड़ी बात उठाकर संसद में बहस को एक अलग दिशा में मोड़ दिया।

मूल बात यह है कि राहुल ने अपने राजनीतिक करियर में लगातार देश की साधारण जनता के साथ तादात्म्य बनाने की कोशिश की है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने उनके इस जन-संवाद से आजिज होकर यहां तक कह दिया कि राहुल गांधी रात दलितों की झोपड़ियों में बिताने का नाटक करता है और दिल्ली जाकर विशेष क्रीम-पाउडर, साबुन से शरीर शुद्धि करता है। जो भी हो, राहुल गांधी के कथित दलित प्रेम से बसपा समेत समूचा विपक्ष आज भी खौफजदा है। जनवरी, 2009 में राहुल ने जब अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी के एक गांव में एक दलित की झोपड़ी में ब्रिटेन के युवा विदेश मंत्री डेविड मिलीबैण्ड के साथ रात गुजारी तो समूचे देश में तहलका मच गया। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के एक बड़े नेता के सलाहकार महोदय ने तो इसे पॉवर्टी टूरिज्म की संज्ञा देकर अनदेखी करने की कोशिश की लेकिन समूचे देश में यह संदेश तो चला ही गया कि एक युवा सांसद पूरी तल्लीनता से अपने क्षेत्र की जनता के साथ तादात्म्य स्थापित कर रहा है। टी.वी. चैनलों ने जब राजस्थान में यूथ कांग्रेस के एक अभियान में राहुल को तसले में मिट्टी ढोते समय के चित्र प्रसारित किए तो विपक्ष की भौंहे और तन गईं और इसका भी यह कह कर मजाक उड़ाने की कोषिश हुई कि सब प्रचार पाने की नौटंकी मात्र है।

नौटंकी ही सही, राहुल कम से कम देश के लोगों के बीच उतरकर एक अनूठा और व्यापक जनसंपर्क अभियान तो चला ही रहे हैं। इस जनसंपर्क की इसलिए भी आज सर्वाधिक जरूरत है क्योंकि इससे देश के विकास की वास्तविक तस्वीर तो हमारे नीति नियंताओं को पता चलेगी ही। यही काम दक्षिण अफ्रीका से लौटकर गांधी जी ने जब भारत में शुरू किया था तो मोहम्मद अली जिन्ना ने उसी भाषा में गांधी का मजाक उड़ाना शुरू किया था जिस भाषा में आज के नेता राहुल गांधी का मजाक उड़ा रहे हैं। इसलिए कोई फरक नहीं पड़ता कि नेता क्या कर रहे हैं, फरक तब अवश्‍य पड़ जाएगा जबकि राहुल गांधी अपना यह संपर्क अभियान बीच में छोड़कर आराम फरमाने लग जाएंगे।

लेकिन क्या यह सब नौटंकी मात्र है। राहुल गांधी के अब तक के कार्यों का तटस्थ आकलन होना ही चाहिए। यह तब और भी जरूरी हो जाता है जबकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तक ने कह दिया है कि जिस दिन आलाकमान निर्देश दे देंगी वह प्रधानमंत्री पद का त्याग कर देंगे। जाहिर है कि कुर्सी खाली होगी या कराई जाएगी तो उस पर कौन आसीन होगा। देश समेत समूची कांग्रेस और संप्रग के घटक दल मानकर चल रहे हैं कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने का वक्त नजदीक आ गया है। यह महज संयोग नहीं है कि लेह में प्राकृतिक आपदा को आए महज 48 घंटे बीतते हैं और राहुल गांधी लेह के बाढ़ पीड़ितों के बीच ढांढस बंधाने पहुंच जाते हैं। वह जैसे ही बाढ़ पीड़ितों के आंसू पोंछने के काम में लगते हैं, प्रधानमंत्री कार्यालय भी सक्रिय हो उठता है। प्रधानमंत्री भी लेह जाकर जाड़े के मौसम के पहले ही सभी उजड़े लोगों को एक अदद छत मुहैया कराने की घोषणा करते हैं।

राहुल का चेहरा मासूम है, उनके चेहरे पर वही भोलापन झलकता है जो अधिकांश हिंदुस्थानियों की विरासत है। भोला-मासूम चेहरा, भोला-मासूम ह्दय। जिन लोगों ने स्व. राजीव गांधी की चिता को मुखाग्नि देते समय राहुल गांधी का उदास सा गमगीन चेहरा देखा है वे समझ सकते हैं कि राहुल के मुखमण्डल पर बचपन में ही वह त्रासदी अंकित हो गई थी जिस त्रासदी से आज समूचा भारत दो-चार हो रहा है। यह त्रासदी अपनों को खोने से जुड़ी है। और यहां तो दादी से लेकर पिता तक आतंकवादी हिंसा के षिकार हो गए हैं। ऐसी दादी और पिता जो भारत के सर्वोच्च सत्ता प्रतिश्ठान के नियामक और सूत्रधार रहे थे।

इसलिए भी आम जनता और उन लोगों के दु:ख-दर्द को समझने में शायद राहुल अपने उन समकालीन साथियों से ज्यादा संजीदा दिखाई देते हैं जो उनके साथ संसद में बैठते हैं। जिसने पीड़ा, दु:ख-दर्द झेला है, जिसने जीवन की दुश्‍वारियों से दो-दो हाथ किए हैं, जिसने घर के आंगन में भरी जवानी में पिता के सदा के लिए बिछुड़ जाने के गम से उत्पन्न रिक्तता और सूनेपन को झेला और महसूस किया है उससे ज्यादा मानवीय करूणा और व्यथा को समझने में कौन काबिल हो सकता है।

आज देश को जरूरत है ऐसे ही नेतृत्व की जो आम आदमी की जिंदगी की दुश्‍वारियों को दूर करने में अपनी जिंदगी खपाने को तैयार हो। जो जाति-संप्रदाय-प्रांत से इतर सभी से अपनेपन के साथ संवाद स्थापित कर सके। जो सबको अपना बना सके, जिसे सभी अपना मान सकें। जो पीड़ा और दु:ख-दर्द को दूर करने, अन्यायी व्यवस्था को पलट देने के संकल्प के साथ जनता की एक आवाज पर दौड़ता चला आए, वही नेता भारत का नेतृत्व कर सकता है।

हिंदुस्थान में विवाद के विषय और मुद्दे बहुत है। उन्हें सुलझाने के संदर्भ में विचार और तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन सर्वप्रमुख मुद्दा है कि देश की तासीर के साथ नेताओं का तादात्म्य हो रहा है या नहीं। दुर्भाग्य यह है कि देश की नई पीढ़ी के नेता देश की तासीर से जुड़ने में नाकाम है। उनके लिए राजनीति मैनेज करने वाले तिकड़म की सफलता से ज्यादा कुछ नहीं है। वे राजनीति में आए ही इसलिए हैं क्योंकि या तो उन्हें अपने पिता की गद्दी का वारिस बनना है या फिर अपने अथवा अपने प्रायोजकों के व्यावसायिक साम्राज्य को चलाते रहने के लिए राजनीतिक संरक्षण प्राप्त करना है।

कांग्रेस, भाजपा, सपा, जनता दल, राजद, लोजपा, द्रमुक, पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस आदि किसी भी दल को लें, कम या अधिक यही सत्य सब जगह विद्यमान है। लेकिन इस सच को देश के हित में भी बदला जा सकता है। इन राजनीतिज्ञ पुत्र राजनेताओं को खुद को जनता के हितों से जुड़ने की जरूरत है। और यह जुड़ाव किसी जाति या संप्रदाय के आधार पर नहीं होना चाहिए, केवल और केवल परिश्रम-पराक्रम-प्रस्वेद और सात्विक प्रेम के आधार पर ही यह जुड़ाव होना चाहिए।

लेकिन जनसाधारण से इस जुड़ाव का मतलब तब क्या रह जाता है जबकि देश के हर हिस्से में बिना किसी आपदा के भी आम आदमी का जीवन लगातार दुरूह बनता चला जाए। भ्रष्‍ट अफसरशाही और व्यासायिक गिरोह अपने फायदे के लिए जनता का जीवन लगातार संकट में डालते चलने का स्वतंत्र हो जाएं। शासन-प्रशासन से जनता की दूरी लगातार बढ़ती चली जाए, इतनी बढ़ जाए कि त्राहिमाम् कर रहे समाज का एक वर्ग अपने हाथों में हथियार लेकर मरने-मारने पर उतारू हो जाए। इस स्थिति में बदल आना चाहिए। इस स्थिति को बदलने के लिए युवकों की फौज को शपथ लेकर देश के जनक्षेत्र-रणक्षेत्र में उतरना होगा। देश हमारा है, लोग अपने हैं, कोई गैर नहीं है, इसी भाव-भावना के साथ यदि बढ़ने का हौंसला रखा गया तो दिन दूर नहीं, देश फिर से समस्याओं से मुक्त होकर प्रगति के नवीन सोपानों पर चढ़ चलेगा। इस लिहाज से राहुल ने युवा राजनीतिज्ञों को एक रास्ता तो दिखाया ही है। कम से कम इस एक आदमी ने बिना किसी छल-प्रपंच, छुद्र कुटनीतिक-राजनीतिक बयानबाजी के देश की जनता के साथ सीधे तौर पर सम्बंध बनाने की कोशिश तो शुरू की है।

आज तत्काल जरूरत है ऐसे युवा राजनेताओं की, जो न केवल दीन-दलितों की झोंपड़ियों में रात गुजारें वरन् उनके हालात में आमूल-चूल परिवर्तन पैदा कर दें। उन्हें उद्यमी और उत्पादक बनाने की दिशा में काम करें। जो देश की अफसरशाही में आई सड़ांध को दूर करने का हौसला रखें, भ्रष्‍ट अधिकारियों, जमाखोर, दलाल कालाबाजारियों और कमीशन खोरों से इस समूचे देश के शासन-प्रशासन तंत्र, बाजार और व्यवस्था को बचाकर उसे शुद्धतम रूप में प्रतिश्ठापित कर सकें। ऐसे युवा नेता जो गांव के आदमी के लिए गांव में ही ससम्मान सृजनात्मक जीवन का प्रबंध कर सकें, जो हमारे दुर्दशाग्रस्त गांवों को स्वावलंबी, रोजगार युक्त बना सकें। आज के सूचना प्रौद्योगिकी के युग में यह हासिल करने लायक बहुत कठिन लक्ष्य नहीं है बशर्ते हमारे युवा सांसद तय करें कि हम भारत को भीड़ और स्लम से बजबजाते शहरों का देश नहीं बनने देंगे। गांवों की उन्नति को देश के विकास का पैमाना बनाएंगे।

राहुल गांधी ने देश के जन के प्रति अपनी संवेदना अभी केवल संपर्क के स्तर पर दिखायी है, विचार के स्तर पर उन्हें अभी खुद को साबित करना है। उन्हें राजनीति विरासत में मिली है। इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन यदि वंशवाद से प्रेरित होकर वह केवल खुद को कोटर विशेष में बंद रखेंगे तो बुराई अवष्य पैदा हो जाएगी। दिल और दिमाग खुला रखना पड़ेगा। यदि वह सारे देश का अपना घर और सारे समाज को अपना परिवार बनाने निकले हैं, सभी के हितों की हिफाजत का उन्हें यदि ख्याल है तो नि:संदेह उन्हें सफलता मिलेगी।

लेकिन यदि राहुल को मनमोहन और मंटेक सिंह की नीतियों पर ही यदि देश को आगे ले जाना है तो खबरदार… विकास की वर्तमान मृगमरीचिका में देश और जनसामान्य को भटकाए रखने के सिवाय वर्तमान नीतियों को लगातार आगे बढ़ाए रखने से कुछ हासिल नहीं होगा। अगर कुछ होगा तो यही कि यह देश अपने मूल से उखड़कर यत्र-तत्र-सर्वत्र कुंठित और अवसादग्रस्त होकर अनगिनत टुकड़ों में बिखर जाएगा। यह देश विभाजित हो जाएगा, होता जा रहा है। और इसे अमीर हिंदुस्तान और गरीब हिंदुस्तान का नाम देकर राहुल ने खुद ही पहचानने की कोशिश की है। कम से कम राहुल ने इसे स्वीकार तो कर लिया कि देश अमीर और गरीब हिंदुस्तान में बंट गया है। अन्यथा सत्तारूढ़ दल चाहे किसी पार्टी का शासन हो, अपने शासन में देश को दुनिया के सबसे उंचे षिखर पर ही पहुंचा समझता है और जैसे ही उसकी सरकार गिरती है, देश का कथित षिखर स्थान भी उसके लिए दूसरी पार्टी का शासन होने के कारण जमींदोज हो जाता है। सत्ताच्युत पार्टी के नेता तब देश रसातल में दिखने लगता है क्योंकि उनकी पार्टी को जनता रसातल में पहुंचा चुकी होती है। इस मुद्दे पर राहुल ने साफगोई से कहते हैं कि देश में अमीरी-गरीबी का विभाजन बढ़ गया है। जाहिर है, राहुल को यह भी स्वीकार करना होगा कि इस विभाजन को बढ़ाने में उनके खानदान का योगदान ही सर्वाधिक है क्योंकि गांधी खानदान ने ही अब तक अधिकांशत: देश की तकदीर का फैसला किया है। मनमोहन और मंटेक की जोड़ी जिस रसातल की ओर हिंदुस्तान को ले जा रही है, उन्हें सत्ता में बनाए रखने का काम भी गांधी खानदान की ही देन है। क्या राहुल मनमोहन और मंटेक की नीतियों को हिंदुस्तान से बाहर खदेड़ने का काम कर पाएंगे। यह एक बड़ा सवाल है जिसकी कसौटी पर आगे चलकर राहुल की परीक्षा होनी है।

नेतृत्व कैसा होना चाहिए, इसे तो बताने की कोशिश राहुल ने की है लेकिन नीतियां कैसी होनी चाहिए इसे भी उन्हें परिभाषित करना होगा। तभी वह इस देश की जनता का विश्‍वास जीत पाएंगे, अन्यथा उन्हें भी ठुकराने में जनता को देर न लगेगी।

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