लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

Posted On by &filed under चुनाव.


सिद्धार्थ शंकर गौतम

आमचुनाव २०१४ की प्रयोगशाला माने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने कहीं न कहीं क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती से स्थापित कर दिया है वहीं भाजपा-कांग्रेस के लिए इन चुनाव परिणामों ने उनकी राष्ट्रीय भूमिका पर प्रश्न-चिन्ह लगाया है। तमाम सियासी गुणा-भाग और समीकरणों से इतर उत्तरप्रदेश में साइकिल की चाल ने मदमस्त हाथी को झूमने का मौका ही नहीं दिया जबकि पंजा-कमल दोनों यहाँ खेत रहे। वैसे तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दोनों राष्ट्रीय दलों की साख दांव पर लगी हुई थी मगर दोनों ही दल जन-भावनाओं को समझने में विफल रहे। बात यदि कांग्रेस की करें तो इन चुनाव परिणामों ने एक बार पुनः यह सिद्ध कर दिया है कि अब गाँधी-नेहरु परिवार का नाम राजनीतिक हैसियत के मुताबिक़ अप्रासंगिक हो गया है। राहुल गाँधी की प्रतिष्ठा से जुड़े प्रदेश चुनाव में कांग्रेस की करारी हार से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। मसलन, बढ़ी हुई ढाढ़ी और बांह पर कुर्ता चढ़ाए राहुल के नकारात्मक प्रचार तथा बडबोले कांग्रेसियों की बदौलत कांग्रेस और राहुल; दोनों की छवि पर कुठाराघात हुआ है। यदि इसे ऐसे देखें तो प्रदेश से इतर गाँधी-नेहरु परिवार के गढ़ अमेठी और रायबरेली की १० विधानसभा सीटों में से कांग्रेस मात्र २ सीटों पर अपना वर्चस्व कायम रख पाई है। जबकि २००७ में इन्हीं सीटों की संख्या ७ थी। यानी पूरी ५ सीटों का नुकसान। अपने ही घर से मिली करारी पराजय को राहुल और सोनिया किस तरह लेते हैं यह देखने वाली बात होगी किन्तु इन क्षेत्रों में कांग्रेसी किले का ढहना २०१४ के लोकसभा चुनाव के लिहाज़ से अच्छा नहीं माना जा सकता। यदि थोडा पीछे इतिहास का रुख करें तो यह बात अक्षरशः सही लगती है कि वर्तमान में कांग्रेस स्वयं को जनता के समक्ष एक मजबूत विकल्प के रूप में रखने में कामयाब नहीं हो पाई है। गौर कीजिये; बिहार में लालू राज के बाद प्रदेश कीजनता ने नितीश कुमार को चुना वह भी लगातार दो बार। बंगाल में वाम किला ढहने के बाद वहां की जनता ने तृणमूल कांग्रेस को गले लगाया न कि कांग्रेस को। तमिलनाडू में जनता-जनार्दन द्रमुक की गोद से उतर अन्नाद्रमुक का आँचल था मने में ज्यादा मुफीद नज़र आई; बनस्बित कांग्रेस के। अब यही हाल उत्तरप्रदेश में हुआ। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि ये वही राज्य हैं जहां किसी समय कांग्रेस का एक-छत्र राज था और आज इन प्रदेशों में कांग्रेस का नाम-लेवा नहीं है। कांग्रेस के लिए यह तथ्य ज़रूर संतोषजनक हो सकता है कि २००७ के मुकाबले उसके वोट-बैंक में २ प्रतिशत की वृद्धि आई है।

वहीं भाजपा के नजरिये से देखें तो उत्तराखंड तथा उत्तरप्रदेश के नतीजों से पार्टी और उसके तमाम नेताओं को कोफ़्त हो सकता है। मणिपुर में तो भाजपा थी ही नहीं इसलिए उसकी बात करना बेमानी होगा। उत्तरप्रदेश में भाजपा ने उमा भारती, संजय जोशी, सूर्यप्रताप शाही, राजनाथसिंह जैसे नेताओं को चुनाव की कमान सौंपी किन्तु ४०३ विधानसभा सीटों के लिए मुख्यमंत्री के तीन दर्ज़न से अधिक महत्वाकांक्षी नेता पार्टी को ले डूबे। पार्टी अपना पिछला प्रदर्शन भी बरकरार नहीं रख पाई। पूरे प्रदेश में भाजपा को वोट-बैंक के हिसाब से २ प्रतिशत का नुकसान हुआ है। फिर मोदी-वरुण जैसे नेताओं की चुनाव प्रचार से दूरी भी भाजपा को आंशिक रूप से नुकसान पहुंचा गई।

दरअसल उत्तरप्रदेश में राष्ट्रीय दलों की विफलता ने कई सवालों को जन्म दे दिया है। मसलन; क्या क्षेत्र विशेषके मतदाताओं ने क्षेत्रीय समस्याओं के निदान हेतु अपने ही बीच के लोगों और दलों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है? इस तरह की राजनीति की शुरु आतक्या गुल खिलाती है यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के भविष्य पर यह सवालिया निशान लगाने जैसा है। पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने राष्ट्रीय दलों को यह अहसास भी करवा दिया होगा कि मात्र सत्ता पर काबिज़ होने हेतु क्षेत्रीय पार्टियों को आश्रय देना या उनके साथ गठजोड़ करना स्वयं के अस्तित्व को समाप्ति की ओर अग्रसर करना है। सपा-बसपा को पूर्व में मिले साथ से तो यही साबित हो रहा है। कई लोगों के ज़ेहन में यह प्रश्न भी उठ रहे होंगे कि मायाराज से पूर्व सपा की गुंडई सरकार को जनता नेनकार दिया था लेकिन इस बार उसी जनता ने उसे पूर्ण बहुमत देकर सर-माथे बिठाया है। ऐसा क्यूँ ? इसका सीधा सा उत्तर है कि सपा ने जिस तरह से स्वयं को बसपा के विकल्प के रूप में राज्य की जनता के समक्ष प्रस्तुत किया; भाजपा-कांग्रेस ऐसा करने में नाकाम रहीं। फिर कांग्रेस का एक-पक्षीय नकारात्मक प्रचार तो भाजपा की गुटबाजी जनता को रास नहीं आई। सपा ने जिस तरह खुद को राज्य के विकास हेतु अवश्यम्भावी बताया; वह जनता को रास आया और परिणाम सबके सामने हैं।

उत्तरप्रदेश में परिवारवाद को पोषक देने वाले कई राजनीतिक परिवारों के चिराग जनता ने जलने से पहले ही बुझा दिए। कई बड़े नेताओं की राजनीतिक आशंकाओं को जनता ने परवान ही नहीं चढ़ने दिया। कई मजबूत किले ढहा दिए गए तो कई नए चेहरों का उदय हुआ। चुनाव मतदान पूर्व धर्म, जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद को लेकर जितने भी जतन राजनीतिक दलों द्वारा किए गए, जनता ने सभी को धूल चटा दी। उदाहरण के लिए; २१ मुस्लिम बहुल जिलों में से १४ जिले पश्चिमी उत्तरप्रदेश में थे। यहाँ की १३६ विधानसभा सीटों पर यूँ तो मख्य मुकाबला सपा-कांग्रेस का था मगर जनता ने साम्प्रदायिकता की राजनीति को नकारते हुए सभी को आइना दिखा दिया। सबसे ज्यादा नुकसान तो कांग्रेस का हुआ है। ११८ विधानसभा सीटों वाले अवध प्रदेश में जाटव, कुर्मी और दलित बहुसंख्यक हैं। कांग्रेस ने यहाँ कुर्मी बेनीबाबू को आगे किया लेकिन अपनी रंग-बदलू राजनीति की वजह से बेनी बाबू ने अपनी ही पार्टी का नुकसान करवा दिया। बुंदेलखंड ने ज़रूर कांग्रेस-भाजपा को वोट प्रतिशत के लिहाज़ से राहत दी होगी जहां दोनों का वोट प्रतिशत क्रमशः २ और ३ प्रतिशत रहा है। वहीं पूर्वांचल में कांग्रेस-भाजपा दोनों को नुकसान हुआ है। प्रदेश में आए स्पष्ट जनाधार से कहा जा सकता है कि राज्य में अब विकास की बात करने वाला ही मुख्यमंत्री का ताज पहनने का अधिकारी होगा और धर्म, जाति, क्षेत्र इत्यादि की राजनीति करनेवालों को यूँ ही मायूस होना पड़ेगा।

पंजाब में भी यही हुआ। यहाँ भी विकास का मुद्दा और उसकी इच्छा-शक्ति ही ४६ सालों बाद इतिहास रचने में कामयाब रही। अकाली दल-भाजपा गठबंधन पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप थे लेकिन राज्य में विकास भी उसी शिद्दत से हुआ था। दरअसल भारतीय जनमानस की अब यह सोच बन गई है कि जो भी सरकारें आएँगी वे भ्रष्ट होंगीं एवं लूट-तंत्र को बढ़ावा देंगी। इस स्थिति पर काबू नहीं पाया जा सकता। लिहाजा जनता अब भ्रष्टाचार को उतना महत्व नहीं देती जितना कि विकास को। आप विकास करिए फिर चाहे जितना भ्रष्टाचार कीजिये; जनता आपको चुन ही लेगी। यह हमारे लोकतंत्र के लिए विडम्बना ही है। बादल सरकार चारों ओर से घिरी हुई थी और तमाम राजनीतिक विश्लेषक भी यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि इस बार बादल परिवार की सत्ता का सूरज डूब जाएगा। मगर चुनाव परिणामों ने कांग्रेस सहित सभी पार्टियों की नींद उड़ा दी। पंजाब में कांग्रेस कीविफलता में एक महत्वपूर्ण कड़ी बसपा का चुनावी रण में होना रहा। बसपा को हालांकि एक भी सीट नहीं मिली लेकिन उसने कांग्रेस का वोट प्रतिशत तो गिरा ही दिया। भाजपा भी राज्य में पुराने प्रदर्शन को दोहराने में नाकामयाब रही। वैसे यहाँ बसपा की धमक ने भविष्य की राजनीतिक तस्वीर को धुंधला अवश्य कर दिया है जिसका राज्य की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव होना तय है। साँझा-मोर्चा की असफलता भी राज्य में नए समीकरणों को जन्म दे रही है। वैसे पंजाब में बादल परिवार के प्रति सहानुभूति की लहर ने भी उसे पुनः सत्ता सुखसे नवाज़ा है। सुखबीर सिंह बादल ने राज्य के लोगों के समक्ष अपने पिता प्रकाश सिंह बादल की बढ़ती उम्र और अंतिम राजनीतिक चुनाव का वास्ता देकर खूबवोट बटोरे। फिलहाल तो यहाँ इतिहास रचा जा चुका है और राज्य में अकाली दल-भाजपा गठबंधन पुनः पांच वर्ष के लिए सत्ता पर काबिज़ होने जा रहा है।

उत्तराखंडमें खंडूरी है ज़रूरी का नारा भी भाजपा को नहीं बचा सका। खंडूरी स्वयं तो चुनाव हारे ही, राज्य में आगामी सरकार की स्थिति भी असमंजस में आ गई है। भाजपा जहां ३१ विधानसभा सीटें जीतने में कामयाब रही है तो कांग्रेस ने ३२ विधानसभा सीटें अपने कब्जे में की है। यानी सरकार के गठन हेतु निश्चित रूपसे निर्दलियों की मदद चाहिए होगी। यहाँ भी बसपा ने राजनीतिक पंडितों को चौंकाया है और पार्टी ३ सीटों पर विजयी रही है। देखा जाए तो बसपा उत्तराखंड में किंग-मेकर की भूमिका में नज़र आ रही है। सरकार किसकी होगी, अभी तय नहींहै लेकिन भाजपा को यहाँ नुकसान ज़रूर हुआ है। नुकसान तो बाबा रामदेव और अन्ना टीम का भी है जिन्होंने राज्य में कांग्रेस के खिलाफ ज़मकर प्रचार किया किन्तु इसके इतर कांग्रेस राज्य में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। एक बात तो साफ़ है कि अब उत्तराखंड भी गठबंधन की राजनीति की प्रयोगशाला बनने जा रहा है जहां कोई भी पूर्वानुमान लगाना बेमानी होगा। यहाँ आगामी सरकार का भविष्य भी अनिश्चय की स्थिति में है।

गोवा में भाजपा की दमदार वापसी से कांग्रेस को करारा झटका लगा है। यहाँ तक कि कैथोलिक ईसाईयों के गढ़ में भी भाजपा सेंध लगाने में कामयाब रही है। भ्रष्टाचार का मुद्दा यहाँ भी प्रासंगिक था मगर विकास न होने का मुद्दा कांग्रेस को ले डूबा। राज्य में भाजपा का वोट प्रतिशत ५ फ़ीसदी तक बढ़ा है जो कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी राहत मणिपुर जीत से मिली होगी जहां पार्टी लगातार तीसरी बार सरकार बना रही है। लेकिन राज्य में तृणमूल कांग्रेस को मिला जनाधार भविष्य में कांग्रेस केलिए खतरनाक हो सकता है। गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में ७ सीटों पर परचम फैलाया है। जहां तक बात भाजपा की है तो पार्टी यहाँ चुनावी परिदृश्य में ही नहीं थी।

कुल मिलाकर पांच राज्यों के चुनाव परिणाम भाजपा-कांग्रेस के लिए आत्म-चिंतन का मौका साबित हो सकते हैं जहां दोनों दल अपने घटते जनाधार और राष्ट्रीय राजनीति में खुद की प्रासंगिकता को बरकरार रखने हेतु विचार-विमर्श कर सकें और २०१४ के आम चुनाव के लिए तैयारियों को अमलीजामा पहनाने में आसानी हो। चुनाव परिणाम तो यही इंगित करते हैं कि यदि दोनों राष्ट्रीय दलों ने अपनी रणनीतियों में बदलाव नहीं किया तो राजनीति में तीसरे मोर्चे की प्रासंगिकता बढ़ जाएगी। जहां तक पांच राज्यों के चुनाव परिणामों का केंद्र सरकार पर असर पड़ने की बात है तो यह तो निश्चित है कि कांग्रेस को अब फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा वरना २०१४ के आम चुनाव उसके लिए डरावना सपना साबित हो सकते हैं।

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz