लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

wto के नेतृत्व में विश्व व्यापार सुविधा नियमों में सुधारों के सिलसिले में भारत का कठोर रूख सही दिशा में बढ़ाया गया कदम साबित हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृढ़ता के चलते व्यापार सुगमता करार पर अमेरिका ने नरम रुख अपना लिया है। उसने खाद्यान्न भंडारण के मुद्दे पर भारत के प्रस्ताव का सर्मथन करने की सहमति दे दी है । अमेरिका के इस सर्मथन से दोनों देशों के बीच करार पर जारी गतिरोध अब खत्म हो जाएगा। इस पहल से विश्व व्यापार संगठन में टीएफए के अमल का रास्ता भी खुल जाएगा। याद रहे इसी साल जुलाई में मोदी ने टीएफए के क्रियान्वयन से हाथ खींचकर दुनिया को चैंका दिया था।

किसी भी देश के राष्ट्रप्रमुख की प्रतिबद्धता विश्व व्यापार से कहीं ज्यादा देश के गरीब व वंचित तबकों की खाघ सुरक्षा के प्रति ही होनी चाहिए। लिहाजा राजग सरकार ने संप्रग सरकार की नीतिगत पहल का जेनेवा में सर्मथन किया था। 160 सदस्यों वाले डब्ल्यूटीओ में नरेंद्र मोदी ने शिरकत करते हुए समुचित व्यापार अनुबंध ;ट्रेड फैलिसिटेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इस करार की सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी कि संगठन का कोई भी सदस्य देश,अपने देश में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों के मूल्य का 10 फीसदी से ज्यादा अनुदान खाद्य सुरक्षा पर नहीं दे सकता। जबकि भारत के साथ विडंबना है कि नए खाद्य सुरक्षा कानून के तहत देश की 67 फीसदी आबादी खाद्य सुरक्षा के दायरे में आ गई है,इसके लिए बतौर सब्सिडी जिस धनराशि की जरूरत पड़ेगी वह सकल फसल उत्पाद मूल्य के 10 फीसदी से कहीं ज्यादा बैठती। इस लिहाज से इस मुद्दे पर मोदी का अंगत के पांव की तरह अडिग बने रहना जरूरी था।

जेनेवा में भारत पर अमेरिका,यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया का दबाव था कि इन देशों के व्यापारिक हितों के लिए भारत अपने गरीबों के हित की बलि चढ़ा दे। विकसित देश चाहते थे कि विकासशील देश समुचित व्यापार अनुबंध की सभी शर्तों को जस की तस मानें। जबकि इस अनुबंध की खाद्य सुरक्षा संबंधी शर्त भारत के हितों के विपरीत है। दिसंबर 2013 में भी इन्हीं विषयों को लेकर इंडोनेशिया के बाली शहर में डब्ल्यूटीओ की बैठक हुई थी, तब पूर्व वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने भी इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

दरअसल दुनिया के विकासशील देशों की खाद्य सुरक्षा की सब्सिडी को नियंत्रित करने की पृष्ठभूमि में विकसित देश हैं। इसके उलट जी-33 भारत समेत 46 देशों का ऐसा समूह है,जो अनाज की सरकारी खरीद और गरीब व वंचित समूह को खाद्य सहायता देने के अधिकार के मुद्दे पर अडिग है। विकसित देश चाहते हैं कि भारत जैसे विकासशील देश अपनी खाद्य सब्सिडी मसलन सार्वजानिक वितरण प्रणाली के जरिए दी जाने वाली सरकारी इमदाद को मौजूदा नियमों के दायरे में रखें। यानि,सब्सिडी कुल कृषि उत्पाद मूल्य के 10 प्रतिशत के दायरे तक सीमित रहे। इसके लिए विकसित देश अंतरिम शांति उपबंध के तहत चार साल की मोहलत देना चाहते थे। इसके बाद यदि सब्सिडी की सीमा 10 फीसदी के ऊपर निकली तो इसे टीए़फए की शर्तों का उल्लंघन माना जाता और शर्त तोड़ने वाले देश पर जुर्माना लगाया जाता।

दरअसल इस सीमा का निर्धारण 1986-88 की अंतरराष्ट्रिय कीमतों के आधार पर किया गया था। इन बीते ढाई दशक में मंहगाई ने कई गुना छलांग लगाई है। इसलिए इस सीमा का भी पुनर्निर्धारण जरूरी है। यही वह दौर रहा है, जब भूमण्डलीय आर्थिक उदारवाद की अवधरणा ने बहुत कम समय में ही यह प्रमाणित कर दिया कि वह उपभोक्तावाद को बढ़ावा देकर अधिकतम मुनाफा बटोरने का उपाय भर है। टीएफए की सब्सिडी संबंधी शर्त, औद्योगिक देश और उनकी बहुराष्ट्रिय कंपनियों के इसी मुनाफे में और इजाफा करने की दृष्टि से लगाई गई है। जिससे लाचार आदमी के आजीविका के संसाधनों को दरकिनार कर उपभोगवादी वस्तुएं खपाई जा सकें। नव-उदारवाद की ऐसी ही इकतरफा व विरोधाभासी नीतियों का नतीजा है कि अमीर और गरीब के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही है। दरअसल देशी व विदेशी उद्योगपति पूंजी का निवेष दो ही क्षेत्रों में करते हैं, एक उपभोक्तावादी उपकरणों के निर्माण और वितरण में, दूसरे प्राकृतिक संपदा के दोहन में। यही दो क्षेत्र धन उत्सर्जन के अह्म स्त्रोत हैं। उदारवादी अर्थव्यस्था का मूल है कि भूखी आबादी को भोजन के उपाय करने की बजाय,विकासशील देश पूंजी का केंद्रीयकरण एक ऐसी निश्चित आबादी पर करें,जिससे उसकी खरीद क्षमता में निरंतर इजाफा होता रहे। छठा वेतनमान मनमोहन सिंह सरकार ने इसी उदारवादी अर्थव्यस्था के पोषण के लिए लागू किया था। जाहिर है, अंततः यह व्यवस्था सीमित मध्यवर्ग और उच्चवर्ग को ही पोषित करने वाली है। लिहाजा डब्ल्यूटीओ को गरीब देशों की रियायतों से जुड़ी लोक कल्याणकारी योजनाएं आंखों में खटकती रहती हैं। यह पहली मर्तबा है कि नरेंद्र मोदी की चुनौती के चलते अमेरिका की चौधराहट पर अंकुश लगा है।

भारत जैसे विकासशील देश अपनी आबादी के कमजोर तबके के लोगों की खाद्य सुरक्षा जैसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए बड़ी मात्रा में अनाज की समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद करते हैं। फिर इसे रियायती दरों पर पीडीएस के जरिए सस्ती दरों पर बेचा जाता हैं। यहां तक की रूपया किलो गेंहूं और दो रूपए किलो चावल बेचे जा रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार तो आयोडीनयुक्त नमक भी रूपैया किलो दे रही है। यदि गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले व्यक्ति के अजीविका की यह खाद्य सामग्री रियायती दरों पर नहीं मिलेंगे तो भारत समेत अन्य कई देशों की बड़ी आबादी भूख के चलते दम तोड़ देगी।

भारत खाद्य सुरक्षा पर दी जाने वाली सब्सिडी को इसलिए नियंत्रित नहीं कर सकता, क्योंकि खाद्य सुरक्षा का दायरा बढ़कर कुल आबादी का 67 फीसदी हो गया है। मसलन करीब 81 करोड़ लोगों को रियायती दर पर अनाज देना है। अभी तक सालाना 85 हजार करोड़ रूपए खाद्य सब्सिडी पर दिए जा रहे थे। खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद यह सब्सिडी बढ़कर 1.24 लाख करोड़ हो चुकी है। इसे पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्री बड़ा राजकोषीय घाटा मानते हैं। जबकि 2014-15 के अंतरिम बजट में ही औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने की दृष्टि से मनमोहन सिंह सरकार ने करों की छूट के बहाने 5.73 लाख करोड़ रूपए की छूंटें दी थीं। जबकि भारत का वर्तमान में वित्तीय घाटा 5.25 लाख करोड़ रूपए है। जाहिर है, इस घाटे की पूर्ति उद्योग समूहों को दी गई छूट से आसानी से की जा सकती थी, लिहाजा घाटे का रोना फिजूल है।

दूसरी तरफ भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में फसलों के समर्थन मूल्य में डेढ़ गुना वृद्धि करने की बात कही है। यदि मोदी सरकार इस वादे पर अमल करती है तो स्वाभाविक है, सब्सिडी खर्च और बढ़ेगा। सरकार को इस वादे पर इसलिए अमल करना जरूरी है,क्योंकि उसे देश की 320 ग्रामीण संसदीय सीटों पर जीत हासिल हुई हैं। ऐसे में किसान और गरीब के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ? शायद इसीलिए सरकार टीएफए पर अडिग बनी रही थी और अब उसके इस रूख का समर्थन अमेरिका ने भी कर दिया है। क्यूबा, वेनेजुएला और बोलिविया भारत के साथ पहले से ही थे।

जेनेवा में भारत के सख्त रवैये से अमेरिका की चौधराहट को जबरदस्त धक्का लगा था। दरअसल डब्ल्यूटीओ का विधान बहुमत को मान्यता नहीं देता। इसमें प्रावधान है कि किसी भी एक सदस्य देश की आपत्ति, करार को यथास्थिति में बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। इसलिए अमेरिका को कहना पड़ा था कि डब्ल्युटीओ संकट के कगार पर है। पर अब अमेरिका की सहमति से डब्लूटीओ और टीएफए संकट मुक्त हो गए हैं।

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