लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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food-grainsप्रमोद भार्गव

 

लंबे इंतजार के बाद लोकसभा में पारित होने के बाद सबकी भूख मिटाने का कानून धरातल पर आ गया है। आगे आने वाली अड़चने भी दूर हो जाएगीं। लेकिन अब कांग्रेस के लिए इस महत्वाकांक्षी विधेयक को ठीक से अमल में लाना बड़ी जिम्मेबारी है। अन्यथा इसका हश्र भी शिक्षा अधिकार कानून और प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेष में की गयी छूटों की तरह होना तय है। इस कानून के तहत केंद्र सरकार देश की दो तिहार्इ आबादी को एक से तीन रूपये किलो की रियायती दरों पर हर महीने पांच किलो अनाज देगी। देर से लिया गया यह सही फैसला है। क्योंकि 2009 में सप्रंग के साझा चुनावी घोशणा-पत्र में यह वादा किया था कि यदि फिर से सत्ता में वापिसी होती है तो वह सौ दिन के भीतर खाध सुरक्षा विधेयक लाकर भूखी जनता को भोजन का हक दिला देगी। लेकिन विडंबना देखीए सरकार सबा चार साल बाद इस विधेयक को ला पार्इ। अभी भी धन की सुनिश्चित व्यवस्था की आशंका बनी हुर्इ है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरूस्त किए बिना 67 प्रतिषत आबादी को पांच किलो अनाज प्रति माह,प्रति व्यक्ति देना ही मुश्किल काम है। इसीलिए विपक्ष इस कवायद को वोट सुरक्षा कानून कह रहा है।

सप्रंग को आशंका थी कि लोकसभा में इस पर बहस कराने से मामला अटक जाएगा। क्योंकि संप्रग गठबंधन के सहयोगी दलों समेत अन्य विपक्षी दल 2014 के आमचुनाव के ठीक पहले विधेयक को लागू करने की इस वोट लुभावन रणनीति को महज चुनावी हथकंडा मान कर चल रहा था। लेकिन सरकार ने विधेयक से जुड़े संशोधन पर चर्चा के साथ मत विभाजन कराकर संसदीय गरिमा का पालन करते हुए विधेयक लोकसभा से पारित कराया।

जनकल्याण व वित्तीय रूढ़ीवादी अंतर्विरोध का भी यह विधेयक हिस्सा बनता रहा है। जनकल्याण की दृष्टि से खाध सुरक्षा विधेयक इसलिए अहम है,क्योंकि यह लागू हो जाता है तो देश की 67 फीसदी आबादी को सस्ता अनाज हासिल कराने का कानूनी हक प्राप्त हो जाएगा। लेकिन विधेयक में इतनी बड़ी योजना को जमीन पर उतारने के लिए इतनी बड़ी सवा लाख करोड़ की धनराशि किन स्त्रोतों से हासिल होगी इसका कोर्इ उल्लेख नहीं है। हालांकि ऐसा नहीं है कि सरकार को धनराशि जुटाना कोर्इ मुश्किल काम है, क्योंकि सरकार पिछले कुछ सालों से हरेक वित्तीय साल में औधोगिक घरानों को पांच से छह लाख करोड़ की करों में छूट देती  रही है। किंतु उधोगपतियों के समक्ष शरणागत की मुद्रा में काम कर रही मनमोहम सरकार गरीबों के हित संरक्षण की दृष्टि से दृढ़ इच्छाशक्ति जताएगी।

अनाज के उत्पादन,भंडारण और वितरण का रोना भी रोया जाता है। यह विधेयक मौजूदा सूरत में लागू होता है तो साढ़े छह हजार टन अतिरिक्त अनाज की जरूरत पड़ेगी। फिलहाल हमारे यहां 25 करोड़ टन अनाज का उत्पादन होता है। जाहिर है, इस लक्ष्यपूर्ति के लिए कृषि क्षेत्र में निवेष बढ़ाकर फसल उत्पादन एक चुनौती के रूप में पेष आएगी। इसी अनुपात में खाद व कीटनाशकों और सिंचार्इ के लिए बिजली व पानी की उपलब्धता जरूरी होगी। अनाज का उचित भंडारण भी एक बड़ी समस्या है। फिलहाल भारतीय खाध निगम के गोंदामों की भंडारण क्षमता 664 लाख टन है। इस सिथति में ज्यादा पैदावर के चलते करीब 250 लाख टन अनाज खुले में पड़ा रहता है। इसमें भी बड़ी मात्रा में बारिश से खराब  हो जाता है। इस समस्या के हल के लिए खाध मंत्रालय ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि मनरेगा के मध्यम से पंचायत स्तर पर भंडार घरों का निर्माण बड़ी संख्या में कराया जाए। साथ ही ग्राम पंचायत के तहत भी किसानों के समूह बनाकर उन्हें भंडारण की जिम्मेबारी सौंपी जाएं। इसी अनाज को सार्वजानिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सस्ती दरों पर खाध सुरक्षा के दायरे में आने वाले गरीबों को बेच दिया जाए। इस प्रकि्रया से अनाज का जो छीजन लदार्इ-डुलार्इ में होता है, उससे निजात मिलेगी और यातायात खर्च भी बचेगा। लेकिन एक साल पहले कि गर्इ इस सिफारिश को विधेयक में शामिल नहीं किया गया, क्योंकि नौकरशाही को आमद इन्हीं मदो से बिना किसी अड़चन के होती है। अलबत्ता 484 रूपये प्रति किंवटल खाधान्न के रख-रखाव में खर्च होने वाली यह राशि किसान को अनाज भंडारण के बदले में दे दिए जाने के उपाय कर दिए जाते तो किसान की यह अतिरिक्त आमदानी होती,फलस्वरूप उसकी माली हालत मजबूत होती।

केंद्र सरकार को उन राज्य सरकारों से भी मशविरा लेने की जरूरत थी। जो अपने ही मौजूदा आर्थिक स्त्रोतो के बूते गरीबों को एक व दो रूपये किलों गेहूं चावल देने लगे हैं। मध्यप्रदेश सरकार तो अन्नपूर्णा योजना के तहत एक रूपये किलो नमक भी दे रही है। वर्तमान में मध्यप्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़,तमिलनाडू,ओडीसा और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकारों ने अपनी गरीब व वंचित आबादी को भोजन का अधिकार दिया हुआ है। छत्तीसगढ़ सरकार के खाध सुरक्षा कानून को तो एक आर्दश नमूना माना जा रहा है। यहां कि 90 फीसदी आबादी को भोजन का अधिकार दिया गया है। हांलाकि यह व्यवस्था पीडीएस के माध्यम से ही आगे बढ़ार्इ गर्इ है, इसलिए इस खाध सुरक्षा को एकाएक असंदिग्ध नहीं मना जा सकता ? फिर भी इसमें कुछ ऐसे उपाय किए गए है,जो भुखमरी और कुपोषण की समस्या से निजात दिलाते लगते हैं। इसमें रियायती अनाज पाने की पात्रता के लिए परिवार को आधार बनाया है, न कि व्यक्ति को ? राशन कार्ड घर की सबसे बुजुर्ग महिला के नाम बनाए जाने का प्रावधान है। आयकर अदा करने वाले और गैर आदिवासी क्षेत्रों में चार हेक्टेयर सिंचित या आठ हेक्टेयर असिंचित कृषि भूमि के स्वामी इसके दायरे में नहीं आएंगे। इसके आलावा जिन परिवारों के पास षहरी क्षेत्र में एक हजार वर्ग फीट का पक्का मकान है,वे भी इस लाभ से वंचित रहेंगे। पीडीएस अनाज का गोलमाल करने वाले अधिकारियों को दंडित करने का प्रावधान भी विधेयक में है।

बावजूद विधेयक की अभी तक अधिसूचना जारी नहीं हुर्इ है, मसलन अभी इसे मैदान में नहीं उतारा गया है और विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। जाहिर है, अधिसूचना लागू हो जाती है तो यह विधेयक भी महज चुनावी झुनझुना साबित होगा। क्योंकि इसे ठीक से लागू अगली सरकार ही कर पाएगी ? बहरहाल,खाध सुरक्षा जैसे गंभीर और जरूरी मसले को वोट कबाड़ने के तात्कालिक लाभ की दृष्टि से देखने की बजाए इसे गरीबों के वास्ताविक भोजन के हक और किसानों की माली हालत सुधारने के व्यापक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। इस लिहाज से जरुरी है कि भूख और कुपोषण से हमेशा के लिए छुटकारा दिलाना है तो गरीबों को नियमित रोजगार और न्यूनतम मजदूरी की दर तय किये जाने की जरुरत है। क्योंकि 82 करोड़ लोगों को दी जाने वाली खाध सुरक्षा योजना समस्या का स्थायी हल नही हो सकती ? इसलिए कुछ ऐसे लक्ष्य लेकर चलने होंगे जो भुखमरी को खत्म करें। इस मकसद पूर्ति के लिए जरुरी है कि ग्रामीण वंचितों को कृषि उत्पादन, भण्डारण और खाध प्रसंशकरण जैसे नियमित रोजगारों से जोड़ा जाए।

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