लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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व्यंग्य बाण :  arvind kejariwal cartoon caricature copy
पिछले दिनों सम्पन्न हुए चुनावों के परिणाम आने के बाद शर्मा जी काफी दिन उदास रहे। इस दौरान वे कुछ-कुछ आध्यात्मिक भी हो गये और नियमित रूप से पड़ोस के मंदिर में हो रही भागवत कथा में जाने लगे। एक दिन वक्ता ने सुख और दुख की व्याख्या करते हुए कहा कि केवल दुख को ही अपना साथी बना लेने से जीवन भार बन जाता है। इसीलिए हमारे मनीषियों ने ‘तेरहवीं’ का विधान बनाया है। अर्थात किसी की मृत्यु होने पर 13 दिन तक शोक मनाकर अपने काम में लग जाना चाहिए। यही संसार की रीत है।
बात शर्मा जी के मन को लग गयी। अतः उन्होंने भी 13 दिन बाद चुनावी दुख की चादर को कंधे से उतार दिया। दिल्ली में कांग्रेस के समर्थन से केजरी आआपा (आम आदमी पार्टी) की सरकार बनने के बाद उन्होंने मन को समझा लिया कि अब तक वे भले ही ‘हाथ’ के साथ हों; पर अब उन्हें ‘झाड़ू वाले हाथ’ का समर्थन करना है। कई दिन ऐसे ही बीत गये; पर फिर मोहल्ले में कुछ समस्याएं आने लगीं। पहले बिजली की कटौती दो घंटे की होती थी; पर अब वह चार घंटे होने लगी। पानी भी सुबह-शाम दो की बजाय डेढ़ घंटे ही आने लगा। ऐसे में सब लोगों को चिंतित होना ही था। शर्मा जी का घर चौथी मंजिल पर है, इसलिए उन्हें पानी का कष्ट कुछ अधिक ही हो रहा था। अतः मोहल्ले वालों ने उनके नेतृत्व में जल बोर्ड के कार्यालय में जाकर धरना दे दिया।
वहां पहुंचकर सबने ‘जिन्दाबाद-मुर्दाबाद’ के नारे लगाये। इससे जहां एक ओर शरीर में कुछ गरमी आयी, तो दूसरी ओर अंदर तक आवाज भी पहुंच गयी। कुछ ही देर में एक व्यक्ति ने बाहर आकर उन्हें अंदर आने को कहा। अंदर एक अधिकारी सूट-बूट पहने बैठे थे। शर्मा जी ने बात शुरू की – सर, हमारे मोहल्ले में पानी वैसे ही कम आता है और पिछले कुछ दिन से उसका दबाव भी बहुत कम हो गया है।
– देखिये, कुछ दिन प्रतीक्षा करें। अभी सरकार नयी-नयी बनी है। हर घर में 20,000 लीटर पानी देने की व्यवस्था भी बनानी है। यह काम आसान नहीं है; पर सरकार ने कहा है, तो करना ही है।
– लेकिन केजरीवाल साहब कह रहे हैं कि यह ‘आप’ की सरकार है, इसलिए जनता को कोई कष्ट नहीं होगा।
– जी हां, यह ‘आप’ की सरकार है। इसे ‘आप’ लोगों ने ‘आप’ के ही लिए चुना है, अतः ‘आप’ को धैर्य रखना चाहिए।
– पर हमें कब तक धैर्य रखना होगा ?
– यह तो आप लोग ‘आप’ की सरकार से ही पूछें।
अधिकारी ने घंटी बजाई, तो कुछ और लोग अंदर आ गये। शर्मा जी समझ गये कि यह उनके लिए उठने का संकेत है। अतः वे चुपचाप बाहर आ गये।
दो दिन बाद मोहल्ले वालों ने बिजली कार्यालय पर धरना दिया; पर उस समय खुद बिजली कार्यालय में ही बिजली नहीं थी। ऐसे में बात क्या खाक होती ? शर्मा जी समझ गये कि बिजली विभाग भी ‘आप’ से प्रभावित और प्रताडि़त अनुभव कर रहा है।
कुछ दिन तक शर्मा जी शांत बैठे रहे; पर बेचैन आत्मा को चैन कहां ? सो वे अपनी पार्टी के कार्यालय में जा पहुंचे। वहां गंदगी का साम्राज्य व्याप्त था। कोने में झाड़ू भी रखी थी; पर कोई उसे छूने को तैयार नहीं था। थोड़ी देर में एक पदाधिकारी महोदय आये। शर्मा जी ने उन्हें ही घेर लिया – आपने केजरी आआपा को समर्थन दिया है; पर उनके लोग हमें कोई महत्व नहीं दे रहे हैं। हमारी समस्याएं भी पहले जैसी ही हैं।
– तो मैं क्या कर सकता हूं ? हमने नरेन्द्र मोदी को रोकने के लिए सरकार बनवायी है, समस्याएं सुलझाने के लिए नहीं।
– पर इससे दिल्ली में हम तो समाप्त हो जाएंगे ?
– तो क्या हुआ, मोदी तो रुक जाएगा।
शर्मा जी ने ज्यादा सिर मारना ठीक नहीं समझा और वे ‘आआपा’ के कार्यालय पहुंच गये। बाहर बड़ी-बड़ी गाड़ियों की भीड़ लगी थी। अंदर सैकड़ों लोग आम आदमी की टोपी लगाये खड़े थे। सब अपनी स्वयंसेवी संस्था (एनजीओ) की फाइल आगे करने की जुगाड़ में थे। किसी की जेब में दो एनजीओ थे, तो किसी के तीन। ये आम आदमी के नाम पर संस्थाएं बनाकर मजे करने वाले ‘खास लोग’ थे। कुछ विदेशी भी फाइलें लिये खड़े थे। कई लोग नयी संस्था बनाने की विधि पूछ रहे थे। किसी के हाथ में झाड़ू था, तो किसी ने अपनी टोपी में खिलौना झाड़ू सजा रखा था।
शर्मा जी ने एक नेता जैसे ‘आम आदमी’ से अपने मोहल्ले की बिजली और पानी की चर्चा की। उसने आंखें निकालते हुए कहा – इसके लिए सरकार के पास जाओ। हमें तो मार्च तक अपने एनजीओ का बजट पूरा खर्च करना हैं। नहीं तो आगे पैसा नहीं मिलेगा।
शर्मा जी हताश होकर चलना ही चाहते थे कि वहां शोर मच गया। बड़े एनजीओ वाले छोटों को झाड़ू मारकर बाहर भगा रहे थे। कोई खुद को केजरीवाल का ‘खास आदमी’ कह रहा था, तो कोई सिसौदिया का। यह ‘झाड़ू युद्ध’ बड़ा भीषण था। एक आदमी दोनों हाथ में झाड़ू लिये तलवार की तरह चलाने लगा। जरूर वह कोई पुराना अखाड़ेबाज रहा होगा। अचानक टोपियां उछलने और फटने लगीं। कार्यालय में हाहाकार मच गया। दूरदर्शन वाले इसे ‘लाइव’ दिखाने लगे। एक ने इसे ‘फेसबुक’ पर डाल दिया। तभी दृश्य बदल गया। लोग एक दूसरे के हाथ से छीनकर फाइलें फाड़ने लगे। अब लोगों को भी अपने से अधिक अपनी फाइलों की चिंता थी। मारपीट के बीच गालियां भी बरस रही थीं जिनका स्तर आम आदमियों जैसा ही था। एक नेता जी ने सबको चुप कराने का प्रयास किया, तो सबने मिलकर उनके कपड़े ही फाड़ दिये। शर्मा जी ने कल बड़े दुखी मन से यह सब बताया। मैंने कहा कि जब किसी को उसकी आशा से बहुत अधिक मिल जाता है, तो ‘प्यादे से फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाय’ वाला हाल हो ही जाता है।
– पर वर्मा जी, अभी यह हाल है तो आगे क्या होगा ?
– इस बारे में तो उर्दू के एक कवि कह ही गये हैं –
इब्तदा-ए-इश्क है रोता है क्या,
आगे-आगे देखिये होता है क्या ?
शर्मा जी आंखें फाड़कर मेरी ओर देखने लगे।

कार्टून-साभार

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