लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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13 अक्तूबर: अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दिवस

droughtचार यार हों तैयार, तो सूखे में भी सुख

सूखा पहले कभी-कभी आता था; अब हर वर्ष आयेगा। कहीं न कहीं; कम या ज्यादा, पर आयेगा अवश्य; यह तय मानिए। यह अब भारत भौगोलिकी के नियमित साथी हैं। अतः अब इन्हे आपदा कहने की बजाय, वार्षिक क्रम कहना होगा। वजह एक ही है कि सूखा अब आसमान से ज्यादा, हमारे दिमाग में आ चुका है। हमने धरती का पेट इतना खाली कर दिया है कि औसत से 10-20 कम फीसदी वर्षा में भी अब हम, हमारे कुएं, हमारे हैण्डपम्प और हमारे खेत हांफने लगे हैं। उलटबांसी यह कि निदान के रूप मंे हम नदियों को तोङ-जोङ-मोङ रहे हैं। हमारे जल संसाधन मंत्रालय, हमेशा से जल निकासी मंत्रालय की तरह काम करते ही रहे हंै। वह हर सूखे का निदान, जल निकासी की एक नई योजना के रूप में पेश करता ही रहा है; पहले बोरवैल..इंडिया मार्का, टयूबवैल, समर्सिबल, जेटपम्प। पौरुष के प्रतीक दशरथ मांझी पर बनी ताजा फिल्म देखकर हम तालियां पीटते जरूर हैं; किंतु सच यही है कि हम नपुंसक हो चुके है। भरी जेब के घमण्ड के कारण हमें भी जल-संचयन संरचनाओं से ज्यादा, मशीन, बांध, नहर और नदी जोङ का भरोसा हो गया है। ये उलटे काम हैं; उलटे चित्र। इनसे सूखे का दुष्प्रभाव घटेगा नहीं, बल्कि बढ़ेगा।

यदि सूखे में भी सुख चाहिए, तो हमे चित्र सीधा करना होगा। सूखा आने पर हायतौबा मचाने या बजट खाने से भी चित्र सीधा होने वाला नहीं। सूखे से डरने की बजाय, इनके साथ रहना सीखना होगा। यह तभी होगा कि जब हम उपयोग का अनुशासन सीख लें। कम पानी और कम अवधि वाली फसलों को अपनायें।

सूखे में संजीवनी: चारा और मवेशी

चारा और मवेशी, सूखे में ढाल का काम करते हैं। इन्हे बचायें और बढ़ायें। गौर करने की बात है कि पूर्व में अकाल पूरे बंुदेलखण्ड में आया, लेकिन आत्महत्यायें वहीं हुईं, जहां खनन ने सारी सीमायें लांघी, जंगल का जमकर सफाया हुआ और मवेशी बिना चारा मरेे; बांदा, महोबा और हमीरपुर। यदि खनन अनुशासित न हो; मवेशी न हों; मवेशियों के लिए पानी-चारा न हो; सूखे की भविष्यवाणी के बावजूद उससे बचाव की तैयारी न की गई हो, तो दुष्प्रभाव का बढना स्वाभाविक है; बढेगा ही। ऐसी स्थिति में सूखा राहत के नाम पर खैरात बांटने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। उसमें भी बंदरबांट हो तो फिर आत्महत्यायें होती ही हैं। ऐसे अनुभवों से देश कई बार गुजर चुका है।

यदि धरती का पेट भरा हो और मवेशियों के लिए पीने को पर्याप्त पानी और खाने को पर्याप्त चारे का इंतजाम हो तोे एक क्या, हम तीन साला अकाल में भी हम जिंदा रह सकते हैं। पीने के पानी और चारे के इंतजाम से मवेशियों का जीवन का तो बचेगा ही, उनके दूध से हमारी पौष्टिकता की भी रक्षा होगी। इसी तरर्ह इंधन का पूर्व इंतजाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं। कई ऐसे झाङ-झंखाङ, पत्ती व घास, जिन्हे हम बेकार समझकर अक्सर जलाया दिया करते हैं; उन्हे सुखाकर चारे और ईंधन के रूप में संजोने का काम अभी से शुरु कर दें। भारत का पांरपरिक ज्ञान एक नहीं, पांच साला अकाल में भी जिंदा रहने के ऐसे गुर जानता था। राजस्थान और गुजरात के कम पानी वाले इलाकों में आज भी अकाल में आत्महत्यायें नहीं होती। लालच और कर्ज आधारित खेती ने इस ज्ञान पर धूल डाल दी है। निष्कर्ष यह कि यदि जिस साल, जिस इलाके में वर्षा का जैसा औसत हो, हम उसके हिसाब से जीना सीख लें तो न हमें बाढ सतायेगी और सूखा।

बदलंे फसल, चक्र और मीनू

क्या यह समझदारी नहीं कि ऐसे में मैं गन्ना-धान जैसी अधिक पानी वाली फसल की बजाय कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता दूं ? मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की फसलें बोऊं ? यदि पानी वाली फसलें बोनी ही पङे तो ऐसे बीजों का चयन करूं, जिनकी फसल कम दिनों में तैयार होती हो ? खेती के साथ बागवानी का प्रयोग करुं ? वैज्ञानिक कहते हैं कि फसल चक्र में अनुकूल की बदलाव की तैयारी जरूरी है। आइये, करें। जरूरी है कि फसल और फसल चक्र का चुनाव करते समय मौसम और मिट्टी को आधार बनायें। अपनी खाद्य आदतें बदलें। खाने का मीनू वही बनायें, स्थानीय मौसम जिसकी इज़ाजत देता हो। यह सूखे में सुख के लिए भी अच्छा है, सेहत और जेब के लिए भी। जब, जहां, जितना पानी उपलब्ध हो, उतने में जीवन चलाने को अपनी आदत बनायें।

आईने में अक्स देखने का वक्त

13 अक्तूबर: अंतर्राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस के इस मौके पर हमें यह आकलन भी करना ही चाहिए कि कहीं सूखे से मौत का कारण आसमान से कम बरसे पानी से ज्यादा, धरती के पेट में पानी संजोने के प्रयासों में आई कमी तो नहीं है ? मनरेगा में तालाब तो बहुत बने, लेकिन वे कभी भरे क्यों नहीं ? सभी को पानी पिलाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका, नदी जोङ की अति महत्वाकांक्षी और खर्चीली परियोजना है या फिर आसमान से बरसी बूंदों को संजोने की वे पारम्परिक तकनीक, जिनके कारण जैसलमेर जैसे कम वर्षा के इलाके भी कभी बेपानी नहीं हुए ??
गौर करने की बात है कि 1951 के भारत में जल की उपलब्धता 5177 घन मी प्रति व्यक्ति थी। अब यह घटकर 1650 घन मीटर हो गई है। सरकारी अध्ययन वर्ष-2050 तक इसके 1447 होने की बात कहता है, जबकि अन्य के मुताबिक वर्ष-2025 में ही प्रति व्यक्ति 1341 घन मी.से अधिक पानी उपलब्ध नहीं होगा। संकट साफ है; फिर भी हम वर्षा, बर्फवारी और हिमनद के रूप में प्रतिवर्ष प्राप्त होने वाले 4000 अरब घन मी. पानी में से 2131 अरब घन मी. यूं ही बह जाने देते हैं। शेष बचे 1869 से भी मात्र 1123 अरब घन मी. भू अथवा सतही जल के रूप में उपयोगी बचा पाते हैं। क्यों ?

हम क्यांे भूल जाते है कि मेसोपोटामिया से लेकर लेकर पाकिस्तान के लायलपुर, सरगोधा, माण्टगुमरी और भारत की राजधानी दिल्ली के उजडने-बसने का कारण पानी ही रहा ? हमने जब-जब प्रकृति से लिया ज्यादा और दिया कम, तब-तब हमें उजडना पडा। हम यह समझने में क्यों असमर्थ हैं कि पानी की कमी होने पर बडी से बडी आर्थिक तरक्की टिक नहीं सकती … या सब कुछ जानते हुए भी हम अकर्मण्य हो गये हैं ?

जब भूजल का स्तर गिरता है, तो गुणवत्ता का स्तर स्वतः गिर जाता है। आंकडा है कि महाराष्ट्र में 89.7 प्रतिशत उपलब्ध पानी पीने योग्य नहीं है। भारत के 1.8 लाख गांवों का पानी प्रदूषित है। दुनिया की 50 प्रतिशत कृषि भूमि खारी होने की ओर बढ. रही है। भारत के अन्य समुद्री इलाकों के साथ-साथ दुनिया का सबसे बडा तटवर्ती वन-सुंदरवन इसी रास्ते पर है। इससे हो रही सेहत की बर्बादी का चित्र और भी खतरनाक है। यदि हमने इस चित्र को उलटने की कोशिश नहीं की, तो सूखे के दुष्प्रभावों से लङने की लङाई हमारी कमज़ोर ही पङेगी।

जल साक्षर हों: जल सामथ्र्य पहचाने

हमारे पास सब कुछ है: कम पानी की फसलें, जीवनशैली, ज्ञान, वनक्षेत्र, हिमनद, लाखों तालाब-झीलें, हजारों नदियों का नाडीतंत्र, स्पंजनुमा शानदार गहरे एक्युफर। अकेले 861404 वर्ग किमी. फैला गंगा बेसिन ही 47 फीसदी खेत और 37 फीसदी आबादी को पानीदार बनाने में सक्षम है। यदि हम इनका ठीक-ठीक उपयोग और संरक्षण करना सीख लें, तो सूखे में स्यापा करने की जरूरत कभी नहीं पङेगी। कागज देखिए तो आंकडे., आदेश और योजनाओं की कोई कमी नहीं। अगर ये सभी हकीकत में तब्दील हो जायें, तो सच मानिए कि कोई अकाल हमें डराये नहीं। काश ! कभी हम ऐसा कर पाये; सूखा राहत की बजाय सूखा डराये ही नहीं. ऐसा लक्ष्य बना पायें। उक्त परिदृश्य प्रमाण है कि नेता से लेकर अफसर तक सभी को पानी के मामले में साखर होने की जरूरत है; साखर यानी साक्षर!

सबसे अहम: जल पुर्नोपयोग और जल संचयन

सूखे में सुख हेतु सबसे अहम् कार्य दो हैं: पहला, उपयोग किए पानी का पुर्नोपयोग; दूसरा: बूंद-बूंद का संरक्षण। यदि हम उपयोग किए पानी को पुनः साफ कर पुर्नोपयोग में लाने की ठान लें, तो उद्योग, चारदीवारी वाली रिहायशी काॅलोनी से लेकर हर संभव घर में पानी की कुल खपत को शर्तिया 60 से 70 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है। सोख्ता पिट, उपयोग किए पानी को पकङकर धरती के पेट में बिठाने की सादी तकनीक है। हर गांव के हर घर को इसे अपनाना ही चाहिए।
दरअसल, देश के एक बडे. समुदाय को अभी भी यह समझने की जरूरत है कि हमारी परंपरागत छोटी-छोटी स्वावलंबी जल संरचनायें ही हमें सूखे में भी पानी का वह स्वावलंबन वापस लौटा सकती हैं, जो पिछले तीन दशक में हमने खोया है। इस दावे को यहां कागज पर समझना जरा मुश्किल है। लेकिन लेह, लद्दाख, कारगिल और लाहुल-स्पीति के शुष्क रेगिस्तानों को देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि यदि पानी संजोने का स्थानीय कौशल न होता, तो यहां मानव बसावट ही न होती। अभी भी कुछ नहीं बिगङा है। आइए! भारत की पानी परम्परा को औजार बनायें। सूखे का रोना रोना छोडकर फावडा-कुदाल उठायें और आसमान से बरसी हर बूंद को सहेजने में जुट जायें, ताकि बूंदों को सूरज की नजर न लगे और हम पांचा साला अकाल में भी जिंदा रह सकें।

हुनर और कुटीर उद्योग

हाथ की कारीगरी सीखना-सिखाना, गांव-गांव स्थानीय उत्पाद आधारित कुटीर उद्योग लगाना; लगाने में मदद करना और उनसे बने सामान की बिक्री सुनिश्चित करना सूखे के दुष्प्रभाव को घटाने में विशेष सहयोगी भूमिका निभा सकते हैं। इन्हे बचायें और बढायें। इनसे पलायन भी रुकेगा और किसान परिवारों में होने वाली आत्महत्यायें भी। यही है अंतर्राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस-2015 का स्थानीय संदेश। सूखे में भी सुख देने वाले चार यारों को न भूलें।
याद रहे: ’’साखर, संचय, हुनर, मवेशी – सूखे में सुख सार।’’

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