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प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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generic medicinesप्रमोद भार्गव

यह एक राहत देने वाली खबर है कि केंद्र सरकार देश के गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों को बीपीएल राशन कार्ड के आधार पर मुफ्त दवाएं एवं अन्य सुविधाएं देने की तैयारी में हैं। ये दवाएं केवल सरकारी अस्पतालों में मिलेंगीं। हालांकि संप्रग सरकार ने देश के सभी नागरिकों को मुफ्त दवा दिए जाने की अह्म पहल की थी, इसमें से अब आयकर दाताओं को अलग कर दिया जाएगा। इस योजना को लागू करने में यह एक अनिवार्य शर्त भी जोड़ी गई है कि सभी सरकारी अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रो के चिकित्सक उपचार के लिए केवल जेनेरिक दवाएं लिखने के लिए ही बाघ्यकारी होंगे। इस शर्त से न केवल गरीब गंभीर रोगी इलाज के दायरे में आ जाएंगे,बल्कि दवा कंपनियों को ब्रांडेड दवाओं के दाम भी घटाने को मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जब केंद्र व राज्य सरकारें ऐसे चिकित्सों के विरूद्ध कड़ा रूख अपनाने को खड़ी दिखें, जो मुफ्त में दवा योजना लागू हो जाने के बाद भी पर्चों पर ब्रांडेड दवाएं लिखकर नियमों को धता बताने में लगे हों ? क्योंकि हमारी सरकारें जिस तरह से तेल और उवर्रक कंपनियों के आगे लाचार खड़ी दिखाई देती है,कमोबेश यही स्थिति बहुराष्ट्रिय दवा कंपनियों के साथ भी है। इसीलिए न केवल ब्रांडेड दवाएं जेनेरिक दवाओं की तुलना में 1,123 फीसदी मंहगी हैं,बल्कि मुल्य के बरक्स असरकारी भी नहीं हैं। जबकि राष्ट्रिय दवा मूल्य प्राधिकरण की ओर से दवाओं में मुनाफे का आंकड़ा महज सौ फीसदी ज्यादा रखने की छूट दी गई है। मसलन लागत से दोगुनी ज्यादा कीमत में दवा बाजार में नहीं बेची जा सकती है।

हालांकि मनमोहन सिंह सरकार की सबके लिए मुफ्त दवा योजना इसलिए एक साल में ही नाकाम हो गई थी, क्योंकि योजना के लिए बजट प्रावधान स्थायी नहीं किया गया था। वित्तीय साल 2012-13 के छह माहों के लिए योजना आयोग द्वारा ‘मुफ्त दवा योजना‘ के लिए महज 100 करोड़ रूपए आवंटित किए थे। जबकि आम लोगों का दवा खर्च इससे कहीं ज्यादा है। इसलिए यदि यह योजना पूरी तरह से ईमानदारी से लागू होती तो 12 वीं पंचवर्षीय योजना में इस पर करीब 28,560 करोड़ रूपए खर्च आता। इसलिए इस मद में धन राशि बढ़ाने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें उस धनराशि को भी जोड़ सकती थीं, जो वीआईपी इलाज के बहाने सरकारी पेशेवरों और नेताओं के उपचार में खर्च की जाती है। इस उपाय से उपचार में जो भेदभाव बरता जाता है,उस मानसिकता से छुटकारा मिलता। देश का यह तथाकथित वीआईपी तबका सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने को बाध्यकारी होता तो न केवल सरकारी चिकित्सा सुविधाएं दुरस्त होतीं, बल्कि आम लोगों में इस सुविधा के प्रति विश्वसनीयता की बहाली होती। शासन-प्रशासन के सीधे सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने से चिकित्सों में पर्चे पर ब्रांडेड दवाएं न लिखने का भी भय भी बना रहता। यही भय उस गठजोड़ को तोड़ सकता था, जो कंपनियों और चिकित्सों के बीच अघोषित रूप से जारी है। यह एक ऐसी व्यवस्था है,जिसने नैतिक मानवीयता के सभी सरोकारों को पलीता लगाया हुआ है। इसी वजह से दवा कारोबार मुनाफे की हवस में तब्दील हो गया है। लेकिन अब केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने साफ कर दिया है कि मुफ्त दवाएं केवल बीपीएल कार्ड धारियों को दी जाएंगीं। यह एक अच्छी पहल है।

दरअसल देश में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च इतना बढ़ गया है कि 78 फीसदी आबादी को यदि सरकारी स्वास्थ्य सेवा मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराई जाती है तो गरीब जरूरी इलाज से ही वंचित हो जाएगा। फिलहाल देश की केवल 22 फीसदी आबादी ही सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचती है। इस मुफ्त में दवा योजना के अंतर्गत राजग सरकार की मंशा है कि 2017 तक 58 फीसदी मरीजों का इलाज सरकारी अस्पतालों में हो। इस मकसद पूर्ति के लिए ही इस योजना को देश में मौजूद 1.60 लाख उपस्वास्थ्य केंद्रों, 23000 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और 640 जिला चिकित्सालयों में शुरू की जाएगी। एम्स, चिकित्सा महाविद्यालयों से जुड़े अस्पतालों और सेना व रेलवे के असपतालों में मुफ्त दवा योजना लागू नहीं होगी।

चिकित्सक बेजा दवाएं पर्चे पर लिखें इस नजरिए से स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक ‘आवश्यक दवा सूची‘ भी तैयार की है। इस सूची में 348 प्रकार की दवाएं शामिल हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्वायत्ता बरतते हुए राज्य सरकारों को कुछ दवाएं अलग से जोड़ने की भी छूट दी है। इस लिहाज से भिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, जलवायु कारणों तथा प्रदूषित पेयजल के कारण क्षेत्र विशेष में जो बीमारियां सामने आती हैं, उनके उपचार से जुड़ी दावाएं राज्य सरकार इस सूची में जोड़ सकती है। हालांकि तमिलनाडू में पिछले 15 साल से ,राजस्थान में 2011 से और छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में जरूरी जीवनरक्षक दवाएं सरकारी अस्पतालों में निशुल्क बांटी जा रही हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने बीपीएल कार्डधारियों को नि:शुल्क इलाज कराने की सुविधा हासिल कराई हुई है।

डॉ. के श्रीनाथ रेड्डी के नेतृत्व में चिकित्सा व दवा विशेषज्ञों के एक समूह ने मुफ्त दवा योजना का प्रारूप तैयार किया था। इस प्रारूप में यह प्रस्ताव भी शामिल है कि दवाओं की खरीद पर 75 फीसदी राशि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय खर्च करेगा, जबकि 25 प्रतिशत राशि राज्य सरकारों को खर्च करनी होगी। इस योजना को मंजूर करते वक्त केंद्रीय मंत्रीमण्डल ने इस प्रस्ताव को भी मंजूर किया है कि दवाएं थोक में खरीदी जाएंगी। इस खरीद के लिए केंद्रीय सरकारी दवा खरीद एजेंसी का भी अलग से गठन किया जाएगा। दवाओं की थोक में खरीद का केंद्रीयकरण इस योजना को पलीता लगा सकता है ? क्योंकि दवा कंपनियां जिस तरह से वर्तमान में चिकित्सकों को लालच देकर उन्हें ब्रांडेड दवाएं लिखने को बाध्य करती हैं, वही काम ये कंपनियां दवा खरीद समिति के लोगों को कमीशन देकर अपनी दवाएं खपाने में लग जाएंगी। इस कारण वे जेनेरिक दवाएं भी मंहगी होती चली जाएंगी, जिनकी स्वास्थ्य मंत्रालय ने सूची तैयार की है और वहीं दवाएं पर्चे पर लिखने को चिकित्सकों को बाध्य किया गया है।

दरअसल होना यह चाहिए कि दवा खरीद का शत-प्रतिशत विकेंद्रीकरण हो। जो दवांए सूचीबृद्ध हैं, उनके मूल्य का निर्धारण ‘राष्ट्रिय दवा मूल्य प्राधिकरण‘करे। य दवाएं अस्पताल में बाईदवे उपलब्ध न होने पर दवा की दुकानों पर मिलें। दवाओं के रैपरों पर हिंदी में मूल्य के साथ यह लिखा भी बाध्यकारी होना चाहिए कि यह दवा मुफ्त में मिलने वाली दवाओं की सूची में शामिल है। इससे मरीज को न तो चिकित्सक ब्रांडेड दवा लिख पाएंगे और न ही दवा विक्रेता रोगी को जबरन ब्रांडेड दवा थोप पाएंगे। इस नीति को अमल में लाने से ब्रांडेड दवाओं के मूल्य भी धीरे-धीरे नियंत्रित होने लग जाएंगे। मूल्य नियंत्रित होंगे तो चिकित्सकों को दवा कंपनियों द्वारा जो कमीशन और देश-विदेश में मुफ्त में सैर करने की सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं, तो उनकी भी खत्म होने की उम्मीद बढ़ जाएगी। नतीजतन कालांतर में ब्रांडेड और मंहगी दवाएं चिकित्सकों द्वारा लिखे जाने के चनल से भी बाहर हो जाएंगी। बरहहाल मुफ्त दवा योजना नीति है तो बेहतर लेकिन इसकी सार्थकता तभी कारगर साबित होगी जब इसका सख्ती से पालन हो।

 

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2 Comments on "गरीबों को मुफ्त दवा"

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डॉ. सुधेश
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डा सुधेश

सरकार का स्वागतयोग्य क़दम है , पर इसे वास्तव में अमल में लाया जाए ।

मनमोहन आर्य
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लेख प्रासंगिक है। देखना यह है कि क्या किसी प्रकार से चिकित्सको और दवा बनानेवाली कंपनियों से जुड़े लोगो को पूर्णतः ईमानदार वा सत्य निष्ठावाला वाला बनाया जा सकता है। हमारी जांच एजेंसिओं को भी भ्रष्ट व्यक्तियों पर नज़र रखनी चाहियें।

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