लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय खंडपीठ ने घुमा-फिराकर दागियों से मुक्ति के सवाल को नैतिक तकाजों का हवाला देते हुए विधायिका के पाले में ही डाल दिया। यदि विधायिका का नैतिक बल मजबूत होता और उसकी सत्ता में हर हाल में बने रहने की लालसा न होती तो शायद यह सवाल पैदा ही नहीं होता ? लिहाजा इस नैतिक नसीहत के सार्थक फलित देखने में आएं ऐसा मुश्किल ही है। क्योंकि प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री राजनीति में अपराधीकरण के हिमायती न होते तो शीर्ष अदालत की इस महत्पूर्ण सलाह के बाद राजनीति में शुचिता के उपाय खोजने की दिशा में काम शुरू हो गया होता। लेकिन सिंहसनारूढ़ सभी दल और उनके मुखिया मुंह सिले हुए हैं। गोया ऐसा लगता है कि दोषी सिद्ध न होने तक राजनेताओं के निर्दोष बने रहने की परंपरा बनी रहेगी।

एक जनहित याचिका के संदर्भ में आए इस फैसले में राजनीति और राजनीतिकों पर की गई टिप्पणियां नैतिकता के उच्चतम सरोकरों से जुड़ी हैं। एक तरह से ये टिप्पणियां निर्लिप्त संतों की जनहितकारी वाणियों जैसी हैं। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा है, ‘आरोप तय होना न्याययिक मस्तिष्क द्वारा की गई न्यायिक कार्रवाई है। इसलिए इसे एफआईआर में दर्ज इबारत से हटकर देखा जाना चाहिए। इसलिए प्रधानमंत्री को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अवांछित तत्व या लोग,जो अपराधों की खास श्रेणी के आरोपों का सामना कर है,वह संवैधानिक नैतिकता या सुशासन के सिद्धांतो को बाधित कर सकते हैं या उन्हें रोक सकते हैं। गोया,संवैधानिक विश्वास घटा सकते है।‘ इसी तरह न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने कहा है, ‘ जिस व्यक्ति पर आरोप तय हो चुके होते हैं,उसका स्वाभाविक रूप से कानून से टकराव बन जाता है।‘ लिहाजा भारतीय संविधान के प्रति निष्ठां व वास्तविक विश्वास रखने और अपने कर्तव्यों का पालन सत्य,निष्ठां एवं शुचिता से करने की शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को सलाह दी थी कि ‘वे अपने मंत्री परिषद में ऐसे लोगों को शामिल करने बचें,जिनके खिलाफ न्यायलय में आपराधिक अनैतिकता के साथ जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के तीसरे अध्याय में दर्ज अपराधों के तहत आरोप तय किए गए हैं।‘ यह प्रावधान संसद और राज्य विधानसभाओं की सदस्यता को अयोग्य ठहरने से जुड़ा है। दरअसल जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत सांसद एवं विधायकों को यह छूट मिली हुई है कि यदि उन्होंने सजा पाए किसी निचली अदालत के फैसले के विरूद्ध उपरी अदालत में अपील दायर कर दी है तो वे उसका फैसला आने तक अपने पद पर बने रह सकते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में 10 जुलाई 2013 को सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 ;(4) को संविधान में दर्ज समानता के अधिकार और जनप्रतिनिधित्व कानून की मूल भावना के विरूद्ध करार देते हुए रद्द कर दिया था। इस पर उस समय भाजपा समेत लगभग सभी दलों ने नाराजी जताई थी। नतीजतन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने एक अध्यादेश लाकर शीर्ष अदालत के फैसले को निष्क्रिय करने की पूरी तैयारी कर ली थी,किंतु राहुल गांधी ने नाटकीय अंदाज में एक पत्रकार वर्ता में इस अध्यादेश को फाड़कर फेंक दिया था। फलस्वरूप लालू प्रसाद यादव जैसे नेता को जेल जाना पड़ा और वे चौदहवीं लोकसभा में चुनाव लड़ने से भी वंचित रहे।

जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 ;(४) एक ऐसी विरोधाभासी धारा थी,जो पक्षपात बरतते हुए दोषियों को दोहरे दृष्टिकोण से परिभाषित करती थी। इसलिए अदालत ने धारा 8 की उपधारा 4 को भेदभाव की धारा मानते हुए खारिज कर दिया था। क्योंकि यह दोषी ठहराए गए आमजन को तो चुनाव लड़ने से रोकती है,लेकिन जनप्रतिनिधियों को सुरक्षा मुहैया कराती है। जाहिर है,इस भेद को खत्म करना,न्याययिक समानता के लिए जरूरी था,जिससे संवैधानिक मर्यादा का पालन हो और देश के हरेक नागरिक को समानता के अधिकार मिलें। अदालत ने इस धारा को विलोपित करने का काम संविधान की प्रतिच्छाया में किया था। संविधान के अनुच्छेद 173 और 326 में प्रावधान है कि न्यायालय द्वारा दोषी करार दिए लोगों के नाम मतदाता सुची में शामिल नहीं किए जा सकते हैं। यहां नैसर्गिक प्रश्न उठता है कि जब संविधान के अनुसार कोई अपराधी मतदाता भी नहीं बन सकता तो वह जनप्रतिनिधि बनने के नजरिए से निर्वाचन प्रक्रिया में भागीदारी कैसे कर सकता है। लिहाजा इस विषमता को दूर करते हुए अदालत ने अनुच्छेद 14 में दर्ज नागरिक के समानता के अधिकार को ही व्यावहारिक दर्जा देने का काम किया था। तय है,धारा 8 को निरस्त करके अदालत ने लोकतंत्र में सर्वोपरि लोक-भावना का आदर किया था।

गैर सरकारी संगठन एसोषियन फार डेमोके्रटिक रिफार्म के मुताबिक नरेंद्र मोदी सरकार में 27 प्रतिशत मंत्रियों के खिलाफ अपराधिक मामले दर्ज हैं। इन मंत्रियों की सूची एडीआर की वेबसाइट पर उपलब्ध है। इनमें से 8 के विरूद्ध जघन्य मामले हैं। वर्तमान लोकसभा में भाजपा के 98 सांसद दागी हैं। अब अदालत का फैसला आने के बाद भाजपा का दावा है कि मोदी सरकार में शामिल मंत्रियों पर मुकदमे राम जन्म भूमि,मसलन अयोध्या मंदिर निर्माण के आंदोलन से जुड़े हैं। बावजूद अदालत ने सिर्फ नसीहत दी है,आदेश नहीं। लिहाजा फिलहाल यथास्थिति बनी रहेगी। जाहिर है,नसीहत कानूनी बाध्यता नहीं है,वह केवल नैतिकता के तकाजे से जुड़ा एक आदर्श आचरण का प्रतीक है, जो हमारे ज्यादातर नेताओं के चरित्र से नदारद है। हालांकि इस आंदोलन में भाजपा,संघ और उसके अनुशांगिक संगठनों ने सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का ही काम किया था।

दागी-मुक्ति शासन-प्रशासन स्थापित करने की नरेंद्र मोदी से इसलिए अपेक्षा है,क्योंकि उन्होंने सिंहसनारूढ़ होने के साथ ही कहा था कि वे जल्दी ही दागियों की पहचान कर लेंगे। मोदी ने अपनी जबावदेही अदालत पर डालते हुए यह भी आग्रह किया था कि वह दागी-सांसद विधायकों के मामले का निराकरण एक समय-सीमा में कर दें। लेकिन अदालत ने इनकार कर दिया था। जाहिर है अब मोदी और उनकी राजग सरकार का ही नैतिक व संवैधानिक तकाजा बनता है कि वे दागियों से छुटकारे में कठोरता अपनाएं। मोदी के लिए यह कठोर काम इसलिए सरल हैं,क्योंकि उनके समक्ष गठबंधन राजनीति की मजबूरी नहीं है। भाजपा 182 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत में है। अन्यथा बीते ढाई दशक में केंद्र की सत्ता में काबिज सरकारें गठबंधन का ही रोना रोती रही हैं। इसी मजबूरी के चलते मनमोहन सिंह सरकार ने न्यायालय को एक शपथ-पत्र देते हुए दलील दी थी कि ‘कई बार सरकार बनाने या गिराने में चंद वोट ही बेहद महत्पूर्ण होते हैं। लिहाजा सजा मिलने पर किसी जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त कर दी जाती है तो सरकार की स्थिरता ही खतरे में पड़ सकती है। यही नहीं सरकार ने यह भी बेहूदा तर्क दिया था कि यह उन मतदाताओं के संवैधानिक अधिकार का हनन होगा, जिन्होनें उन्हें चुना है। जाहिर है,ऐसी थोथी व कथित दलीलें राजनीति को अपराध मुक्त बनाने में बाधा उत्पन्न करने का ही काम करती है। अन्यथा सरकारें क्या यह नहीं जनती कि जो प्रतिनिधि जेल में कैद है, वे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं ? क्या सरकारें इस संवैधानिक व्यवस्था से भी अपरिचित हैं कि किसी प्रतिनिधि की मृत्यु होने,इस्तीफा देने अथवा सदस्यता खत्म होने पर छह माह के भीतर नया जनप्रतिनिधि चुनने की संवैधानिक अनिवार्यता का पालन करना होता है। इस स्थिति में न तो कोई निर्वाचन क्षेत्र नेतृत्वविहीन रह जाता है और न ही किसी सरकार की स्थिरता खतरे में पड़ती है ? फिर क्या महज सरकार बनाए रखने के लिए अपराधियों का साथ लेना जरूरी है ? डाॅ राममनोहर लोहिया ने कहा था, ‘जिंदा कौमंे पांच साल के लिए सरकार का इंतजार नहीं करती हैं।‘ जाहिर है,अब जब अदालत ने गंभीर आरोपों के दायरे में आने वाले दागी नेताओं के मामलों को निष्चित समय-सीमा में निराकरण से मना कर दिया है और दागियों को मंत्री बनाया जाए अथवा नहीं यह उत्तरदायित्व प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के विवेक व विशेषाधिकार पर ही छोड़ दिया है,तो यह अब उन्हीं का नैतिक दायित्व बनता है कि वे दागियों से मुक्ति के कारगर उपाय तलाशें ?

 

 

 

प्रमोद भार्गव

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1 Comment on "दागियों से मुक्ति के नैतिक सरोकार"

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mahendra gupta
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मोदी बेशक पक्ष में हों,पर पार्टी कितनी इछुक है, यह भी देखने योग्य है, अन्य कोई दल भी इतना उत्सुक नजर नहीं आता, फिर राज्य सभा में भी बहुमत नहीं है, वहां तो कांग्रेस, सपा , बसपा और अन्य दल कभी भी इसका समर्थन नहीं करेंगे, आखिर दल तो इन दागियों से भरे पड़े हैं इसलिए संसद से ऐसे संशोधन की उम्मीद व्यर्थ है , यह तो सुप्रीम कोर्ट का डंडा ही नियंत्रित करसकता है , जो अभी इस पक्ष में नहीं है,फिर कभी जब पानी गर्दन से ऊपर आयेगा, तो ही सम्भव हो पायेगा

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