लेखक परिचय

ललित गर्ग

ललित गर्ग

स्वतंत्र वेब लेखक

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interviewललित गर्ग –
हमारे देश में अन्तर्राष्ट्रीय दिवसों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। प्रायः हर माह का प्रथम रविवार किसी-न-किसी दिवस से जुड़ा होता है। अगस्त का प्रथम रविवार अन्तर्राष्ट्रीय फ्रेंडस दिवस के रूप में मनाया जाता है। वार्तमानिक परिवेश में मानवीय संवदेनाओं एवं आपसी रिश्तों की जमीं सूखती जा रही है ऐसे समय में एक दूसरे से जुड़े रहकर जीवन को खुशहाल बनाना और दिल में जादुई संवेदनाओं को जगाना है तो उनके लिये एक रिश्ता है दोस्ती का।

प्रश्न उभरता है, आज मनुष्य-मनुष्य के बीच मैत्री-भाव का इतना अभाव क्यों? क्यों है इतना पारस्परिक दुराव? क्यों है वैचारिक वैमनस्य? क्यों मतभेद के साथ जनमता मनभेद? ज्ञानी, विवेकी, समझदार होने के बाद भी आए दिन मनुष्य लड़ता झगड़ता है। विवादों के बीच उलझा हुआ तनावग्रस्त खड़ा रहता है। न वह विवेक की आंख से देखता है, न तटस्थता और संतुलन के साथ सुनता है, न सापेक्षता से सोचता और निर्णय लेता है। यही वजह है कि वैयक्तिक रचनात्मकता समाप्त हो रही है। पारिवारिक सहयोगिता और सहभागिता की भावनाएं टूट रही हैं। सामाजिक बिखराव सामने आ रहा है। धार्मिक आस्थाएं कमजोर पड़ने लगी हैं। आदमी स्वकृत धारणाओं को पकड़े हुए शब्दों की कैद में स्वार्थों की जंजीरों की कड़ियां गिनता रह गया है। ऐसे समय में दोस्ती का बंधन रिश्तों में नयी ऊर्जा का संचार करता है।

मित्र, सखा, दोस्त, फ्रेड, चाहे किसी भी नाम से पुकारो, दोस्त की कोई एक परिभाषा हो ही नहीं सकती। हमें तन्हाई का कोई साथी चाहिए, खुशियों का कोई राजदार चाहिए और गलती पर प्यार से डांटने-फटकराने वाला चाहिए । यदि यह सब खूबी किसी एक व्यक्ति में मिले तो निःसन्देह ही वह आपका दोस्त होगा, मित्र होगा। वही दोस्त, जिसके रिश्ते में कोई स्वार्थ या छल-कपट नहीं बल्कि आपके हित, आपके विकास, आपकी खुशियों के लिये जिसमें सदैव एक तड़फ एवं आत्मीयता रहेगी। नयी सभ्यता एवं नयी संस्कृति में ऐसी ही मानवीय संवेदनाओं को नई ऊर्जा देने के लिये अन्तर्राष्ट्रीय फ्रेंडस दिवस मनाया जाना एक सार्थक उपक्रम है।

यो तो भारतीय संस्कृति और इतिहास में त्योहारों की एक समृद्ध परम्परा है, लेकिन अब हमारे देश में अन्तर्राष्ट्रीय दिवसों के प्रति बढ़ते आकर्षण एवं प्रचलन से इसमें इजाफा हुआ है। अब हर दिन कोई-न-कोई पर्व, त्योहार या दिवस होता है। हमने फ्रेण्डशिप दिवस जैसे अनेक नये या आयात किये हुई पर्व एवं दिवसों को हमारी संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा बना लिया है। फ्रेण्डशिप दिवस यानी मित्रता दिवस, सभी गिले-शिकवे भूल दोस्ती के रिश्ते को विश्वास, अपनत्व एवं सौहार्द की डोर से मजबूत करने का दिन।

मित्रता शब्द बड़ा व्यापक और मोहक है। कितना प्यारा शब्द है यह। तीन अक्षरों का एक शब्द समूचे संसार को अपने साथ समेट लेने वाला, दूसरों को, अनजान-अपरिचितों को, अपने निकट लाने वाला यह अचूक वशीकरण मंत्र है। मित्रता हमारी संस्कृति है। संपूर्ण मानवीय संबंधों का व्याख्या-सूत्र है। लुइस एल. काफमैन ने कहा है कि मित्रता का बीज बोएं, खुशियों का गुलदस्ता पाएं। जबकि देखने में यह आ रहा है कि हम मित्रता का बीज बोने का वक्त ही नहीं तलाश पा रहे है। दोस्ती की खेती खुशियों की फसल लेकर आती है, लेकिन उसके लिये पारम्परिक विश्वास की जमीन और अपनत्व की ऊष्णता के बीज भी पास में होने जरूरी है।

वास्तव में मित्र उसे ही कहा जाता है, जिसके मन में स्नेह की रसधार हो, स्वार्थ की जगह परमार्थ की भावना हो, ऐसे मित्र सांसों की बांसुरी में सिमटे होते हैं, ऐसे मित्र संसार में बहुत दुर्लभ हैं। श्रीकृष्ण और सुदामा की, विभीषण और श्री राम की दोस्ती इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। भर्तृहरि से पूछा गया-आप मित्र की इतनी महिमा गाते हैं तो जरा बताइए मित्र कैसा होना चाहिए? मित्र में क्या विशेषता होनी चाहिए?

भर्तृहरि ने मित्र के लक्षण बताते हुए कहा है-जो अपने मित्र को पाप कार्यों से दूर करे। पापाचरण करते हुए रोके, सोचे यदि यह पाप करेगा तो इसकी आत्मा का पतन हो जायेगा। मित्र की आत्मा का उत्थान करने की भावना से पापों में हटाकर कल्याणकारी कार्यों में लगाएं। उसके हित की चिंता करे। मित्र के अवगुणों पर पर्दा डाल दे। कहीं भी मित्र की बुराई देखें, उसे हटाने की कोशिश करें और उसके गुणों को प्रकट करें। मौका मिलते ही मित्र के गुणों की प्रशंसा, उसकी बड़ाई, यश-कीर्ति करता रहे। मित्र को आपत्ति में फंसा देखकर, मित्र पर आयी विपत्ति देखकर उसका साथ नहीं छोड़े, अपितु उसे विपत्ति से बचाने का प्रयास करे और समय पर सहायता करे, अपने प्राण हथेली पर रखकर भी मित्र के प्राणों की, मित्र की कीर्ति और मित्र के हितों की रक्षा करे उसे ही सच्चा मित्र कहा जाता है।

क्षणिक और स्वार्थों पर टिकी मित्रता वास्तव में मित्रता नहीं, केवल एक पहचान मात्र होती हैं ऐसे मित्र कभी-कभी बड़े खतरनाक भी हो जाते हैं। जिनके लिए एक विचारक ने लिखा है- ‘‘पहले हम कहते थे, हे प्रभु! हमें दुश्मनों से बचाना परन्तु अब कहना पड़ता है, हे परमात्मा, हमें दोस्तों से बचाना।’’ दुश्मनों से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं दोस्त। मित्रता दिवस दोस्ती को अभिशाप नहीं, वरदान बनाने का उपक्रम है। यह दिवस वैयक्तिक स्वार्थों को एक ओर रखकर औरों को सुख बांटने एवं दुःख बटोरने की मनोवृत्ति को विकसित करने का दुर्लभ अवसर प्रदत्त करता है। इस दिवस को मनाने का मूल हार्द यही है कि दोस्ती में विचार-भेद और मत-भेद भले ही हों मगर मन-भेद नहीं होना चाहिए। क्योंकि विचार-भेद क्रांति लाता है जबकि मन-भेद विद्रोह। क्रांति निर्माण की दस्तक है, विद्रोह बरबादी का संकेत। स्वस्थ निमित्तों की शृंखला में मित्रता का भाव बहुत महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति बिना राग-द्वेष निरपेक्ष भाव से सबके साथ मित्रता स्थापित करता है, सबके कल्याण का आकांक्षी रहता है, सबके अभ्युदय में स्वयं को देखता है उसके जीवन में विकास के नए आयाम खुलते रहते हैं।

मित्रता का भाव हमारे आत्म-विकास का सुरक्षा कवच है। आचार्य श्री तुलसी ने इसके लिए सात सूत्रों का निर्देश किया। मित्रता के लिए चाहिए-विश्वास, स्वार्थ-त्याग, अनासक्ति, सहिष्णुता, क्षमा, अभय, समन्वय। यह सप्तपदी साधना जीवन की सार्थकता एवं सफलता की पृष्ठभूमि है। विकास का दिशा-सूचक यंत्र है।

दोस्ती का यह दिवस आमंत्रित कर रहा है अपनी ओर, बांहें फैलाये हुए, हमें बिना कुछ सोचे, ठिठके बगैर, भागकर दोस्ती की पगडंडी को पकड़ लेने के लिये। जीवन रंग-बिरंगा है, यह श्वेत है और श्याम भी। दोस्ती की यही सरगम कभी कानों में जीवनराग बनकर घुलती है तो कहीं उठता है संशय का शोर। दोस्ती को मजबूत बनाता है हमारा संकल्प, हमारी जिजीविषा, हमारी संवेदना लेकिन उसके लिये चाहिए समर्पण एवं अपनत्व की गर्माहट। यह जीना सिखाता है, जीवन को रंग-बिरंगी शक्ल देता है। प्रेरणा देता है कि ऐसे जिओ कि खुद के पार चले जाओ। ऐसा कर सके तो हर अहसास, हर कदम और हर लम्हा खूबसूरत होगा और साथ-साथ सुन्दर हो जायेगी जिन्दगी।

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