लेखक परिचय

कुमार विमल

कुमार विमल

पीएचडी छात्र ( भारतीय प्रोद्योगकी संस्थान दिल्ली ) अनुसन्धान प्रशिक्षु ( रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन )

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neta1आज शहर में एक समारोह हैं,

इस पावन पुनीत मांगलिक बेला पर,

नेता भी आए, अभिनता भी आए,

सज्जन भी आए, अपराधी भी आए ।

 

अरे देखो वहाँ महफ़िल सजी है,

नए आभूषण, नए परिधान,

नए फैशन, नए रिवाज ,

ऐसा लगता है मनो भव्यता की कुश्ती छिडी है ।

 

आधुनिकता के रंग में हर कोइ रंगा है ,

कामिनी और कंचन की नशा में हर कोइ धूत पड़ा है,

अपने को बढ चढ़ कर दिखाने का मनो उनपर

भूत सा पड़ा है ।

अरे ! अब देखो ,

मुर्गे की गोश्त और शराब की बोतल

पर ये लोग कैसे टूट पड़े है,

बोतल की नशे में, ये मान मर्यादा तक भूल पड़े है ।

 

सज्जन अपनी सज्जनता पर शर्माते है ,

सभ्यता संस्कृति की कथा दबे मुहँ सुनाते है

बुजुर्ग अपने जीवन अनुभव

पर पछताते है ।

आखिर शहर के समारोह में इनका

क्या मोल रहा

इस लिए वे भी सज्जनता छोड़ इसी

रंग में रंग जाते है ,

और समारोह की इज्जत बचाते है ।

 

 

 

 

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